देर रात फ़ोन पर बातचीत करने को चरित्रहीन नहीं माना जा सकता: कोर्ट
दिल्ली की एक अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी महिला का देर रात किसी पुरुष से फ़ोन पर बात करना उसके चरित्र पर संदेह करने का आधार नहीं हो सकता। अदालत ने कहा कि बिना ठोस और उचित कारण किसी महिला के कॉल डिटेल रिकॉर्ड (सीडीआर) सुरक्षित रखने या उसकी निजता में दखल देने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

सौजन्य से:- Navbharat Times
दिल्ली की एक अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी महिला का देर रात किसी पुरुष से फोन पर बात करना उसके चरित्र पर संदेह करने का आधार नहीं हो सकता। अदालत ने कहा कि बिना ठोस और उचित कारण किसी महिला के कॉल डिटेल रिकॉर्ड (सीडीआर) सुरक्षित रखने या उसकी निजता में दखल देने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
नई दिल्ली: क्या बीवी के देर रात तक फोन पर किसी से बात करना उसके चरित्र के लिए लांछन बन सकता है? क्या यह उस पर गलत शक किए जाने का आधार बन सकता है? दिल्ली की साकेत अदालत में घरेलू हिंसा से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान पति ने अपनी पत्नी और एक अन्य व्यक्ति के कॉल डिटेल रिकॉर्ड ( सीडीआर ) सुरक्षित रखने की मांग की थी। अदालतों ने पति की अपील तो ठुकराई ही, उसे एक सीख भी दी...
अदालत में मामला और फैसला
पति के इस दिमागी कीड़े को शुरुआत में ही ट्रायल कोर्ट ने दूर कर दिया था। ट्रायल कोर्ट ने इस मांग को खारिज कर दिया था। फिर भी पति को उस फैसले से संतुष्टि नहीं हुई और फिर उसने सत्र अदालत में अपील की। वहां भी अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश शुनाली गुप्ता ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को सही ठहराते हुए अपील भी खारिज कर दी। 2 जून के अपने फैसले में साकेत की अदालत ने कहा कि केवल संदेह के आधार पर किसी व्यक्ति की निजी जानकारी सुरक्षित रखने का आदेश नहीं दिया जा सकता।
क्या पत्नी बिना 'तलाक' लिए पति से अलग रह सकती है, पति-पत्नी के क्या 'अधिकार' होते हैं, इस बारे में नया कानून क्या हैन्यायालय ने माना कि ऐसा आदेश सीधे तौर पर व्यक्ति की निजता के अधिकार को प्रभावित करता है। मामले में पति का तर्क था कि पत्नी देर रात कुछ लोगों से लगातार बातचीत करती थी और भविष्य में ये रिकॉर्ड सेवा प्रदाता द्वारा मिटाए जा सकते हैं। न्यायालय ने कहा कि आधुनिक भारतीय समाज में महिलाएं हर क्षेत्र में काम कर रही हैं और उनके पुरुष सहकर्मियों से बातचीत सामान्य सामाजिक और पेशेवर व्यवहार का हिस्सा है।
किसी महिला का रात में किसी पुरुष से फोन पर बातचीत करना अपने आप में उसके चरित्र पर सवाल नहीं खड़ा करता। यदि किसी अवैध या विवाहेतर संबंध का कोई ठोस आरोप या प्रमाण मौजूद नहीं है तो केवल कॉल के समय को आधार बनाकर निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
साकेत कोर्ट, दिल्ली
निजता का अधिकार भी संवैधानिक सुरक्षा का हिस्सा
मामले में अदालत ने साफ किया कि किसी व्यक्ति के कॉल डिटेल रिकॉर्ड सुरक्षित रखने या उन्हें मंगाने का आदेश उसकी निजता में हस्तक्षेप माना जाएगा। यदि केवल आशंका या शक के आधार पर ऐसे आदेश दिए जाने लगें तो यह नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होगा। न्यायालय ने पाया कि पति की ओर से ऐसी कोई ठोस सामग्री पेश नहीं की गई जिससे सीडीआर सुरक्षित रखने की आवश्यकता साबित हो सके।
फैसले में अदालत ने कहा कि भारतीय समाज अब उस दौर में नहीं है जहां किसी महिला का पुरुष से बातचीत करना सामाजिक वर्जना माना जाए। आज महिलाएं कॉर्पोरेट क्षेत्र, सरकारी सेवाओं, निजी कंपनियों और विभिन्न पेशेवर क्षेत्रों में पुरुषों के साथ काम करती हैं। ऐसे में उनके बीच फोन पर बातचीत होना पूरी तरह सामान्य बात है।
अदालत का यह फैसला महिलाओं की गरिमा, समानता और निजता के अधिकार को मजबूत करने वाला महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है।
कोर्ट की यह टिप्पणी लैंगिक समानता और महिलाओं की स्वतंत्र पहचान को न्यायिक मान्यता देती है। साथ ही यह संदेश भी देती है कि सामाजिक रूढ़ियों को कानूनी मानक नहीं बनाया जा सकता।
यह निर्णय न्यायिक सोच में बदलते सामाजिक मूल्यों और संवैधानिक अधिकारों के महत्व को भी रेखांकित करता है। और इस बात को स्थापित करता है कि कानून का आधार पूर्वाग्रह नहीं, बल्कि तथ्य और साक्ष्य होने चाहिए।
लेखक के बारे मेंमनीष राजमनीष राज फिलहाल नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में कंसलटेंट लीगल एडिटर के पद पर सेवारत हैं। इनकी पत्रकारिता की शुरूआत 24 वर्ष पहले राष्ट्रीय सहारा जैसे प्रमुख नेशनल न्यूज ब्रॉडकास्ट मीडिया चैनल से हुई। इन्होंने कानून (L.L.B.) और अर्थशास्त्र में स्नातक के साथ पत्रकारिता व जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा किया हुआ है। भारत के कानूनी ढांचे के विभिन्न आयामों और उनके व्यावहारिक पहलुओं को इन्होंने गहराई से अध्ययन किया है।वर्ष 2018 में मनीष राज, इंडिया लीगल ग्रुप से जुड़े, जिससे कानून के क्षेत्र में इनकी रुचि जगी। यहां इन्होंने कानून की बारीकियों के साथ साथ सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की गतिविधियों और प्रक्रियाओं को नजदीक से देखा। इस तरह से पिछले सात सालों से पेशेवर लीगल स्टोरी लेखन-संपादन के साथ साथ इनका कानूनी गतिविधियों और केस लॉ की बारीकियों को विश्लेषण करने का काम जारी है। इनके लिखे लेख अक्सर न्यायपालिका और आम जनता के बीच एक सेतु का काम करते हैं, और अदालती कार्यवाहियों पर व्यवस्थित रिपोर्टिंग उपलब्ध कराते हैं। ये सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के सदस्य भी रहे हैं, जहां इन्होंने देश के कई प्रसिद्ध वकीलों के साथ काम करने का अनुभव हासिल किया है।इन्हें सामाजिक न्याय, मानवाधिकार, कॉर्पोरेट और संवैधानिक कानून जैसे विषयों पर लिखना पसंद है। इनके लिखने का उद्देश्य है कि आम जनता के साथ-साथ और युवा वकील भी न्यायिक फैसलों और कानून की जटिलताओं को समझ सकें और कानूनी जागरूकता बढ़े। इनकी लेखन शैली सटीक, तथ्य-आधारित और पाठकों के लिए समझने में सरल है।विशेषताएँ:• सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायिक फैसलों का सरल भाषा में लेखन और विश्लेषण • केस लॉ का सरल भाषा में विस्तार • आम जन, युवा वकीलों और छात्रों के लिए मार्गदर्शन • ब्लॉग और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर सक्रिय लेखन... और पढ़ें
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