सुप्रीम कोर्ट ने कहा: शादी से इनकार को आत्महत्या के उकसाने के रूप में नहीं माना जा सकता
सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि रिश्ते के समाप्त होने या शादी से इनकार को स्वचालित रूप से आत्महत्या के प्रेरक नहीं माना जा सकता और इसके आधार पर अभियोजन पक्ष की आपराधिक मंशा या ज्ञान सिद्ध नहीं होता। इस वजह से छह आरोपियों के खिलाफ दायर अभियोग रद्द कर दिया गया और जेल में बंद होने वाले को रिहा किया गया, क्योंकि कोई ऐसा सबूत नहीं मिला जिससे यह सिद्ध हो सके कि उन्होंने पीड़िता को आत्महत्या के लिए उकसाया।

सौजन्य से:- ETV Bharat
शादी से इनकार या ब्रेकअप का मतलब आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं: सुप्रीम कोर्ट
अदालत ने कहा कि ब्रेकअप के बाद आत्महत्या करने की घटना से ही आरोपी की आपराधिक मंशा या जानकारी साबित नहीं हो जाती.
By Sumit Saxena
Published : October 8, 2026 at 8:03 PM IST
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक मामले में सुनवाई के दौरान कहा कि आपसी सहमति से बने रिश्ते के बाद अगर कोई प्रेमी शादी से इनकार कर देता है तो इसे अपने आप में आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं माना जा सकता.
सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि निजी जिंदगी में मिली निराशाओं पर हर व्यक्ति अलग-अलग तरह से प्रतिक्रिया देता है. शीर्ष अदालत ने कहा कि ब्रेकअप के बाद आत्महत्या करने की घटना से ही आरोपी की आपराधिक मंशा या जानकारी साबित नहीं हो जाती.
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने 5 अक्टूबर को दिए गए एक फैसले में कहा कि ज्यादा से ज्यादा और अगर हम शिकायतकर्ता की बात पर पूरी तरह यकीन भी कर लें तो मामला सिर्फ शादी से इनकार का था, जिसके कारण महिला ने आत्महत्या कर ली.
बेंच ने कहा कि लोग अलग-अलग स्थितियों पर अलग-अलग तरह से प्रतिक्रिया देते हैं. अगर ब्रेकअप के बाद कोई आत्महत्या कर लेता है तो इसे हमेशा आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं कहा जा सकता. शादी से इनकार करने के पीछे महिला को आत्महत्या के लिए मजबूर करने का इरादा नहीं था और न ही आरोपी को यह पता था कि इनकार करने पर वह आत्महत्या कर लेगी.
इसी टिप्पणी के साथ बेंच ने महिला के पार्टनर, उसके माता-पिता, बहन और अन्य लोगों सहित छह आरोपियों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी. बेंच ने कहा कि अगर आरोपी, अपीलकर्ता हिरासत में हैं तो उन्हें तुरंत रिहा किया जाए (बशर्ते किसी और मामले में उनकी जरूरत न हो). अगर वे पहले से ही जमानत पर हैं तो उनके जमानत बॉन्ड रद्द माने जाएंगे.
बेंच ने कहा कि यह बात बिना किसी शक के साबित हो गई है कि मौत आत्महत्या से हुई थी और यह घटना पहले अपीलकर्ता के घर पर हुई थी. बेंच ने कहा, "शिकायतकर्ता ने भी माना है कि पहले अपीलकर्ता के मृतक के साथ पिछले कुछ महीनों से आपसी सहमति से संबंध थे. ऐसे में यह साफ नहीं है कि शिकायतकर्ता मृतक को पहले अपीलकर्ता के घर से क्यों ले गया.
बेंच ने कहा कि जब मृतक महिला का फोन कॉल उसकी बड़ी बहन के पास आया तो उसने आत्महत्या की धमकी को रोकने के लिए कुछ नहीं किया. बेंच ने कहा, "हमें ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जिससे लगे कि आरोपी/अपीलकर्ताओं ने मृतक को आत्महत्या के लिए उकसाया हो. न तो ऐसा कोई इरादा था और न ही इसे आत्महत्या के लिए उकसाना कहा जा सकता है."
यह मामला 2022 में आईपीसी की धारा 306 और धारा 34 (साझा इरादे के साथ आत्महत्या के लिए उकसाना) के तहत दर्ज एफआईआर से जुड़ा है. अभियोजन पक्ष का आरोप था कि मृतक महिला और पहला अपीलकर्ता बचपन के दोस्त थे. उनकी आपसी सहमति से रिश्ता था और वे लगभग तीन महीने तक उसके घर पर साथ रहे थे. आरोप था कि महिला के साथी ने शादी का प्रस्ताव रखा था, जिसे शुरू में मृतक महिला और उसके परिवार ने स्वीकार कर लिया था.
हालांकि बाद में उसके दोस्त ने कथित तौर पर मरने वाले व्यक्ति के बारे में बुरा-भला कहा. जबकि उसकी बहन के होने वाले पति ने शादी का विरोध किया. यह भी आरोप लगाया गया कि आरोपी के माता-पिता, बहन और अन्य लोगों ने उस पर रिश्ता खत्म करने के लिए दबाव डाला. आरोपी ने मामले से बरी होने की मांग की. लेकिन ट्रायल कोर्ट ने दिसंबर 2024 में उनकी याचिका खारिज कर दी. फरवरी 2026 में, तेलंगाना हाई कोर्ट ने भी उनकी पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी.
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