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हाईकोर्ट ने मथुरा लोक अदालत का आदेश रद्द किया, सुलह प्रक्रिया न मानने पर मामला वापस भेजा

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मथुरा की स्थायी लोक अदालत के 21 अप्रैल का आदेश रद्द किया, क्योंकि अदालत ने विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 की धारा 22‑सी के तहत अनिवार्य सुलह प्रक्रिया का पालन नहीं किया। आदेश केवल यह लिखा कि विपक्षियों ने 22 मार्च को जवाब दाखिल किया, पर सुलह के प्रयासों का विवरण नहीं था। इसलिए मामला फिर से लोक अदालत को भेजा गया ताकि नया आदेश जारी किया जा सके।

6 अक्टूबर 2026 को 05:06 pm बजे
हाईकोर्ट ने मथुरा लोक अदालत का आदेश रद्द किया, सुलह प्रक्रिया न मानने पर मामला वापस भेजा

सौजन्य से:- ETV Bharat

हाईकोर्ट ने मथुरा लोक अदालत का आदेश किया रद्द, सुलह प्रक्रिया का पालन न करने पर नए सिरे से फैसले के निर्देश

कोर्ट ने आदेश रद्द करते हुए मामला संबंधित स्थायी लोक अदालत को वापस भेज दिया. लोक अदालत को निर्देश दिया कि वह नया आदेश करे.

By ETV Bharat Uttar Pradesh Team

Published : October 6, 2026 at 9:54 PM IST

प्रयागराज : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मथुरा की स्थायी लोक अदालत का एक आदेश रद्द कर दिया. हाईकोर्ट ने कहा कि लोक अदालत ने विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम 1987 की धारा 22-सी के तहत अनिवार्य सुलह प्रक्रिया का समुचित पालन नहीं किया. मामला दोबारा निर्णय के लिए स्थायी लोक अदालत को वापस भेज दिया गया है.

द ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड व अन्य ने दिनेश कुमार गर्ग व अन्य के विरुद्ध याचिका दाखिल की थी. याचिका में मथुरा की स्थायी लोक अदालत के 21 अप्रैल के आदेश को चुनौती दी गई थी. न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी ने वैधानिक प्रक्रिया का पालन न करने के कारण आदेश रद्द कर दिया. याची के अधिवक्ता ने कहा कि स्थायी लोक अदालत ने धारा 22-सी के तहत अपनाई जाने वाली सुलह की प्रक्रिया नहीं अपनाई.

आदेश में केवल सामान्य उल्लेख किया गया, जो पर्याप्त नहीं है. आदेश में सिर्फ इतना दर्ज था कि विपक्षियों ने 22 मार्च 2024 को जवाब दाखिल किया. मामला 18 अप्रैल 2024 से 30 अप्रैल 2024 तक सुलह वार्ता के लिए नियत होता रहा, काफी प्रयास के बावजूद सुलह सफल नहीं हुई इसलिए शपथपत्रीय साक्ष्य लेकर मामले का निस्तारण गुणदोष के आधार पर किया जा रहा है.

कोर्ट ने इस विवरण को कानूनी रूप से अपर्याप्त करार दिया. कहा कि स्थायी लोक अदालत का पहला कर्तव्य पक्षकारों के बीच सौहार्दपूर्ण समझौता कराने का प्रयास करना है. इसमें असफल होने के बाद ही वह विवाद का गुणदोष पर निर्णय कर सकती है. सुलह की प्रक्रिया केवल औपचारिकता नहीं है, जिसे यंत्रवत निभा दिया जाए. केवल समाधान का प्रयास किया लेकिन विफल रहा लिख देना पर्याप्त नहीं है.

पत्रावली से यह झलकना चाहिए कि समझौते की शर्तें तैयार करने का वास्तविक और ईमानदार प्रयास हुआ. सुलह के प्रयासों का संक्षेप में उल्लेख पंचाट में अवश्य होना चाहिए अन्यथा माना जाएगा कि कोई प्रयास ही नहीं हुआ और पंचाट विधिक रूप से मान्य नहीं होगा. कोर्ट ने 21 अप्रैल का आदेश रद्द करते हुए मामला संबंधित स्थायी लोक अदालत मथुरा को वापस भेज दिया. लोक अदालत को निर्देश दिया कि वह नया आदेश करे. इसी के साथ याचिका निस्तारित कर दी गई.

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