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बुजुर्ग माँ की देखभाल को नहीं बना तलाक का कारण, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने दी पति को राहत

विवेक और सरिता अग्रवाल के वैवाहिक विवाद में पत्नी ने अलग घर की मांग की, जबकि पति अपनी वृद्ध माँ की देखभाल में बाधा महसूस कर रहा था। हाईकोर्ट ने कहा कि केवल अलग रहने की माँग मानसिक क्रूरता नहीं, पर लगातार बिना कारण माँ को छोड़ने का दबाव मानसिक क्रूरता माना जा सकता है। सभी परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने हाईकोर्ट के तहत हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 के तहत तलाक को मंजूरी दी।

2 सितंबर 2026 को 08:33 am बजे
बुजुर्ग माँ की देखभाल को नहीं बना तलाक का कारण, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने दी पति को राहत

सौजन्य से:- Navbharat Times

विवाह के बाद भी व्यक्ति की वृद्ध या बीमार माता-पिता के प्रति नैतिक,कानूनी जिम्मेदारियां खत्म नहीं होतीं। ऐसा मानते हुए छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने मामले में पति को राहत देते हुए तलाक की मंजूरी दे दी।

नई दिल्ली: क्या पत्नी का पति को उसकी बूढ़ी मां से दूर या अलग रहने को कहना जायज है? और फिर इस सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए.. अलग घर में रहने के लिए कहना क्या तलाक का आधार बन सकता है? छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के हालिया फैसले ने इसी सवाल पर महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट की है। Vivek Agrawal v. Sarita Agrawal & Anr. में अदालत ने पति की अपील स्वीकार करते हुए तलाक को तो मंजूरी दी ही...मामले में कोर्ट ने खास तौर से कहा कि शादी किसी व्यक्ति को उसके वृद्ध या बीमार माता-पिता की जिम्मेदारियों को छोड़ने के लिए बाध्य करने का अबाध अधिकार उसके जीवनसाथी को नहीं देती।

दरअसल इस मामले में छत्तीसगढ़ के रहने वाले विवेक अग्रवाल और सरिता अग्रवाल की शादी 12 दिसंबर 2014 को हुई थी। शादी के बाद दोनों के बीच लगातार विवाद होने लगे और पति का कहना था कि पत्नी उस पर अपनी बूढ़ी मां से अलग रहने का दबाव डालती थी। जबकि वह अपने बूढ़ी मां की देखभाल के लिए साथ रहना चाहता था। बाद में हालांकि ...पत्नी की मां ने भी अदालत में माना कि पति की मां बूढ़ी थीं और उन्हें देखभाल की जरूरत थी। मामला अदालत पहुंचा। निचली अदालत में जिला न्यायाधीश ने फैसला सुनाया कि पति यह साबित करने में विफल रहा कि पत्नी ने उसके साथ क्रूरता की थी और तलाक की याचिका खारिज कर दी। इससे व्यथित होकर उसने जिला न्यायालय के आदेश को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट में अपील दायर की।

मानसिक क्रूरता तय करने के लिए किसी एक घटना को अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए। वैवाहिक संबंधों का मूल्यांकन पूरे आचरण, परिस्थितियों, उसके लगातार बने रहने और दूसरे जीवनसाथी पर उसके प्रभाव को देखते हुए किया जाना चाहिए।

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की टिप्पणी

क्या कहा हाईकोर्ट ने और क्या रहा फैसला

अलग घर की मांग पर कोर्ट की टिप्पणी: हाईकोर्ट ने कहा कि पत्नी का अलग घर मांगना अपने-आप में मानसिक क्रूरता नहीं है। लेकिन यदि पति पर बिना उचित कारण वृद्ध माता-पिता से अलग होने का लगातार दबाव बनाया जाए, तो परिस्थितियों के आधार पर इसे मानसिक क्रूरता माना जा सकता है।

498A मामले का असर: पत्नी ने पति के खिलाफ दहेज उत्पीड़न का मामला दर्ज कराया था और पति को 17 मार्च 2026 को इस मामले में बरी कर दिया गया। कोर्ट ने इस कार्रवाई और उससे जुड़ी परिस्थितियों को भी पूरे वैवाहिक विवाद के संदर्भ में देखा।

लंबे समय से अलग रह रहे थे: पति-पत्नी 2019 से अलग रह रहे थे और उनके बीच लंबे समय से विवाद चल रहा था। कोर्ट ने कहा कि केवल लंबे अलगाव से तलाक नहीं मिलता, लेकिन अलगाव की वजह और लगातार चले विवाद से यह पता लगाया जा सकता है कि वैवाहिक रिश्ता कितना टूट चुका है।

हाईकोर्ट ने तलाक मंजूर किया: जिला अदालत ने पति की तलाक याचिका खारिज कर दी थी, लेकिन हाईकोर्ट ने पूरे मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए पत्नी के व्यवहार को मानसिक क्रूरता माना। इसके बाद जिला अदालत का फैसला रद्द कर हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 के तहत पति को तलाक दे दिया गया।

मां के प्रति जिम्मेदारी के साथ लीगल फैक्टर भी रहे खास

इस पूरे मामले पर यदि तथ्यों पर नजर डालें तो छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का यह फैसला 'पत्नी ने अलग घर मांगा, इसलिए तलाक मिल गया' के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। फैसले का वास्तविक कानूनी महत्व यह है कि अलग रहने की मांग अकेले मानसिक क्रूरता नहीं है। अदालत ने इस मामले में पति की वृद्ध और बीमार मां के प्रति जिम्मेदारी, लगातार वैवाहिक विवाद, अलगाव, आपत्तिजनक बातचीत और आपराधिक मामले में झूठे आरोप पाए जाने के प्रभाव को एक साथ देखा है और इसे ऐसे ही समझा जाना चाहिए।

लेखक के बारे मेंमनीष राजमनीष राज फिलहाल नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में कंसलटेंट लीगल एडिटर के पद पर सेवारत हैं। इनकी पत्रकारिता की शुरूआत 24 वर्ष पहले राष्ट्रीय सहारा जैसे प्रमुख नेशनल न्यूज ब्रॉडकास्ट मीडिया चैनल से हुई। इन्होंने कानून (L.L.B.) और अर्थशास्त्र में स्नातक के साथ पत्रकारिता व जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा किया हुआ है। भारत के कानूनी ढांचे के विभिन्न आयामों और उनके व्यावहारिक पहलुओं को इन्होंने गहराई से अध्ययन किया है।वर्ष 2018 में मनीष राज, इंडिया लीगल ग्रुप से जुड़े, जिससे कानून के क्षेत्र में इनकी रुचि जगी। यहां इन्होंने कानून की बारीकियों के साथ साथ सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की गतिविधियों और प्रक्रियाओं को नजदीक से देखा। इस तरह से पिछले सात सालों से पेशेवर लीगल स्टोरी लेखन-संपादन के साथ साथ इनका कानूनी गतिविधियों और केस लॉ की बारीकियों को विश्लेषण करने का काम जारी है। इनके लिखे लेख अक्सर न्यायपालिका और आम जनता के बीच एक सेतु का काम करते हैं, और अदालती कार्यवाहियों पर व्यवस्थित रिपोर्टिंग उपलब्ध कराते हैं। ये सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के सदस्य भी रहे हैं, जहां इन्होंने देश के कई प्रसिद्ध वकीलों के साथ काम करने का अनुभव हासिल किया है।इन्हें सामाजिक न्याय, मानवाधिकार, कॉर्पोरेट और संवैधानिक कानून जैसे विषयों पर लिखना पसंद है। इनके लिखने का उद्देश्य है कि आम जनता के साथ-साथ और युवा वकील भी न्यायिक फैसलों और कानून की जटिलताओं को समझ सकें और कानूनी जागरूकता बढ़े। इनकी लेखन शैली सटीक, तथ्य-आधारित और पाठकों के लिए समझने में सरल है।विशेषताएँ:• सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायिक फैसलों का सरल भाषा में लेखन और विश्लेषण • केस लॉ का सरल भाषा में विस्तार • आम जन, युवा वकीलों और छात्रों के लिए मार्गदर्शन • ब्लॉग और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर सक्रिय लेखन... और पढ़ें

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