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सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी: क्यों नहीं रोका जा सकता प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों की ज्यादा फीस?

सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों को सरकारी कॉलेजों से ज्यादा फीस लेने से नहीं रोका जा सकता। उनके अनुसार, अगर ऐसा करने के लिए मजबूर किया जाए, तो वे बंद हो सकते हैं और मेडिकल एजुकेशन को नुकसान पहुंच सकता है।

25 जून 2026 को 03:24 am बजे
सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी: क्यों नहीं रोका जा सकता प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों की ज्यादा फीस?

सौजन्य से:- Navbharat Times

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों को सरकारी कॉलेजों से ज्यादा फीस लेने से नहीं रोका जा सकता, वरना वे बंद हो सकते हैं। जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि प्राइवेट कॉलेज सेल्फ-फाइनेंस होते हैं और कैपिटेशन फीस नहीं ले सकते। एक EWS स्टूडेंट की याचिका पर सुनवाई में यह फैसला आया।

हाइलाइट्स

जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि प्राइवेट और सरकारी कॉलेज की सालाना ट्यूशन फीस एक जैसी नहीं हो सकती।

प्राइवेट कॉलेज ने ईडब्ल्यूएस छात्र से सालाना लगभग 19 लाख रुपये ट्यूशन फीस देने को कहा।

कोर्ट ने कहा कि प्राइवेट मेडिकल कॉलेज कैपिटेशन फीस नहीं ले सकते और वे सेल्फ-फाइनेंसिंग होते हैं।

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों को सरकारी कॉलेजों से ज्यादा फीस लेने से नहीं रोका जा सकता। ऐसा करने के लिए मजबूर करने पर वे बंद हो सकते हैं और मेडिकल एजुकेशन को नुकसान हो सकता है। जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने EWS कैटेगरी के एक स्टूडेंट की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह बात कही।

इस स्टूडेंट को एक प्राइवेट मेडिकल कॉलेज में जनरल कैटेगरी की सीट मिली थी, जहां उसे सालाना लगभग 19 लाख रुपये ट्यूशन फीस देनी थी। कोर्ट ने कहा कि प्राइवेट मेडिकल कॉलेज कैपिटेशन फीस नहीं ले सकते और वे सेल्फ-फाइनेंसिंग (खुद फंडिंग करने वाले) होते हैं।

प्राइवेट और सरकारी कॉलेज की सालाना ट्यूशन फीस एक जैसी नहीं हो सकती

जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि प्राइवेट कॉलेज और सरकारी कॉलेज की सालाना ट्यूशन फीस एक जैसी नहीं हो सकती। सेल्फ-फाइनेंसिंग प्राइवेट कॉलेजों में सारा खर्च कॉलेज खुद उठाते हैं, जबकि सरकारी कॉलेजों में सरकार खर्च के लिए सब्सिडी देती है। उन्होंने आगे कहा कि प्राइवेट कॉलेज भी हायर एजुकेशन, खासकर मेडिकल के क्षेत्र में योगदान दे रहे हैं।

अगर उनसे सरकारी रेट पर फीस लेने के लिए कहा जाए, तो वे बंद हो जाएंगे और मेडिकल एजुकेशन पर बुरा असर पड़ेगा। अगर दूसरे राज्यों ने EWS कोटा लागू किया है और राजस्थान ने ऐसा नहीं किया है, तो कोर्ट प्राइवेट कॉलेजों को फीस कम करने का निर्देश नहीं दे सकता।

क्या है पूरा मामला

याचिकाकर्ता, जिसके माता-पिता की राजस्थान में सालाना आय 8 लाख रुपये से कम है और जिसने NEET-UG 2025 पास किया है, ने कहा कि उसे एक प्राइवेट मेडिकल कॉलेज में मनमाने ढंग से जनरल कैटेगरी की सीट दी गई और उससे 19 लाख रुपये की मांग की जा रही थी, जो उसकी क्षमता से कहीं ज्यादा थी।

उसके वकील ऋषभ संचेती ने बेंच को बताया कि EWS कैटेगरी के जिन छात्रों के उससे कम नंबर थे, उन्हें EWS कोटे की सीटें दी गईं, जहां उम्मीदवार MBBS कोर्स के लिए सरकार द्वारा तय दर पर फीस देते हैं; यह दर प्राइवेट कॉलेजों में जनरल कैटेगरी की सीटों की फीस से कम होती है।

गरीब परिवार से सालाना 19 से 25 लाख रुपये की ट्यूशन फीस वसूली गई

वकील ने आगे कहा कि हाई कोर्ट यह समझने में नाकाम रहा कि राजस्थान सरकार द्वारा MBBS कोर्स में EWS कैटेगरी के छात्रों के लिए 10% सीटें न रखने से संवैधानिक आदेश का उल्लंघन हुआ और गरीब परिवारों से सालाना 19 से 25 लाख रुपये की ट्यूशन फीस वसूलने की इजाजत मिली। याचिकाकर्ता ने EWS कोटे की सीट के बजाय जनरल कैटेगरी की सीट मनमाने ढंग से आवंटित किए जाने को भी चुनौती दी।

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