हाई कोर्ट: ‘जजमेंट एक क्लिक के बटन से नहीं मिल सकता’, तलाक केस में अनावश्यक दबाव नहीं
जस्टिस डॉ. सी. सुमलता ने कहा कि न्यायिक निर्णयों को जल्दी‑जल्दी नहीं निकाला जा सकता; प्रत्येक मामले की उचित जांच और स्वतंत्र समय आवश्यक है। अनावश्यक समय‑सीमा और दबाव से न्याय की गुणवत्ता बिगड़ सकती है, इस कारण हाई कोर्ट ने तलाक याचिका में एक महीने के भीतर निपटारे का निर्देश देने वाले अनुरोध को खारिज कर दिया।

सौजन्य से:- Navbharat Times
उचित निष्कर्ष पर पहुंचना आसान काम नहीं
जस्टिस डॉ. सी. सुमलता की अदालत ने कहा कि हाईकोर्ट को मामलों के निपटारे की संख्या पर जरूरत से ज्यादा जोर देकर न्यायिक अधिकारियों पर जल्द फैसले देने का दबाव नहीं बनाना चाहिए। अदालत ने टिप्पणी की कि “जजमेंट एक क्लिक के बटन से हासिल नहीं किए जा सकते।” साक्ष्यों पर उचित विचार करने के बाद सही और निष्पक्ष निष्कर्ष तक पहुंचना आसान काम नहीं है।जजों पर अनुचित दबाव से गुणवत्ता प्रभावित होगी
अदालत ने कहा कि न्यायिक अधिकारियों पर अनुचित दबाव पड़ने से न्याय की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। अनावश्यक देरी को रोकने का प्रयास जरूर होना चाहिए, लेकिन ऐसा करते समय न्यायिक स्वतंत्रता प्रभावित नहीं होनी चाहिए। अदालत ने कामकाजी पेशेवरों को अनुचित समय-सीमा के जरिए नहीं चलाया जा सकता। अदालत ने इसे समझाते हुए कहा कि किसी भी संगठन में नियंत्रक प्राधिकारी द्वारा काम लिया जाना संगीत वाद्ययंत्र से मधुर ध्वनि निकालने जैसा होना चाहिए, न कि गन्ने के क्रशर की तरह, जिसमें हर बूंद को बेरहमी से निचोड़ दिया जाए और अंत में गन्ना अपना आकार, स्वाद और उपयोगिता खो दे।हर मामला अलग, तय समय-सीमा में फिट होना जरूरी नहीं
हाईकोर्ट ने कहा कि न्यायाधीशों को अदालत का काम न्यायसंगत तरीके से संचालित करने की पूरी स्वतंत्रता मिलनी चाहिए और मामलों की जांच के लिए आवश्यक समय और अवसर दिया जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि जवाबदेही तभी प्रभावी हो सकती है जब न्यायिक अधिकारियों को अनुचित दबाव से स्वतंत्रता मिले। पीठ ने कहा, “हर न्यायिक अधिकारी अपनी अदालत का मास्टर होता है। हर मामला अलग होता है और जरूरी नहीं कि हर मामला पहले से तय समय-सीमा में फिट हो।क्या है मामला?
यह मामला एक पति की याचिका से जुड़ा था। उसने सोराबा की ट्रायल कोर्ट में लंबित तलाक याचिका को एक महीने के भीतर निपटाने का निर्देश देने की मांग की थी। इससे पहले उसने वैवाहिक अधिकारों की बहाली के लिए याचिका दायर की थी, जिसे मंजूर करते हुए पत्नी को उसके साथ रहने का निर्देश दिया गया था। पत्नी के इसका पालन नहीं करने पर पति ने तलाक की याचिका दाखिल की।
- हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का रिकॉर्ड देखने के बाद पाया कि सोराबा के सीनियर सिविल जज मामले की कार्यवाही तेजी से आगे बढ़ा रहे थे। हाईकोर्ट ने ट्रायल जज की कार्यवाही के तरीके की सराहना करते हुए कहा कि जब मामला पहले से ही समयबद्ध तरीके से आगे बढ़ रहा है, तो याचिकाकर्ता ने जल्द निपटारे के निर्देश के लिए हाईकोर्ट का रुख क्यों किया, यह समझ से परे है।
- अदालत ने यह भी कहा कि कठोर समय-सीमा तय करने से व्यावहारिक मुश्किलें पैदा हो सकती हैं। यदि वकील पेश नहीं होते या किसी कारण से समय मांगते हैं तो ट्रायल कोर्ट के न्यायिक अधिकारियों पर अतिरिक्त तनाव पड़ेगा और उन्हें समय बढ़ाने के लिए हाईकोर्ट में आवेदन करना पड़ सकता है। इन्हीं परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी और कहा कि राहत देने का कोई आधार नहीं है।
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