सुप्रीम कोर्ट ने NSE को RTI के दायरे के बाहर रखा
सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल स्टॉक एक्सचेंज ऑफ इंडिया लिमिटेड (एनएसई) की अपील पर नोटिस जारी किया है। एनएसई ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें उसे सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI) के तहत एक सार्वजनिक प्राधिकरण (पब्लिक अथॉरिटी) माना गया।

सौजन्य से:- Live Law Hindi
सुप्रीम कोर्ट ने NSE को RTI Act के दायरे में लाने वाले CIC के आदेश पर रोक लगाई
Shahadat
1 Aug 2026 10:35 AM IST
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को नेशनल स्टॉक एक्सचेंज ऑफ़ इंडिया लिमिटेड (NSE) की अपील पर नोटिस जारी किया। NSE ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस फ़ैसले को चुनौती दी, जिसमें उसे सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI Act), 2005 की धारा 2(h) के तहत "पब्लिक अथॉरिटी" (सार्वजनिक प्राधिकरण) माना गया।
हाईकोर्ट ने सेंट्रल इन्फॉर्मेशन कमीशन (CIC) के 2007 के उस आदेश को सही ठहराया, जिसमें NSE को RTI एक्ट के तहत पब्लिक अथॉरिटी मानने का निर्देश दिया गया।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने एक अंतरिम आदेश पारित करते हुए कहा कि CIC के आदेश के अमल पर रोक रहेगी।
कोर्ट ने आदेश दिया,
"नोटिस जारी करें, जिसका जवाब चार हफ़्ते के भीतर आना चाहिए। इस बीच सेंट्रल इन्फॉर्मेशन कमीशन द्वारा 7 जून, 2007 को पारित आदेश का असर और अमल रुका रहेगा।"
NSE की ओर से पेश होते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि एक्सचेंज RTI एक्ट की धारा 2(h) के तहत "पब्लिक अथॉरिटी" की परिभाषा को पूरा नहीं करता है। 'थलाप्पलम सर्विस कोऑपरेटिव बैंक लिमिटेड बनाम केरल राज्य' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का ज़िक्र करते हुए उन्होंने बेंच से आग्रह किया कि वे पहले कानून में दी गई परिभाषा और पब्लिक अथॉरिटी क्या होती है, इसके दायरे की जांच करें।
सॉलिसिटर जनरल ने तर्क दिया कि NSE में लगभग 40% घरेलू निवेशक और करीब 27-30% विदेशी निवेशक हैं। इसमें सरकार की कोई हिस्सेदारी नहीं है। उन्होंने कहा कि एक्सचेंज न तो संविधान के तहत स्थापित किया गया, न ही संसद या राज्य विधानसभा द्वारा बनाए गए किसी कानून से, और न ही धारा 2(h) के अर्थ में किसी सरकारी अधिसूचना या आदेश से। उन्होंने यह भी बताया कि हाईकोर्ट से मिली अंतरिम सुरक्षा 19 साल तक लागू रही थी।
जब जस्टिस मेहता ने कहा कि यह "पारदर्शिता का दौर" है तो सॉलिसिटर जनरल ने जवाब दिया कि NSE अपनी वेबसाइट पर काफ़ी जानकारी उपलब्ध कराता है, लेकिन उन्होंने अनुरोध किया कि अंतरिम सुरक्षा जारी रखी जाए।
यह मामला तब शुरू हुआ, जब एक RTI आवेदक ने NSE से जानकारी मांगी, जिसके बाद सेंट्रल इन्फॉर्मेशन कमीशन (CIC) ने 7 जून, 2007 को यह माना कि स्टॉक एक्सचेंज RTI Act की धारा 2(h) के तहत "पब्लिक अथॉरिटी" है। CIC के आदेश को चुनौती देते हुए NSE ने दिल्ली हाई कोर्ट का रुख किया। उनका तर्क था कि यह कंपनीज़ एक्ट के तहत बनी एक प्राइवेट कंपनी है, जिसे न तो कानून के ज़रिए बनाया गया था और न ही सरकार इसकी मालिक है, इसे कंट्रोल करती है या इसे बड़े पैमाने पर फ़ंड देती है।
अप्रैल 2010 में दिल्ली हाईकोर्ट के सिंगल जज ने NSE की चुनौती खारिज की और कहा कि एक्सचेंज RTI Act की धारा 2(h) के तहत एक "पब्लिक अथॉरिटी" है। कोर्ट ने कहा कि "पब्लिक अथॉरिटी" शब्द का मतलब व्यापक रूप से समझा जाना चाहिए और RTI Act का मकसद पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि सिक्योरिटीज कॉन्ट्रैक्ट्स (रेगुलेशन) एक्ट के तहत NSE को मिली मान्यता, उचित सरकार के आदेश से इसकी स्थापना या गठन के बराबर है। साथ ही सेंट्रल गवर्नमेंट और SEBI का एक्सचेंज पर जो व्यापक कंट्रोल है, वह भी इसे धारा 2(h) के दायरे में लाता है।
NSE ने हाईकोर्ट की डिवीज़न बेंच के सामने उस फैसले को चुनौती दी। 4 मई 2010 को डिवीज़न बेंच ने अपील पर नोटिस जारी किया और आगे की कार्यवाही तक सिंगल जज के फैसले और 7 जून 2007 के CIC के आदेश, दोनों पर रोक लगाई। यह अंतरिम राहत तब तक जारी रही, जब तक कि हाईकोर्ट ने इस महीने की शुरुआत में अपील पर अंतिम फैसला नहीं सुना दिया।
1 जुलाई 2026 को दिल्ली हाईकोर्ट ने NSE की अपील खारिज की और सिंगल जज के इस निष्कर्ष को सही ठहराया कि NSE, RTI Act की धारा 2(h) के तहत एक "पब्लिक अथॉरिटी" है।
Case Title – National Stock Exchange of India Ltd. v. Central Information Commission & Ors.
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