पत्नी और बच्चों को वाजिब हक: कलकत्ता हाईकोर्ट का फैसला, नॉमिनी ही नहीं वारिस भी पीएफ और ग्रेच्युटी के हकदार
कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है, जिसमें पत्नी और बच्चों को पीएफ और ग्रेच्युटी के हकदार माना गया है। अदालत ने यह फैसला दो महीने के भीतर ब्याज सहित सौंपने का आदेश दिया है।

सौजन्य से:- Jagran
नॉमिनी न होने पर भी पत्नी और बच्चे PF और ग्रेच्युटी राशि के हकदार, कलकत्ता हाईकोर्ट ने सुनाया फैसला
कलकत्ता हाईकोर्ट ने 25 साल बाद एक विधवा को न्याय देते हुए फैसला सुनाया। ...और पढ़ें
HighLights
- कलकत्ता हाईकोर्ट ने ग्रेच्युटी-पीएफ पर कानूनी वारिसों का हक बताया।
- नॉमिनी केवल राशि प्राप्त करने का माध्यम, 'डाकिया' जैसी भूमिका।
- हिंदू उत्तराधिकार कानून से विधवा, बच्चों को मिलेगा बराबर हिस्सा।
आशीष अंबष्ठ, धनबाद। करीब 25 वर्षों तक चली कानूनी लड़ाई के बाद बीसीसीएल कर्मी की विधवा पत्नी को आखिरकार न्याय मिल गया।
कलकत्ता हाईकोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट कर दिया कि ग्रेच्युटी और भविष्य निधि (पीएफ) पर केवल नॉमिनी का अधिकार नहीं होता।
नॉमिनी सिर्फ राशि प्राप्त करने का माध्यम होता है, जबकि वास्तविक हक मृतक कर्मचारी के कानूनी वारिसों का होता है। अदालत ने दो महीने के भीतर ब्याज सहित भुगतान करने का आदेश देते हुए कहा कि राशि का बंटवारा हिंदू उत्तराधिकार कानून के अनुसार किया जाएगा।
कलकत्ता हाईकोर्ट में रिट याचिका दाखिल की। न्यायमूर्ति शम्पा दत्त (पाल) की अदालत ने मात्र 13 दिनों में सुनवाई पूरी कर 22 जून 2026 को ऐतिहासिक फैसला सुना दिया।
यह फैसला कोल इंडिया, बीसीसीएल समेत सभी सरकारी और निजी कंपनियों के लाखों कर्मचारियों और उनके परिवारों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
दामागोड़िया कोलियरी के कर्मचारी के मामले में आया फैसला
मामला बीसीसीएल की दामागोड़िया कोलियरी (सीवी एरिया) के कर्मचारी स्वर्गीय अमृत लाल मांजी से जुड़ा है। नौकरी मिलने के समय वे अविवाहित थे और उन्होंने अपनी मां अलका मांजी को 100 प्रतिशत नॉमिनी बनाया था।
करीब एक वर्ष बाद उनकी शादी मुनमुन पाल से हुई, लेकिन उन्होंने नामांकन में पत्नी का नाम नहीं जोड़ा। बाद में उनकी मृत्यु हो गई।
पति की मौत के बाद जब मुनमुन पाल ने ग्रेच्युटी का दावा किया तो कोलियरी प्रबंधन ने यह कहते हुए भुगतान से इनकार कर दिया कि कर्मचारी ने अपनी मां को नॉमिनी बनाया था, इसलिए पूरी राशि उसी को मिलेगी।
श्रम विभाग से लेकर अपील तक मिली निराशा
मुनमुन पाल ने सहायक श्रम आयुक्त, आसनसोल के समक्ष आवेदन दिया, लेकिन 18 जुलाई 2024 को वहां भी नॉमिनी के पक्ष में फैसला आया। इसके बाद उप मुख्य श्रम आयुक्त के समक्ष अपील की गई, जिसे 30 मार्च 2026 को खारिज कर दिया गया। दोनों अधिकारियों ने माना कि कानून के अनुसार भुगतान नॉमिनी को ही किया जाएगा।
इसके बाद मुनमुन पाल ने 8 जून 2026 को कलकत्ता हाईकोर्ट में रिट याचिका दाखिल की। न्यायमूर्ति शम्पा दत्त (पाल) की अदालत ने मात्र 13 दिनों में सुनवाई पूरी कर 22 जून 2026 को ऐतिहासिक फैसला सुना दिया।
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सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कानून
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता एस.के. घोष और आर. घोष ने पक्ष रखा। हाईकोर्ट ने सर्वोच्च न्यायालय के सरबती देवी बनाम उषा देवी (1984) के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि नॉमिनी केवल राशि प्राप्त करने का माध्यम होता है। नामांकन से उसे संपत्ति का मालिकाना अधिकार नहीं मिल जाता।
अदालत ने स्पष्ट किया कि ग्रेच्युटी और भविष्य निधि पर वास्तविक अधिकार मृतक के कानूनी वारिसों का है और इस मामले में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 लागू होगा।
इसलिए विधवा पत्नी, पुत्र और पुत्री को बराबर हिस्सा मिलेगा। मां भी कानूनी वारिस हैं, लेकिन पूरी राशि केवल उन्हीं की नहीं होगी।
नॉमिनी की भूमिका 'डाकिया' जैसी
हाईकोर्ट ने भारतीय स्टेट बैंक को निर्देश दिया कि वह ग्रेच्युटी और पीएफ की पूरी राशि आदेश की तिथि से दो महीने के भीतर ब्याज सहित मुनमुन पाल को उपलब्ध कराए। अदालत ने यह भी कहा कि मुनमुन पाल कानून के अनुसार बच्चों और अन्य वैध वारिसों के बीच राशि का बंटवारा करेंगी।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि श्रम अधिकारियों द्वारा नॉमिनी को भुगतान का आदेश देना गलत नहीं था, लेकिन नॉमिनी का दायित्व है कि वह राशि वास्तविक कानूनी वारिसों तक पहुंचाए।
यदि ऐसा नहीं होता तो वारिस सीधे अदालत की शरण ले सकते हैं। अदालत ने टिप्पणी की कि 'नॉमिनी की हैसियत डाकिया जैसी है, उसका काम केवल पैसा लेकर असली हकदारों तक पहुंचाना है।
कोल इंडिया के कर्मचारियों के लिए क्यों है यह फैसला अहम
कोल इंडिया और उसकी अनुषंगी कंपनियों में बड़ी संख्या में ऐसे कर्मचारी हैं, जिन्होंने नौकरी के शुरुआती दौर में माता-पिता को नॉमिनी बनाया था और विवाह के बाद नामांकन में संशोधन नहीं कराया। ऐसे मामलों में कर्मचारी की मृत्यु के बाद पत्नी, बच्चों और माता-पिता के बीच विवाद खड़े होते रहे हैं।
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