सुप्रीम कोर्ट में अकादमिक जजों के लिए उज्ज्वल भुइयां की अपील
जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने सुप्रीम कोर्ट में प्रख्यात कानून विद्वानों को जज के रूप में नियुक्त करने की वकालत की, यह बताते हुए कि संविधान के अनुच्छेद 124(3)(सी) के तहत ऐसा प्रावधान मौजूद है, परंतु पिछले 76 वर्षों में केवल हाई कोर्ट के जजों या वकीलों को ही पद मिला है। उन्होंने चिंता जताई कि या तो केंद्रीय सरकार और कॉलेजियम यह महसूस करते हैं कि भारतीय अकादमिक क्षेत्र में पर्याप्त गहराई नहीं है, या इस संवैधानिक प्रावधान को अभी तक अनदेखा किया गया है।

सौजन्य से:- Hindustan
प्रख्यात कानूनविद सुप्रीम कोर्ट में जज बनाए जाएं: जस्टिस भुइयां
- कहा- लोकतांत्रिक समाज की शुरुआत विश्वविद्यालयों से हो नई दिल्ली, एजेंसी। सुप्रीम कोर्ट
नई दिल्ली, एजेंसी। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने रविवार को शीर्ष अदालत में ‘प्रख्यात कानूनविदों’ को जज नियुक्त किए जाने की वकालत की। उन्होंने कहा कि अब तक किसी कानूनी शिक्षाविद को सुप्रीम कोर्ट का जज नियुक्त नहीं किया गया है। देश में ऐसे कई प्रतिभाशाली लोग हैं, जो अगर पीठ का हिस्सा बनते तो न्याय व्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते थे।
जजों की नियुक्ति के लिए कानून का प्रावधान
दिल्ली स्थित राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर छात्रों के 13वें दीक्षांत समारोह में जस्टिस भुइयां ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 124(3)(सी) में ऐसे व्यक्ति को सुप्रीम कोर्ट का जज नियुक्त करने का प्रावधान है, लेकिन पिछले 76 वर्षों में हाई कोर्ट के जजों या वकीलों के अलावा कोई अन्य व्यक्ति सुप्रीम कोर्ट तक नहीं पहुंचा है। उन्होंने इसे अफसोसजनक बताया। गौरतलब है कि संविधान का यह अनुच्छेद राष्ट्रपति को ऐसी नियुक्ति करने की शक्ति देता है।
कानूनी शिक्षाविदों की नियुक्तियों पर चिंता
उन्होंने कहा कि ऐसा लगता है कि या तो केंद्र सरकार और कॉलेजियम को लगता है कि भारतीय अकादमिक जगत में इतनी गहराई नहीं है कि किसी कानून विशेषज्ञ को जज पद के लिए गंभीरता से विचार योग्य माना जाए या फिर दोनों ने अब तक इस संवैधानिक प्रावधान को गंभीरता से तलाशा ही नहीं है। उन्होंने कहा कि अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और केन्या समेत कई देशों में प्रतिष्ठित कानून शिक्षाविदों को संवैधानिक अदालतों में जज नियुक्त किया जाता है।
छात्रों के विचारों पर स्वतंत्रता
‘सवाल पूछने पर छात्रों को सजा देना असंवैधानिक’
जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने कहा कि छात्रों के अलग विचार रखने या सवाल पूछने पर उन्हें दंडात्मक कार्रवाई की धमकी नहीं दी जा सकती। ऐसा करना असंवैधानिक है और सत्ता या पद का दुरुपयोग है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय ऐसी जगह होनी चाहिए जहां स्थापित विचारों और मान्यताओं की जांच और उन पर सवाल किए जा सकें। असहमति का जवाब दुश्मनी के रूप में नहीं दिया जाए। लोकतंत्र की असली पहचान तब होती है जब अलग-अलग विचार रखने वाली आवाजें एक साथ रह सकें, उन्हें सुना जाए और उनके साथ सम्मान का व्यवहार किया जाए।
लोकतंत्र में विचारों की विविधता
‘अलग-अलग विचारों को सुनें तभी लोकतंत्र सार्थक’
जस्टिस भुइयां ने कहा कि लोकतंत्र तब सार्थक नहीं होता जब हर व्यक्ति एक ही तरह से सोचता और बोलता है। लोकतंत्र की असली पहचान तब होती है जब अलग-अलग विचार रखने वाली आवाजें एक साथ रह सकें, उन्हें सुना जाए और उनके साथ सम्मान का व्यवहार किया जाए। उन्होंने कहा कि हमारा संविधान अलग तरीके से बोलने, सोचने और विश्वास रखने की स्वतंत्रता की रक्षा करता है।
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