पितृत्व विवाद: बच्चे के अधिकार बनाम पिता के अधिकार क्या कहता है कानून?
पितृत्व विवाद में बच्चों के अधिकार और पिता के अधिकारों के बीच संवादहीनता होती है। भारत में पितृत्व साबित करने के लिए DNA परीक्षण की अनुमति देने के नियम सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्पष्ट किए गए हैं। DNA टेस्ट केवल अंतिम विकल्प होना चाहिए यदि 'गैर-पहुंच' (non-access) साबित न हो।

सौजन्य से:- Navbharat Times
पितृत्व विवादों में सबसे बड़ा सवाल जो बच्चों के अधिकार से जुड़ा होता है कि क्या बच्चे की पहचान और गरिमा, पिता के अधिकारों से ऊपर है? जबकि पिता के अधिकारों के नजरिए से देखा जाए तो सवाल बनता है कि क्या किसी व्यक्ति को DNA टेस्ट के लिए मजबूर किया जा सकता है? और क्या कानून तकनीकी साक्ष्यों को सामाजिक संबंधों से अधिक महत्व देता है? इस लीगल एक्सप्लेनर में हम पितृत्व विवाद के विभिन्न पहलुओं को सरल तरीके से विस्तार से समझाने की कोशिश करेंगे।
पितृत्व विवाद क्या है और क्यों बढ़ रहे हैं ऐसे मामले?
पितृत्व विवाद तब उत्पन्न होता है जब किसी बच्चे के जैविक पिता को लेकर संदेह या विवाद होता है। यह विवाद आमतौर पर तलाक, गुजारा भत्ता (maintenance), संपत्ति अधिकार या वैवाहिक विवादों के दौरान सामने आता है। भारत में ऐसे मामलों की संख्या बढ़ने के पीछे दो सबसे बड़े कारणों में हैं भारत में बढ़ता शहरीकरण और बदलती पारिवारिक संरचनाएं । विवाहेतर संबंधों के मामलों में वृद्धि के साथ महिलाओं में अपने अधिकारों के प्रति बढ़ती जागरूकता ने भी अदालतों में ऐसे मामलों की संख्या बढञाई है। तकनीकी नजरिए से देखा जाए तो DNA टेस्ट जैसी वैज्ञानिक तकनीकों की सुगम उपलब्धता ने भी ऐसे विवादों को हवा दी है।सुप्रीम कोर्ट का रुख, जिसने तय कर रखी हैं सीमाएं
पितृत्व विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य रूप से भारतीय साक्ष्य अधिनियम, INDIAN EVIDENCE ACT, 1872 की धारा 112 के तहत वैवाहिक संबंधों के दौरान जन्मे बच्चों की वैधता को प्राथमिकता दी है। हालांकि अब ये प्रावधान 1 जुलाई 2024 से लागू भारत के नए भारतीय साक्ष्य अधिनियम BHARATIYA SAKSHYA ADHINIYAM , 2023 में धारा 116 के तहत उल्लिखित हैं। इनमें कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि DNA टेस्ट केवल अंतिम विकल्प होना चाहिए, यदि "गैर-पहुंच" (non-access) साबित न हो। भरण-पोषण के नजरिए से भी सुप्रीम कोर्ट ने अपने हाल के फैसले से यह लकीर खींच दी है कि पितृत्व पर विवाद होने पर भी बच्चे के भरण-पोषण के अधिकार को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पितृत्व विवादों से जुड़े कुछ बड़े मामले, जिन पर सुवनाई के बाद सुप्रीम कोर्ट के फैसलों ने दिशा निर्देश तय किए है-- गौतम कुंडू बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1993): एक ऐतिहासिक मामला है, जिसने भारत में पितृत्व साबित करने के लिए DNA परीक्षण की अनुमति देने के नियमों को स्पष्ट किया। अदालत ने कहा कि जब तक 'नॉन-एक्सेस' (साथ न रहने) का पुख्ता सबूत न हो, तब तक डीएनए टेस्ट का आदेश नहीं दिया जा सकता।
- बनारसी दास बनाम टीकू दत्ता (श्रीमती) और अन्य (2005): यह भी मुख्य रूप से उत्तराधिकार प्रमाण पत्र, वसीयत और डीएनए परीक्षण की वैधता से संबंधित है। न्यायालय ने यह निर्धारित किया कि डीएनए टेस्ट केवल तभी किया जाना चाहिए जब अन्य सभी सबूत अपर्याप्त हों और मामले के सही निपटारे के लिए यह अत्यंत आवश्यक हो।
- रोहित शेखर बनाम एन.डी. तिवारी (2011): इस मामले में लंबी कानूनी लड़ाई के बाद एन.डी. तिवारी को DNA टेस्ट कराने का आदेश दिया गया था, जिससे उनके पितृत्व की पुष्टि हुई।
- दीपान्विता रॉय बनाम रोनोब्रोटो रॉय, (2015): इस विवाद में जब पत्नी ने बेवफाई के आरोप से इनकार किया, तो माना गया कि डीएनए परीक्षण के बिना पति के दावों को साबित करना असंभव होगा। इस आधार पर, डीएनए परीक्षण का आदेश देने के उच्च न्यायालय के निर्णय को बरकरार रखा गया।
- 2026 का नवीनतम निर्देश: सुप्रीम कोर्ट ने एक बच्ची के विवादित पितृत्व मामले में मानवीय आधार पर उसके भरण-पोषण के लिए दिल्ली सरकार को निर्देश दिया, यह देखते हुए कि बच्ची के अधिकारों पर पितृत्व विवाद का असर नहीं पड़ना चाहिए।
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