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हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की व्याख्या: सुप्रीम कोर्ट का फैसला, कृषि भूमि पर भी लागू होगी धारा 22

सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की व्याख्या की और कहा कि कृषि भूमि पर भी लागू होगी धारा 22। यह अधिकार केवल क्लास वन उत्तराधिकारियों को दिया गया है, जैसे बेटे, बेटी, पत्नी, मां।

16 जुलाई 2026 को 02:13 am बजे
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की व्याख्या: सुप्रीम कोर्ट का फैसला, कृषि भूमि पर भी लागू होगी धारा 22

सौजन्य से:- Jansatta

सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की व्याख्या की है। शीर्ष अदालत ने कहा कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत परिवार के करीबी सदस्यों को दिए गए खास अधिकार कृषि की जमीन पर भी लागू होंगे।

शीर्ष अदालत ने कहा है कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा 22 जो क्लास वन उत्तराधिकारियों को किसी अन्य सह उत्तराधिकारी द्वारा ट्रांसफर की जाने वाली संपत्ति खरीदने की प्राथमिकता देने वाला अधिकार देती है, कृषि भूमि पर भी समान रूप से लागू होती है। अगर परिवार में किसी सदस्य को विरासत में जमीन मिली है और वह अपने हिस्से को किसी बाहरी व्यक्ति को बेचना चाहता है तो उसे पहले अपने ही परिवार के अन्य क्लास वन उत्तराधिकारियों को मौका देना होगा ।

हिंदुओं के पैतृक संपत्ति के अधिकार पर असर डालने वाला यह दूरगामी फैसला जस्टिस संजय करोल और एन. कोटीश्वर सिंह ने महिंदर तथा अन्य बनाम पूरन सिंह मामले में सुनाया है। शीर्ष अदालत ने महिंदर की अपील खारिज करते हुए पहली अपीलीय अदालत और हाई कोर्ट के फैसले को सही ठहराया है जिसने माना था कि धारा 22 कृषि भूमि पर भी लागू होगी।

इस मामले में याचिकाकर्ता और प्रतिवादी भाई-भाई थे, जिन्होंने क्लास वन उत्तराधिकारियों की हैसियत से पिता की कृषि भूमि विरासत में पाई थी। इनमें से कुछ उत्तराधिकारियों ने विरासत में मिली अपने हिस्से की कृषि भूमि मिल कर 28 दिसंबर 2011 को तीसरे पक्ष यानी पूनम को बेच दी, लेकिन परिवार के एक अन्य सदस्य ने इसका विरोध किया और हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा 22 का आधार लेते हुए सिविल कोर्ट में वाद दायर कर बिक्री को चैलेंज किया।

उसका कहना था कि धारा 22 के तहत उसे पहले खरीदने का अधिकार है। यानी बाहर वाले को बेचने से पहले परिवार को मौका मिलना चाहिए। सिविल कोर्ट ने यह कहते हुए वाद खारिज कर दिया कि कृषि भूमि पर ऐसा अधिकार लागू नहीं होता। वह अपीलीय अदालत गया और जहां सिविल कोर्ट का फैसला पलट दिया गया। हाई कोर्ट ने भी अपीलीय अदालत का फैसला सही ठहराया और याचिका खारिज कर दी। इसके बाद महिंदर व अन्य ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह अधिकार सिर्फ क्लास वन उत्तराधिकारियों तक ही सीमित है जैसे बेटे, बेटी, पत्नी, मां यानी वही लोग जिन्हें एक ही व्यक्ति से विरासत में संपत्ति मिली है। इसलिए उस फैसले को लागू करके धारा 22 को खारिज नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने फैसले में कहा कि अगर कहीं और की गई टिप्पणियों के आधार पर ठीक से बनाए गए कानून को इतनी आसानी से कैंसिल किया जा सकता है, तो अराजकता की स्थिति बन जाएगी। इसमें उन अहम सिद्धांतों और उन स्थापित सीमित आधारों को नुकसान पहुंचेगा, जिनके जरिए ये जांचा जाता है कि ठीक से बनाया गया कोई कानून संविधान के अनुरूप है कि नहीं। कोर्ट ने पंजाब एक्ट की धारा 15 और हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 22 की तुलना करते हुए कहा कि भले ही दोनों धाराएं प्रि-एम्शन यानी पहले खरीदने के अधिकार से जुड़ी हैं लेकिन वे एक जैसी नहीं हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा 22 जो क्लास 1 उत्तराधिकारियों को किसी अन्य सह उत्तराधिकारी द्वारा ट्रांसफर की जाने वाले संपत्ति खरीदने की प्राथमिकता का अधिकार देती है, कृषि भूमि पर भी समान रूप से लागू होती है।

उत्तराधिकार यानी विरासत से जुड़ा अधिकार

अपीलकर्ता ने दलील दी कि आत्म प्रकाश बनाम हरियाणा राज्य केस में प्रि-एम्शन यानी पहले खरीदने के अधिकार को असंवैधानिक बताया गया है इसलिए इस मामले में भी ये लागू नहीं होगा, लेकिन कोर्ट ने ये दलील खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि धारा 22 कोई सामान्य प्रि- एम्शन कानून नहीं है, बल्कि यह उत्तराधिकार यानी विरासत से जुड़ा अधिकार है। पंजाब प्रि- एम्शन एक्ट और हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 22 दोनों पूरी तरह अलग हैं। पंजाब के कानून में तो दूर के रिश्तेदार, किराएदार और सहमालिक तक को भी पहले खरीदने का अधिकार है, लेकिन हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 22 में ऐसा नहीं है।

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