स्थायी लोक अदालत के वेतन पर याचिका, सुप्रीम कोर्ट ने NALSA को समीक्षा का निर्देश दिया
सुप्रीम कोर्ट ने स्थायी लोक अदालत के सदस्यों के वेतन व भत्तों में वृद्धि के याचिका पर नेशनल लीगल सर्विसेज अथॉरिटी (NALSA) से जाँच का आदेश दिया। अदालत ने बताया कि सीधे भुगतान बढ़ाने का निर्देश देना प्रशासनिक कठिनाइयों के कारण संभव नहीं है, अतः इस मुद्दे को प्रशासनिक स्तर पर हल करना आवश्यक है। इस याचिका को NALSA के गवर्निंग काउंसिल में संयुक्त अभ्यावेदन के रूप में रखा जाएगा।

सौजन्य से:- Jagran
सुप्रीम कोर्ट पहुंचा लोक अदालत का मामला, याचिका सुनते ही NALSA को दिया विचार करने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने स्थायी लोक अदालत के सदस्यों के वेतन और भत्तों में वृद्धि की मांग वाली याचिका पर NALSA ...और पढ़ें
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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल लीगल सर्विसेज अथॉरिटी (NALSA) को निर्देश दिया है कि वह स्थायी लोक अदालत के सदस्यों के बढ़े हुए कामकाज और अधिकार क्षेत्र के मद्देनजर उनके बेहतर वेतन और भत्तों की मांग वाली याचिका पर विचार करे।
अदालत ने स्पष्ट किया कि इस तरह के मामलों में सीधे न्यायिक निर्देश जारी करने में प्रशासनिक व व्यावहारिक कठिनाइयां हैं।
चीफ जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने 14 लोक अदालत सदस्यों द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए टिप्पणी की। याचिकाकर्ताओं ने स्थायी लोक अदालत (अध्यक्ष और अन्य व्यक्तियों की नियुक्ति की शर्तें) नियम, 2003' के नियम 3 को भेदभावपूर्ण बताते हुए चुनौती दी थी।
उनका तर्क था कि इस नियम के तहत अध्यक्ष और अन्य सदस्यों के लिए अलग-अलग और असमान वेतन ढांचा तय किया गया है।
सीधा आदेश नहीं कर सकते जारी-SC
सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्य कांत ने कहा कि कानूनी सेवा प्राधिकरणों को आवंटित होने वाले फंड के उपयोग पर कुछ सीमाएं और पाबंदियां होती हैं। इसलिए सुप्रीम कोर्ट सीधे तौर पर भुगतान या मानदेय बढ़ाने का आदेश जारी नहीं कर सकता है।
सीजेआई सूर्यकांत ने कहा, हम इन पाबंदियों पर विचार किए बिना सीधे भुगतान का निर्देश नहीं दे सकते। इसमें फंड के पुनरावंटन का मुद्दा शामिल है। कभी-कभी एक मद में फंड अतिरिक्त होता है और दूसरे में कम, ऐसी चुनौतियों को प्रशासनिक स्तर पर ही हल किया जाना चाहिए।
पीठ ने सुझाव दिया कि इस संबंध में संबंधित हाई कोर्ट से संपर्क करना बेहतर होगा, जो राज्यों से मिलने वाले अनुदान के आधार पर इस मामले की समीक्षा कर सकते हैं।
काम और अधिकार क्षेत्र में बड़ा बदलाव
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता करुणा नंदी ने अदालत को बताया कि वर्तमान में सदस्यों को प्रति बैठक लगभग 2,500 रुपये ही मिलते हैं। उन्होंने तर्क दिया कि पहले स्थायी लोक अदालतें मुख्य रूप से बुनियादी सार्वजनिक सुविधाओं के विवादों तक सीमित थीं, लेकिन अब उनके कार्यक्षेत्र में बड़ा विस्तार हुआ है।
अब ये संस्थाॉएं बैंकिंग, गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों, आवास और शिक्षा से जुड़े जटिल मामलों की भी सुनवाई कर रही हैं। इसके अलावा, इनका आर्थिक अधिकार क्षेत्र भी बढ़कर 1 करोड़ रुपये हो गया है, जो कि जिला उपभोक्ता फोरम की 50 लाख रुपये की सीमा से कहीं अधिक है।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्देश
पंजाब-हरियाणा और दिल्ली हाई कोर्ट में पहले हुए घटनाक्रमों का हवाला देते हुए अधिवक्ता नंदी ने कहा कि हाई कोर्ट ने इस मामले को राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरणों के पास भेज दिया था, जहां से केवल मामूली बढ़ोतरी ही हो सकी।
सभी पक्षों को सुनने के बाद, सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने निर्देश दिया कि इस याचिका को याचिकाकर्ताओं और इसी तरह के अन्य सदस्यों की ओर से एक संयुक्त अभ्यावेदन माना जाए।
अदालत ने याचिकाकर्ताओं को याचिका की एक प्रति NALSA के सदस्य सचिव को सौंपने का निर्देश दिया, ताकि इसे NALSA की गवर्निंग काउंसिल के समक्ष विचार-विमर्श के लिए रखा जा सके।
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