दिल्ली हाई कोर्ट ने रद्द किया सास के वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के तहत बेदखली आदेश, बहू को मिला वैवाहिक घर में रहने का अधिकार
कोर्ट ने कहा कि वरिष्ठ नागरिक अधिनियम और घरेलू हिंसा संरक्षण अधिनियम को साथ-साथ लागू किया जाना चाहिए और सास के अधिकारों के हवाले से बहू को उसके वैवाहिक घर से निकाला नहीं जा सकता। नाबालिग बेटे के रहने की सुरक्षा को भी ध्यान में रखते हुए बेदखली का आदेश निरस्त कर दिया गया, जबकि संपत्ति‑स्वामित्व के प्रश्न को सिविल मुकदमों में सुलझाने का निर्देश दिया गया।

सौजन्य से:- Navbharat Times
दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस अमित महाजन उस याचिका पर सुनवाई कर रहे थे, जिसमें डिविजनल कमिश्नर के आदेश को चुनौती दी गई थी। आदेश में महिला को ससुराल से निकाले जाने के फैसले को सही ठहराया गया था। याचिका पर सुनवाई के बाद जस्टिस अमित महाजन ने बेदखली के आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि, वरिष्ठ नागरिक अधिनियम, 2007 और घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 को एक-दूसरे के विपरीत नहीं, बल्कि सामंजस्यपूर्ण तरीके से लागू किया जाना चाहिए।
सास ने वरिष्ठ नागरिक कानून के तहत कराई थी बेदखली
मामला एक महिला और उसके ससुराल पक्ष के बीच संपत्ति और रहने के अधिकार को लेकर चल रहे विवाद से जुड़ा है। महिला की शादी दिसंबर 2021 में हुई थी और वह अपने पति तथा नाबालिग बेटे के साथ संबंधित मकान में रह रही थी। महिला के ससुर की 2018 में बिना वैध वसीयत के मौत हो गई थी। इसके बाद 2019 में उसके पति और देवर ने एक पंजीकृत त्यागपत्र के जरिए संपत्ति में अपने हिस्से अपनी मां यानी महिला की सास के नाम कर दिए थे।बाद में सास ने वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के तहत अपने बेटे और बहू को संपत्ति से बाहर निकालने की मांग की। मार्च 2025 में जिला मजिस्ट्रेट ने बेदखली का आदेश पारित कर दिया। इसके खिलाफ बहू ने अपील की, लेकिन सितंबर 2025 में मंडलायुक्त ने भी जिला मजिस्ट्रेट के आदेश को बरकरार रखा।
बहू ने कहा- यह मेरा साझा वैवाहिक घर है
28 सितंबर को महिला ने हाई कोर्ट में दलील दी कि वह लंबे समय से इस मकान में अपने पति के साथ रह रही है, इसलिए यह उसका वैवाहिक और साझा घर है। घरेलू हिंसा कानून के तहत उसे यहां रहने का अधिकार है और केवल संपत्ति के स्वामित्व के आधार पर यह अधिकार खत्म नहीं किया जा सकता। महिला ने 2019 में किए गए त्यागपत्र पर भी सवाल उठाए। उसका कहना था कि संपत्ति पैतृक है और उसके नाबालिग बेटे का भी इसमें अधिकार है। हालांकि, इन दावों से जुड़े संपत्ति विवाद पहले से ही सिविल कोर्ट में लंबित हैं।कोर्ट ने कहा- एक कानून के सहारे दूसरे अधिकार को खत्म नहीं कर सकते
दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि सास का वरिष्ठ नागरिक होना और अपनी संपत्ति में शांतिपूर्वक रहने का अधिकार महत्वपूर्ण है। लेकिन वरिष्ठ नागरिक अधिनियम का इस्तेमाल बहू को उसके साझा वैवाहिक घर से बेदखल करने के लिए नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब वह वहां अपने वैवाहिक जीवन के दौरान रह रही हो और उसके निवास का अधिकार घरेलू हिंसा कानून के तहत भी सामने आता हो।कोर्ट ने यह भी कहा कि परिवार के सदस्यों के बीच किया गया त्यागपत्र अपने आप में महिला के निवास के अधिकार को खत्म नहीं करता। खास तौर पर तब, जब उस दस्तावेज की वैधता और संपत्ति पर उसके प्रभाव को लेकर सिविल कोर्ट में विवाद लंबित हो।
नाबालिग बच्चे के रहने के अधिकार पर भी जोर
हाई कोर्ट ने इस मामले में नाबालिग बच्चे के निवास को भी महत्वपूर्ण माना। कोर्ट ने कहा कि घर से जुड़ा संरक्षण सिर्फ पति-पत्नी के विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भी देखा जाना चाहिए कि बच्चे के रहने की स्थिति पर इसका क्या असर पड़ेगा।कोर्ट ने महिला की बेदखली का आदेश रद्द करते हुए यह साफ किया कि उसने इस स्तर पर संपत्ति के असली मालिकाना हक, टाइटल या 2019 के त्यागपत्र की अंतिम वैधता पर कोई फैसला नहीं दिया है। इन सवालों का निर्णय संबंधित सिविल और वैवाहिक मामलों में सक्षम अदालतों द्वारा किया जाएगा।
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