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पत्नी को घर मिलने से गुज़ारा-भत्ता मांगने के अधिकार से वंचित नहीं हो सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि पत्नी को घर मिलने से गुज़ारा-भत्ता मांगने के अधिकार से वंचित नहीं हो सकती है। कोर्ट ने पति द्वारा दायर एक क्रिमिनल रिविज़न याचिका खारिज की, जिसमें उन्होंने पत्नी के इस्तेमाल किए जाने वाले घर के रूप में प्रधानमंत्री आवास योजना केउदार होने का हवाला देते हुए गुज़ारा-भत्ता मांगने के अधिकार से मुक्त होने की मांग की थी।

28 जून 2026 को 01:24 pm बजे
पत्नी को घर मिलने से गुज़ारा-भत्ता मांगने के अधिकार से वंचित नहीं हो सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट

सौजन्य से:- Live Law Hindi

कल्याणकारी योजना के तहत पत्नी को घर मिलने से वह CrPC की धारा 125 के तहत गुज़ारा-भत्ता मांगने के अधिकार से वंचित नहीं होती: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Shahadat

28 Jun 2026 5:55 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि किसी कल्याणकारी योजना के तहत महिला को घर मिलना उसकी आजीविका का साधन नहीं माना जा सकता, जिससे वह अपने पति से CrPC की धारा 125 के तहत गुज़ारा-भत्ता मांगने के अधिकार से वंचित हो जाए।

जस्टिस गरिमा प्रसाद की बेंच ने यह भी कहा कि पति केवल यह कहकर अपनी पत्नी का भरण-पोषण करने की कानूनी ज़िम्मेदारी से नहीं बच सकता कि वह बेरोज़गार है या बहुत कम कमाता है।

इन बातों को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने पति द्वारा दायर एक क्रिमिनल रिविज़न याचिका खारिज की। इस याचिका में फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसमें उसे अपनी अलग रह रही पत्नी (प्रतिवादी नंबर 2) को 5,000 रुपये गुज़ारा-भत्ता देने का निर्देश दिया गया था।

रिविज़न याचिका दायर करने वाले पति का कहना था कि वह अनपढ़ है और ड्राइवर के तौर पर काम करता है, जिससे वह महीने में लगभग 5,000 रुपये कमाता है, लेकिन अभी वह बेरोज़गार है।

यह भी कहा गया कि उसकी पत्नी (विपक्षी पार्टी नंबर 2) सिलाई-कढ़ाई का काम करके कमाती है और उसे प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत एक घर भी मिला है।

याचिकाकर्ता पति के अनुसार, उसने कभी अपनी पत्नी की उपेक्षा नहीं की और सुलह की कोशिशें भी की थीं।

इसलिए यह तर्क दिया गया कि फैमिली कोर्ट ने पति की आर्थिक क्षमता से ज़्यादा गुज़ारा-भत्ता तय करके गलती की।

दूसरी ओर, पत्नी ने फैमिली कोर्ट के सामने दलील दी थी कि दिसंबर 2016 में शादी के बाद उसे अतिरिक्त दहेज के लिए क्रूरता और उत्पीड़न का शिकार बनाया गया, जिसके कारण उसे अपना ससुराल छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा।

उसने कहा कि पर्याप्त साधन होने के बावजूद, उसके पति ने उसकी उपेक्षा की और उसका भरण-पोषण करने से इनकार कर दिया।

दोनों पक्षकारों की दलीलों पर विचार करते हुए जस्टिस प्रसाद ने शुरुआत में ही इस बात पर ज़ोर दिया कि CrPC की धारा 125 सामाजिक न्याय का एक उपाय है, जिसका मकसद महिलाओं को उपेक्षा और परित्याग से बचाना है।

सिंगल जज ने 'चतुर्भुज बनाम सीता बाई 2007' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का ज़िक्र किया, जिसमें कहा गया कि "अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ" होने का मतलब यह नहीं है कि गुज़ारा-भत्ता मांगने से पहले पत्नी का पूरी तरह से बेसहारा होना ज़रूरी है। बेंच ने 'भुवन मोहन सिंह बनाम मीना 2014' मामले का भी ज़िक्र किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गुज़ारा-भत्ता (मेंटेनेंस) की कार्यवाही का मकसद यह पक्का करना है कि पत्नी सम्मान के साथ जी सके और उसे आर्थिक तंगी का सामना न करना पड़े।

इन फैसलों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने पत्नी की कथित आय और कल्याणकारी लाभों के बारे में पति की दलील को पूरी तरह से खारिज कर दिया।

कोर्ट ने कहा कि "सिर्फ़ दावों या बयानों को, जिनके समर्थन में कोई ठोस सबूत न हो, आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने का सबूत नहीं माना जा सकता"।

सरकारी आवास योजना के तहत घर मिलने के मुद्दे पर हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी की:

"इसी तरह किसी कल्याणकारी योजना के तहत रिहायशी घर मिलने को आजीविका का साधन नहीं माना जा सकता, जिसके आधार पर पत्नी को गुज़ारा-भत्ता मांगने से रोका जा सके"।

हाईकोर्ट ने पति की बेरोज़गारी की दलील को भी खारिज किया। कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के इस निष्कर्ष का हवाला दिया कि वह एक कुशल ड्राइवर है और शारीरिक रूप से सक्षम व्यक्ति है, जो कमाने में समर्थ है।

इस प्रकार, बेंच ने निष्कर्ष निकाला कि गुज़ारा-भत्ते की राशि मामूली थी और मौजूदा जीवन-यापन की लागत को देखते हुए पूरी तरह उचित थी।

जस्टिस प्रसाद ने यह भी कहा कि रिविजनल कोर्ट (पुनरीक्षण अदालत) अपील कोर्ट की तरह काम नहीं करती कि वह सिर्फ़ इसलिए सबूतों का दोबारा मूल्यांकन करे, क्योंकि मामले में कोई दूसरा नज़रिया भी संभव हो सकता है।

बेंच ने याचिका खारिज करते हुए कहा,

"हस्तक्षेप तभी ज़रूरी है जब निष्कर्षों में स्पष्ट गैर-कानूनीपन, मनमानापन या ऐसी बड़ी अनियमितता हो, जिससे न्याय में बाधा आती हो। मौजूदा मामले में ऐसी कोई कमी नहीं दिखाई गई।"

Case Title: Mannan @ Abdul Mannan vs State Of UP and another 2026 LiveLaw (AB) 336

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