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सुप्रीम कोर्ट के पाँच प्रमुख निर्णय: नोटिस वैधता, समझौते की अमान्यता, पटाखे नियम, अवैध निर्माण ध्वंस

इस वीकली राउंड‑अप में सुप्रीम कोर्ट ने चार प्रमुख आदेशों पर प्रकाश डाला: 1) नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट के तहत कानूनी डिमांड नोटिस ड्रॉअर के पते पर भेजे जाने पर वैध रहता है, भले ही परिवार के सदस्य को मिले। 2) ज़रूरी पक्ष के बिना दिया गया समझौता आदेश अमान्य है, और वह पक्ष रीकॉल एप्लीकेशन दायर कर सकता है। 3) पटाखों पर पूर्ण बंद नहीं, पर समय व प्रकार को नियंत्रित कर के संतुलन बनाया जाए। 4) मेरठ में 16,726 अवैध निर्माण तुरंत गिराने का आदेश जारी किया गया।

3 अक्टूबर 2026 को 05:04 pm बजे
सुप्रीम कोर्ट के पाँच प्रमुख निर्णय: नोटिस वैधता, समझौते की अमान्यता, पटाखे नियम, अवैध निर्माण ध्वंस

सौजन्य से:- Live Law Hindi

सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप : सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र

Shahadat

3 Oct 2026 9:59 PM IST

सुप्रीम कोर्ट में पिछले सप्ताह (28 सितंबर, 2026 से 02 अक्टूबर, 2026 तक) तक क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप। पिछले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।

S. 138 NI Act | चेक बाउंस होने पर ड्रॉअर के पते पर भेजा गया नोटिस, परिवार के सदस्य को मिलने पर भी वैध माना जाएगा: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (30 सितंबर) को कहा कि नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 (NI Act) के तहत कानूनी डिमांड नोटिस को सिर्फ़ इसलिए अमान्य नहीं माना जा सकता कि वह ड्रॉअर के परिवार के किसी सदस्य को मिला था, जबकि नोटिस ड्रॉअर के सही पते पर रजिस्टर्ड पोस्ट से भेजा गया।

जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने केरल हाईकोर्ट का वह फ़ैसला पलट दिया, जिसमें ड्रॉअर की सज़ा को सिर्फ़ इस आधार पर रद्द कर दिया गया कि कानूनी डिमांड नोटिस उसे व्यक्तिगत रूप से नहीं, बल्कि उसकी माँ को मिला था, जो ड्रॉअर द्वारा दिए गए पते पर रहती हैं।

Case Title : SAINABA VERSUS STATE OF KERALA & ANR.

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ज़रूरी पक्ष को शामिल किए बिना हासिल किया गया समझौता आदेश अमान्य: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संयुक्त परिवार की संपत्ति (Coparcenary Property) के बंटवारे के मुकदमे में ज़रूरी पक्ष को शामिल किए बिना हासिल किया गया समझौता आदेश अमान्य (Nullity) होता है। इसलिए, जिस ज़रूरी पक्ष को शामिल नहीं किया गया, वह उस कोर्ट में समझौता आदेश के खिलाफ 'रिकॉल एप्लीकेशन' (आदेश को वापस लेने की अर्ज़ी) दायर करने का हकदार है, जिसने वह आदेश पारित किया।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने मामले की सुनवाई की। इसमें अपीलकर्ता संपत्ति के मालिक की दिवंगत बेटी के कानूनी वारिस हैं (मालिक की मृत्यु बिना वसीयत के हुई)। अपीलकर्ताओं ने हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत अपने नाना की संपत्ति में 1/4 हिस्सा मांगा, क्योंकि संपत्ति उनके चार बच्चों (जिनमें अपीलकर्ताओं की दिवंगत मां भी शामिल थीं) के बीच समान रूप से बंटनी है।

Cause Title: GEETA BAI & ORS. VERSUS K. ARJUN SINGH & ORS.

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पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध से सुप्रीम कोर्ट का इनकार

सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि वह पटाखों पर पूरी तरह रोक नहीं लगाएगा और न ही उनके बेरोकटोक इस्तेमाल की इजाज़त देगा। कोर्ट ने धार्मिक भावनाओं और बच्चों, बुज़ुर्गों व बीमार लोगों पर वायु प्रदूषण के बुरे असर के बीच संतुलन बनाने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया।

जस्टिस एमएम सुंदरेश ने कहा, "हम यह बात साफ़ कर देना चाहते हैं। न तो हम पूरी तरह रोक लगाने की आपकी बात मानेंगे और न ही हम उन्हें 24 घंटे पटाखे फोड़ने की इजाज़त देंगे। इसके दो कारण हैं। पहला, पूरी तरह रोक लगाने से लोगों की भावनाओं पर असर पड़ सकता है। दूसरा, पूरे दिन पटाखे फोड़ने की इजाज़त देने से बुज़ुर्गों, बीमार लोगों और बच्चों समेत सभी जीवित प्राणियों पर बहुत बुरा असर पड़ेगा। हमें कोई ऐसा समाधान निकालना होगा, जिसमें हम पटाखे फोड़ने का एक तय समय बता सकें और यह भी तय कर सकें कि किस तरह के पटाखे इस्तेमाल किए जा सकते हैं।"

Case Title : Arjun Gopal v. Union of India

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सुप्रीम कोर्ट का आदेश: मेरठ में गिराये जाएं 16,726 अवैध निर्माण

सुप्रीम कोर्ट ने मेरठ अधिकारियों को ज़ोन A में पहचाने गए 16,726 अवैध निर्माणों को गिराने के लिए तुरंत कदम उठाने और शहर के बाकी हिस्सों में बचे अवैध निर्माणों को भी गिराने का आदेश दिया। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने निर्देश दिया कि पहचाने गए अवैध निर्माणों में रहने वालों से पहले जगह खाली करने को कहा जाए और उसके बाद उन निर्माणों को सील करके गिरा दिया जाए।

Cause Title: LOKESH KUMAR KHURANA VS. RAJENDRA KUMAR BARJATYA, CONMT.PET.(C) No. 877/2025 in C.A. No. 14604/2024, BIMALENDU PRADHAN v. STATE OF ODISHA and connected cases.

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