सुप्रीम कोर्ट ने नालसा को लोक अदालत सदस्यों के वेतन सुधार पर विचार करने का निर्देश दिया
सुप्रीम कोर्ट ने नालसा से कहा कि स्थायी लोक अदालत सदस्यों के बढ़ते कार्यभार को देखते हुए उनका वेतन बेहतर किया जाए, लेकिन फंड उपयोग पर प्रतिबंधों के कारण सीधे वेतन बढ़ाने का आदेश नहीं दिया जा सकता। सदस्यों को संबंधित हाईकोर्ट से संपर्क कर अनुदान की स्थिति जांचने की सलाह दी गई, क्योंकि 14 सदस्यों ने याचिका में वेतन संरचना को भेदभावपूर्ण बताया था।

सौजन्य से:- Hindustan
लोक अदालत सदस्यों के बेहतर वेतन की मांग पर विचार करे नालसा
सुप्रीम कोर्ट ने नालसा से स्थायी लोक अदालत के सदस्यों की बेहतर वेतन की मांग पर विचार करने को कहा है। पीठ ने स्पष्ट किया कि फंड के इस्तेमाल पर पाबंदियों के कारण वह सीधे वेतन बढ़ाने का निर्देश नहीं दे सकती। सदस्यों को संबंधित हाईकोर्ट से संपर्क करने की सलाह दी गई। 14 सदस्यों ने वेतन संरचना को भेदभावपूर्ण बताते हुए याचिका दायर की थी।
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को नेशनल लीगल सर्विसेज अथॉरिटी (नालसा) से कहा कि वह स्थायी लोक अदालत के सदस्यों के बढ़े हुए काम और अधिकार क्षेत्र को देखते हुए उनके बेहतर वेतन की मांग पर विचार करे। मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने सदस्यों से कहा कि ऐसे न्यायिक निर्देश जारी करने में व्यावहारिक मुश्किलें हैं। सीजेआई कांत ने कहा कि कानूनी सेवा प्राधिकरणों को दिए गए फंड के इस्तेमाल पर कुछ पाबंदियां हैं और इसलिए, सुप्रीम कोर्ट सीधे तौर पर भुगतान बढ़ाने का निर्देश नहीं दे सकता। उन्होंने कहा कि हम इन पाबंदियों पर विचार किए बिना सीधे भुगतान का निर्देश नहीं दे सकते।
संबंधित हाईकोर्ट से संपर्क करना बेहतर होगा, जो राज्यों से मिलने वाले अनुदान के आधार पर इस मामले की जांच कर सकते हैं। शीर्ष अदालत 14 लोक अदालत सदस्यों की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। उनका तर्क था कि स्थायी लोक अदालत (अध्यक्ष और अन्य व्यक्तियों की नियुक्ति की अन्य शर्तें और नियम) नियम, 2003 का नियम 3 भेदभावपूर्ण है, क्योंकि इसमें ऐसे निकायों के अध्यक्ष और अन्य सदस्यों के लिए अलग-अलग वेतन संरचना तय की गई थी।
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