चंडीगढ़ अदालत ने झपटमारों को 5 साल की जेल का दिया फैसला
चंडीगढ़ जिला अदालत ने स्नैचिंग के दो आरोपितों को 5 साल की कैद और 25-25 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। अदालत ने कहा कि स्नैचिंग की घटनाएं समाज के लिए नासूर हैं।

सौजन्य से:- Jagran
चंडीगढ़ कोर्ट का कड़ा फैसला, झपटमारों को 5 साल की जेल, कहा- 'स्नैचिंग समाज के लिए नासूर'
चंडीगढ़ जिला अदालत ने स्नैचिंग के दो आरोपितों को पांच-पांच साल की कैद और 25-25 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई है। अदालत ने कहा कि स्नैचिंग की घटनाएं ...और पढ़ें
HighLights
- कोर्ट ने कहा-चंडीगढ़ की सड़कों पर दहशत का माहौल।
- दोषियों पर 25-25 हजार रुपये जुर्माना भी लगाया गया।
- कहा- ऐसे मामलों में नरमी बरतने का कोई आधार नहीं बनता।
जागरण संवाददाता, चंडीगढ़। शहर में स्नैचिंग की घटनाएं काफी बढ़ चुकी हैं। ऐसे में स्नैचिंग के एक मामले में चंडीगढ़ जिला अदालत ने कड़ा फैसला सुनाते हुए दो युवकों को पांच-पांच साल की सजा सुनाई।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि स्नैचिंग की घटना समाज के लिए नासूर बन चुकी हैं। इन घटनाओं ने सड़क पर चलने वाले लोगों, पैदल यात्रियों और दोपहिया वाहन चालकों के मन में भय पैदा कर दिया है। ऐसे मामलों में नरमी बरतने का कोई आधार नहीं है।
अदालत ने दोषियों दड़वा निवासी राहुल सैनी उर्फ छैला और राबिन कुमार उर्फ जट्ट को सजा भुगतने के साथ-साथ 25-25 हजार रुपये जुर्माना भरने के भी निर्देश दिए। यह कार्रवाई 17 फरवरी 2024 की घटना पर हुई है।
एफसीआई राजपुरा में मजदूरी करने वाले राम अवध रात करीब 9.40 बजे हल्लोमाजरा लाइट पाइंट से सुंदरनगर स्थित घर की ओर पैदल जा रहे थे। रास्ते में दो युवकों ने उन्हें रोक लिया और उनका मोबाइल, आधार कार्ड और पांच हजार रुपये छीन लिए।
आरोपित वारदात को अंजाम देने के बाद मौके से फरार हो गए। करीब एक सप्ताह बाद पुलिस ने दोनों आरोपितों को पकड़ लिया। उनके कब्जे से पीड़ित का मोबाइल, आधार कार्ड और 1300 रुपये बरामद हुए, जिसकी पहचान शिकायतकर्ता ने मौके पर ही कर ली।
अदालत ने नहीं मानी दोषियों की दलीलें
दोनों दोषियों के वकीलों ने उनका पक्ष रखते हुए कहा कि इनकी गिरफ्तारी सात दिन बाद हुई। शिकायत में इनका हुलिया दर्ज नहीं था और बरामदगी के समय कोई स्वतंत्र गवाह मौजूद नहीं था।
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हालांकि, अदालत ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि हर मामले की शिकायत में आरोपित का विस्तृत हुलिया देना कानूनी अनिवार्यता नहीं है। यदि पुलिस अधिकारियों की गवाही विश्वसनीय हो तो केवल स्वतंत्र गवाह न होने से अभियोजन का मामला कमजोर नहीं होता।
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