धर्म परिवर्तन मामले में राहत: सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश के व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई पर रोक लगाई
सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश के एक व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही पर रोक लगाई है, जो परिवार को इस्लाम धर्म अपनाने के लिए मजबूर करने का आरोपी है। कोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार को नोटिस जारी किया है। शिकायत करने वाले के पति ने 8 साल पहले याचिकाकर्ता की सलाह पर इस्लाम धर्म अपना लिया था।

सौजन्य से:- ETV Bharat
धर्म परिवर्तन मामला: सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश के व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही पर रोक लगाई
एफआईआर के अनुसार, शिकायत करने वाली महिला के पति ने 8 साल पहले याचिकाकर्ता की सलाह पर इस्लाम धर्म अपना लिया था.
Published : July 9, 2026 at 8:58 PM IST
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक ऐसे व्यक्ति के खिलाफ आगे की आपराधिक कार्यवाही पर रोक लगा दी, जो हिंदू बताया जा रहा है और जिस पर मध्य प्रदेश में एक परिवार को इस्लाम धर्म अपनाने के लिए मजबूर करने का आरोप है.
इस मामले की सुनवाई जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की पीठ ने की. सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि FIR में 8 साल की देरी हुई, क्योंकि शिकायत करने वाली महिला के पति ने 8 साल पहले इस्लाम धर्म अपना लिया था. पीठ को यह भी बताया गया कि याचिकाकर्ता और उसका परिवार हिंदू धर्म को मानता है.
पीठ ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देने वाली उस व्यक्ति की याचिका पर राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है. उच्च न्यायालय ने मध्य प्रदेश धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम की धारा 3 और 5 और IPC की धारा 506 के तहत FIR रद्द करने से मना कर दिया था.
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, "नोटिस जारी करें, जिसका जवाब छह हफ्ते में देना है. मध्य प्रदेश सरकार की ओर से पशुपति नाथ राजदान ने नोटिस स्वीकार कर लिया है. इस बीच, पुलिस स्टेशन जीरापुर, जिला राजगढ़, मध्य प्रदेश की तरफ से मामले में होने वाली आगे की कार्रवाई पर रोक रहेगी."
एफआईआर के अनुसार, शिकायत करने वाली महिला के पति ने 8 साल पहले याचिकाकर्ता की सलाह पर इस्लाम धर्म अपना लिया था, और पिछले डेढ़ साल से उस पर भी कथित तौर पर धर्म बदलने का दबाव डाला जा रहा है.
आरोप है कि एक बार याचिकाकर्ता ने उसे इस्लाम अपनाने का सुझाव दिया.
याचिकाकर्ता ने उच्च न्यायालय के समक्ष दलील दी कि उसे इस कथित अपराध से जोड़ने वाला कोई सबूत नहीं है. उसकी दलील का विरोध करते हुए, राज्य सरकार के वकील ने जांच के दौरान रिकॉर्ड किए गए बयानों पर प्रकाश डाला, जिसमें शिकायत करने वाले के नाबालिग बेटे के बयान भी शामिल थे, जिससे याचिकाकर्ता पर आरोप लगे.
उच्च न्यायालय ने कहा कि पहली नजर में ऐसी सामग्री मौजूद है जो याचिकाकर्ता को कथित अपराध से जोड़ता है.
यह भी पढ़ें- एक घोंघा भी इस मुकदमे की गति पर सवाल उठा सकता है, 2015 के एक मुकदमे पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा
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