पत्नी की घरजमाई की इच्छा पर हाईकोर्ट ने तलाक की याचिका खारिज की
झारखंड में पत्नी ने अपने मायके में पति को घरजमाई बनकर रहने की इच्छा जताई, जिससे पति ने मानसिक क्रूरता का कारण मानकर तलाक की अर्जी दायर की। हाईकोर्ट ने कहा कि केवल इस तरह की इच्छा वैवाहिक क्रूरता नहीं है और पति की तलाक की अपील को खारिज कर दिया।

सौजन्य से:- Hindustan
पत्नी की एक इच्छा ने पति को अदालत पहुंचाया; हाई कोर्ट बोला-घरजमाई अपराध नहीं
झारखंड में एक महिला ने इच्छा जताई कि उसका पति घरजमाई बनकर रहे। इसके खिलाफ पति ने अदालत में तलाक की अर्जी डाल दी। हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए अर्जी खारिज कर दी।
पत्नी की एक इच्छा ने पति को अदालत तक पहुंचा दिया। पत्नी चाहती थी कि पति अपने वृद्ध माता-पिता को छोड़कर पटना आए और उसके मायके में घरजमाई बनकर रहे। पति ने इसे मानसिक क्रूरता बताया और विवाह खत्म करने के लिए तलाक की अर्जी दाखिल कर दी। मामला फैमिली कोर्ट से होता हुआ झारखंड हाईकोर्ट पहुंचा। लेकिन हाईकोर्ट ने कहा-सिर्फ पत्नी का पति को घरजमाई बनाने की इच्छा जताना वैवाहिक क्रूरता नहीं है। अदालत ने पति की तलाक की अपील खारिज कर दी।
जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की खंडपीठ ने राहुल चौबे की अपील पर यह फैसला सुनाया। पति-पत्नी की शादी 21 नवंबर 2008 को पटना में हुई थी। दोनों की एक बेटी भी है। शादी के शुरुआती दिनों में दांपत्य जीवन सामान्य रहा, लेकिन बाद में पत्नी का बार-बार पटना स्थित मायके जाना पति को नागवार गुजरने लगा।
2013 में पटना गई पत्नी, फिर नहीं लौटीं
पति के मुताबिक, पत्नी 24 फरवरी 2013 को पटना गई और इसके बाद हजारीबाग स्थित ससुराल वापस नहीं आई। पति का आरोप था कि पत्नी और उसके माता-पिता चाहते थे कि वह पटना में उनके साथ रहे। इसके लिए उसे घरजमाई बनने को कहा गया, लेकिन उसने यह कहते हुए इनकार कर दिया कि उसके माता-पिता वृद्ध और बीमार हैं और उनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं है। पति ने अदालत को बताया कि उसने पत्नी को कई बार वापस लाने की कोशिश की, लेकिन पत्नी पटना आने और वहीं रहने पर जोर देती रही। पति ने इसे मानसिक प्रताड़ना बताते हुए हिंदू विवाह अधिनियम के तहत तलाक मांगा।
पत्नी ने कहा- प्रताड़ित तो मुझे किया गया
मामले में पत्नी की ओर से पेश अमिकस क्यूरी ने पति के आरोपों को खारिज किया। उनका कहना था कि पत्नी ने पति या उसके परिवार के साथ कोई क्रूरता नहीं की, बल्कि उसे पति और ससुरालवालों की ओर से प्रताड़ना का सामना करना पड़ा। पत्नी ने यह भी कहा कि वह शादी खत्म नहीं करना चाहती और पति के साथ सम्मानपूर्वक रहना चाहती है। फैमिली कोर्ट ने 2022 में पति की तलाक की अर्जी खारिज कर दी थी। इसके बाद पति ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अदालत ने खास तौर पर कहा कि मायके जाना पत्नी का अधिकार है। इसी तरह घरजमाई बनना या नहीं बनना पति की अपनी पसंद है।
10 साल जेल जमानत का आधार नहीं
रांची। झारखंड हाईकोर्ट ने नाबालिग बच्ची से दुष्कर्म के प्रयास और उसकी गला घोंटकर हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे धानों टुडू की सजा स्थगित कर जमानत पर रिहा करने की याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जघन्य अपराधों में केवल 10 साल या उससे अधिक अवधि जेल में बिताना सजा स्थगित करने या जमानत देने का एकमात्र आधार नहीं हो सकता। जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की खंडपीठ ने यह आदेश दिया। यह मामला पूर्वी सिंहभूम जिले के मुसाबनी थाना से जुड़ा है।
मामला क्या है
मामला 19 नवंबर 2015 का है। अभियोजन के अनुसार, मुसाबनी थाना क्षेत्र के तिलाबनी गांव में करमा पूजा के दौरान छोटका गोप और धानों टुडू नाबालिग बच्ची को बहला-फुसलाकर अपने साथ ले गए थे। अगले दिन सुबह गांव की झाड़ियों में बच्ची का शव मिला था। उसके गले में पतली रस्सी लिपटी हुई थी। जमशेदपुर की विशेष पॉक्सो अदालत ने 25 फरवरी 2020 को दोनों आरोपियों को दोषी करार देते हुए धारा 302/34 के तहत आजीवन कारावास और 20 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। इसके अलावा धारा 376डी/511 के तहत दुष्कर्म के प्रयास के मामले में 10 वर्ष के सश्रम कारावास की सजा भी दी गई थी।
धानों टुडू की ओर से अधिवक्ता मनोज दास ने दलील दी कि वह करीब साढ़े 10 साल जेल में रह चुका है। ऐसे में आजीवन कारावास की सजा का एक बड़ा हिस्सा वह भुगत चुका है और न्यायहित में उसकी सजा स्थगित कर जमानत दी जानी चाहिए। राज्य सरकार की ओर से अपर लोक अभियोजक विश्वनाथ राय ने याचिका का विरोध किया। उन्होंने कोर्ट को बताया कि हाईकोर्ट पहले ही दो नवंबर 2023 को गुण-दोष के आधार पर आवेदक की सजा स्थगित करने की याचिका खारिज कर चुका है।
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