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सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस ने चेतावनी दी: छात्रों के सवाल पूछने पर धमकाना असंवैधानिक

राष्ट्रीय लॉ यूनिवर्सिटी के एलएलएम दीक्षांत समारोह में जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने बताया कि सवाल पूछना और अलग राय रखना लोकतांत्रिक नागरिकता का मूल है। उन्होंने चेतावनी दी कि असहमति पर छात्रों को धमकाना या दंडित करना संविधान के खिलाफ है और विश्वविद्यालयों में स्वतंत्र विचार को बढ़ावा देना ज़रूरी है।

30 अगस्त 2026 को 11:31 am बजे
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस ने चेतावनी दी: छात्रों के सवाल पूछने पर धमकाना असंवैधानिक

सौजन्य से:- Navbharat Times

Justice Ujjal Bhuyan News: दिल्ली स्थित नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के एलएलएम दीक्षांत समारोह में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने अहम टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि सवाल पूछने का अधिकार लोकतांत्रिक नागरिकता का मूल तत्व है। असहमति रखने पर छात्रों को धमकाया या दंडित नहीं किया जा सकता।

राजेश चौधरी, नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने कहा है कि केवल इसलिए छात्रों को धमकाया या उनके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जा सकती, कि उन्होंने पद पर बैठे अधिकारियों या अथॉरिटी के लोगों से अलग विचार व्यक्त किए हैं। उन्होंने कहा कि सवाल पूछने का अधिकार लोकतांत्रिक नागरिकता का मूल तत्व है। दिल्ली स्थित नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के एलएलएम दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए जस्टिस भुइयां ने कहा कि लोकतंत्र में सवाल पूछने का अधिकार अवज्ञा का कृत्य नहीं है। यह नागरिकता, स्वतंत्रता और संवैधानिक जिम्मेदारी की अनिवार्य अभिव्यक्ति है।

जस्टिस भुइयां ने कहा सवाल पूछने पर छात्रों को नहीं धमका सकते और इसके लिए उन्हें सजा देना संविधान के खिलाफ है। विश्वविद्यालयों में मुक्त विचार और कठिन सवालों की जगह होनी चाहिए। इस मौके पर जस्टिस भुइयां ने कहा कि छात्रों को अलग राय रखने पर दंडात्मक कार्रवाई की धमकी देना न केवल असंवैधानिक है, बल्कि यह सत्ता और पद का दुरुपयोग भी है।

'लोकतंत्र का अर्थ यह नहीं कि सभी लोग एक ही तरह सोचें'

जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने कहा कि संवैधानिक लोकतंत्र का अर्थ यह नहीं है कि सभी लोग एक ही तरह सोचें। संविधान अलग-अलग विश्वास, विचार और मान्यताओं वाले लोगों को समान गरिमा के साथ रहने और लोकतांत्रिक जीवन में भाग लेने का ढांचा देता है। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक समाज इस आधार पर नहीं बनाया जा सकता कि हर व्यक्ति एक जैसा सोचे। मतभेद स्वाभाविक हैं और उन्हें व्यापक संवैधानिक ढांचे के भीतर स्वीकार करना जरूरी है। उनके मुताबिक, असहमति के लिए जगह के बिना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, विचारों की स्वतंत्रता और सार्वजनिक जीवन में भागीदारी का वास्तविक अर्थ ही समाप्त हो जाएगा।

'असहिष्णुता भी हिंसा का एक रूप... भारत बुद्ध और गांधी की भूमि है'

जस्टिस भुइयां ने असहिष्णुता को संविधान की भावना के विपरीत बताया। उन्होंने कहा कि असहिष्णु मानसिकता संविधान की मूल भावना से मेल नहीं खाती और यह एक अन्य प्रकार की हिंसा बन सकती है। उन्होंने कहा कि भारत बुद्ध और गांधी की भूमि है। भारतीय समाज में हिंसा और असहिष्णुता के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए। संविधान बोलने, सोचने और अलग विश्वास रखने की स्वतंत्रता की रक्षा करता है। जब असहमति को वैध मतभेद के बजाय दबाने, खारिज करने या दंडित करने योग्य चीज समझा जाने लगे, तब असहिष्णुता संवैधानिक ढांचे को कमजोर करती है।

विश्वविद्यालयों में शुरू हो मुक्त सोच: जस्टिस भुइयां

जस्टिस भुइयां ने कहा कि स्वतंत्रता और विविधता का सम्मान करने वाले लोकतांत्रिक समाज की संस्कृति विश्वविद्यालयों से शुरू होनी चाहिए। विश्वविद्यालय ऐसे स्थान होने चाहिए जहां छात्र स्वतंत्र रूप से सोचें, स्थापित धारणाओं पर सवाल उठाएं और असहज या कठिन विचारों पर भी चर्चा करें। छात्रों को केवल इस डर से कठिन सवाल पूछने से नहीं हिचकना चाहिए कि उसका जवाब असहज हो सकता है। कानून के क्षेत्र में यह और महत्वपूर्ण है, क्योंकि कानून अक्सर ऐसी परिस्थितियां सामने लाता है जहां एक व्यक्ति की स्वतंत्रता दूसरी की स्वतंत्रता से टकराती है और सत्ता के इस्तेमाल को व्यक्तिगत अधिकारों के साथ संतुलित करना पड़ता है।

NALSAR विवाद के बीच जस्टिस भुइयां की टिप्पणी अहम

जस्टिस भुइयां की ये टिप्पणियां हैदराबाद स्थित NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के हालिया विवाद के आलोक में महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं। वहां छात्रों ने चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया जस्टिस सूर्यकांत की दीक्षांत समारोह में प्रस्तावित भागीदारी पर आपत्ति जताई थी। इसके बाद बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने जांच पूरी होने तक NALSAR के 2026 बैच के छात्रों के नामांकन पर रोक लगाने संबंधी निर्देश दिया था। भारी विरोध के बाद यह सर्कुलर वापस ले लिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने भी BCI की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए छात्रों और शिक्षकों के खिलाफ दंडात्मक कदम नहीं उठाने का निर्देश दिया था।

लेखक के बारे मेंराजेश चौधरीराजेश चौधरी 2007 से नवभारत टाइम्स से जुड़े हुए हैं। वह दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट, निचली अदालत और सीबीआई से जुड़े विषयों को कवर करते हैं और स्पीड न्यूज में भी आपको इस बारे में खबर देते रहेंगे। यदि आपके पास कोर्ट से जुड़े मामलों की कोई सूचना है तो आप उनसे इस ईमेल अड्रेस - journalistrajesh@gmail.com - पर संपर्क कर सकते हैं।... और पढ़ें

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