सुप्रीम कोर्ट की कमेटी ने खोली यौन उत्पीड़न पीड़िताओं की दर्दनाक सच्चाई, संवेदनशीलता की कमी, विक्टिम ब्लेमिंग का शिकार
सुप्रीम कोर्ट की 'जेंडर एंड जस्टिस कमेटी' ने एक हालिया रिपोर्ट में यौन उत्पीड़न के शिकार पीड़िताओं की दर्दनाक सच्चाई को उजागर किया है, जिसमें अदालतों और वकीलों की असंवेदनशीलता, विक्टिम ब्लेमिंग और सरकारी समर्थन की कमी का खुलासा हुआ है।

सौजन्य से:- AajTak
Sign In
Advertisement
X
यौन उत्पीड़न की शिकार महिलाओं और बच्चों को इंसाफ पाने के लिए भी दर्द से गुजरना पड़ता है. ये दर्द उन्हें अदालतों, वकीलों और पूरी कानूनी व्यवस्था की असंवेदनशीलता से मिलता है. सुप्रीम कोर्ट की 'जेंडर एंड जस्टिस कमेटी' की एक हालिया रिपोर्ट में इस कड़वी सच्चाई का खुलासा हुआ है.
रिपोर्ट के मुताबिक, लगभग 40 फीसदी पीड़ितों को लगता है कि अदालतें और वकील उनके ट्रॉमा को लेकर संवेदनशीलता या सहानुभूति नहीं रखते. वहीं, 17 फीसदी पीड़ितों ने माना कि कोर्ट में पेश होने और अपनी गवाही देने के दौरान वो बेहद 'डरी हुई' थीं.
ये रिपोर्ट जिला अदालतों के स्तर पर किए गए एक सर्वेक्षण पर आधारित है. इस सर्वे से एक और बात सामने आई है कि लगभग 80.7 फीसदी पीड़ितों को सरकार की 'गवाह संरक्षण योजना' के बारे में कोई जानकारी ही नहीं है.
सुप्रीम कोर्ट की गठित कमिटी की रिपोर्ट में खुलासा
अदालती कार्यवाही में बार-बार होने वाली देरी, तारीखों का टलना, खराब संवाद और बहुत तनाव जैसी परेशानियां पीड़ितों की मुश्किलों को कई गुना बढ़ा देती हैं. इस स्टडी को सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर बनाई गई एक विशेष समिति ने तैयार किया है. इस समिति के अध्यक्ष रिटार्ड जस्टिस अनिरुद्ध बोस हैं.
Advertisement
सुप्रीम कोर्ट ने कुछ समय पहले ही ये समिति बनाई थी. इसका मकसद यौन उत्पीड़न के मामलों की सुनवाई और फैसले के दौरान कुछ जजों की ओर से की जाने वाली असंवेदनशील टिप्पणियों की जांच करना था.
दरअसल, देश के कुछ हाई कोर्ट्स ने बलात्कार और बाल यौन उत्पीड़न के मामलों में आरोपियों को राहत देते समय ऐसी टिप्पणियां की थीं, जिससे पूरे देश में भारी आक्रोश फैल गया था. सुप्रीम कोर्ट ने इन टिप्पणियों को 'अमानवीय और असंवेदनशील' करार दिया था. इसके बाद अदालत ने राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी के जरिए इस मामले पर स्वतः संज्ञान लिया और रिपोर्ट मांगी थी.
यह भी पढ़ें: विधानसभा में फूट-फूटकर रोईं RG-Kar रेप पीड़िता की MLA मां, CM बोले- न्याय होगा
अब इस मामले में CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहाना की बेंच ने इस रिपोर्ट को रिकॉर्ड पर ले लिया है. बेंच ने निर्देश दिया है कि इस रिपोर्ट को देश के सभी हाई कोर्ट, राज्य न्यायिक अकादमियों और राज्य पुलिस अकादमियों में भेजा जाए. इसका इस्तेमाल जजों, सरकारी वकीलों और पुलिस अधिकारियों की ट्रेनिंग और सेंसिटाइजेशन के लिए किया जाएगा.
व्यवस्था के हर स्तर पर 'विक्टिम ब्लेमिंग' का शिकार
कमेटी की रिपोर्ट में पीड़ितों की उन गवाहियों के उदाहरण दिए गए हैं, जो ये दिखाते हैं कि अस्पताल, पुलिस स्टेशन से लेकर अदालत तक, हर स्तर पर पीड़ितों को ही दोषी ठहराने (विक्टिम ब्लेमिंग) और शर्मिंदा करने की कोशिश की जाती है.
Advertisement
रिपोर्ट में कहा गया है, 'खासतौर से महिलाओं और बच्चों से जुड़े मामलों में संवेदनशीलता की जरूरत आज के समय में बहुत ज्यादा बढ़ गई है. भारत में महिलाएं लगातार भेदभाव, यौन हिंसा और घरेलू उत्पीड़न का सामना कर रही हैं. ऐसे में अदालतों की असंवेदनशील टिप्पणियां या रूढ़िवादिता पर आधारित फैसले पीड़ितों का हौसला तोड़ देते हैं. इससे वो अपराध की रिपोर्ट दर्ज कराने या इंसाफ लेने के प्रॉसेस में शामिल होने से कतराने लगती हैं.'
कमेटी ने इस बात पर जोर दिया है कि बेहोश या बेसुध महिलाओं से जुड़े यौन उत्पीड़न के मामलों में भी न्यायिक नजरिया अक्सर 'बलात्कार से जुड़े मिथकों' को बढ़ावा देता है. आरोपी के आचरण पर ध्यान देने के बजाय पीड़ित की विश्वसनीयता पर ही सवाल खड़े कर दिए जाते हैं. ये भाषा पीड़ितों को फिर से ट्रॉमा देती है.
'हवस शांत की' जैसे शब्दों पर लगेगी रोक
अदालतों में पीड़ितों को शर्मिंदा करने वाली भाषा को बदलने के लिए कमेटी ने एक शब्दावली (ग्लोसरी) तैयार की है. इसमें आमतौर पर इस्तेमाल होने वाले आपत्तिजनक शब्दों की जगह वैकल्पिक और सही शब्दों के इस्तेमाल के सुझाव दिए गए हैं.
कमेटी ने सिफारिश की है कि अदालती फैसलों में धार्मिक या सांस्कृतिक संदर्भों के बजाय पूरी तरह से अधिकारों पर ध्यान देना चाहिए. पीड़ित के चरित्र को लेकर किसी भी तरह के कयास लगाने या उसके स्वाभिमान को ठेस पहुंचाने वाले शब्दों के इस्तेमाल से बचना होगा. रिपोर्ट में जजों को निर्देश दिया गया है कि वो ऐसी भारी-भरकम या आलंकारिक भाषा का इस्तेमाल बिल्कुल न करें जिससे अपराध की गंभीरता कम होती दिखती हो.
Advertisement
उदाहरण के लिए, रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि फैसले में 'अपनी हवस शांत की' जैसी लाइन की जगह सीधे 'यौन उत्पीड़न किया' का इस्तेमाल किया जाना चाहिए. जजों को य भी सिखाया जाएगा कि वो अपराध को सही ठहराने या भावनात्मक कारण ढूंढने के बजाय सिर्फ कानून और जवाबदेही पर ध्यान दें.
पुलिस और अदालतों में पूछे जाने वाले चुभते सवाल
ये रिपोर्ट न्याय व्यवस्था के हर स्तर पर मौजूद कमियों को उजागर करती है. रिपोर्ट के मुताबिक, ;चाहे पुलिस हो, अस्पताल हो, वन स्टॉप क्राइसिस सेंटर हो या कोर्टरूम- हिंसा की शिकार महिलाओं को हर जगह भेदभावपूर्ण और असंवेदनशील बयानों का सामना करना पड़ता है.'
रिपोर्ट में उन चुभते सवालों के उदाहरण भी दिए गए हैं जो अक्सर पीड़ितों से पूछे जाते हैं:
- तुम उस समय वहां क्यों गई थीं?
- तुमने इस तरह के कपड़े क्यों पहने थे?
- तुम्हारे साथ कोई पुरुष क्यों नहीं था?
- तुमने रिपोर्ट दर्ज कराने में इतनी देरी क्यों की?
वहीं, वैवाहिक विवादों के मामलों में जब महिलाएं शिकायत दर्ज कराने पुलिस के पास जाती हैं, तो उनसे शक के साथ पूछा जाता है, 'अब क्यों? इतने सालों बाद क्यों आई हो? तुम्हारे तो बच्चे भी हैं, शादी में तो ये सब चलता ही रहता है.'
Advertisement
कोर्टरूम को पीड़ित के हिसाब से बनाने की खास गाइडलाइंस
अदालतों के माहौल को पीड़ितों के लिए सुरक्षित और सहज बनाने के लिए कमेटी ने कई सिफारिशें की हैं:
- बुनियादी सुविधाएं और सम्मान: महिलाएं अदालत में सिर्फ इस उम्मीद से आती हैं कि जज उनके सम्मान और गरिमा की रक्षा करेंगे. जजों के पास अपनी कोर्ट को कंट्रोल करने की शक्ति होती है. वो अपने स्टाफ को निर्देश दें कि पीड़ित महिला को बैठने के लिए कुर्सी और पीने का पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं जरूर दी जाएं.
- गोपनीयता का ध्यान: जब पीड़ित महिला अपनी गवाही दे रही हो, तो जज को ज्यादा सतर्क रहना चाहिए. कोर्टरूम से सभी गैर-जरूरी लोगों को बाहर कर दिया जाना चाहिए ताकि महिला सहज महसूस कर सके. जज को न सिर्फ उसके शब्दों बल्कि उसकी शारीरिक भाषा को भी ध्यान से देखना चाहिए.
- सड़क की भाषा जजमेंट में नहीं: रिपोर्ट में कहा गया है कि सड़कों पर बोली जाने वाली भाषा सीधे अदालती फैसलों का हिस्सा नहीं बन सकती. लैंगिक मामलों में फैसले सहानुभूति और संवेदनशीलता पर आधारित होने चाहिए. कानूनी समुदाय के सभी सदस्यों को मिलकर एक ऐसा लैंग्वेज सिस्टम बनाना होगा जो अपमानजनक शब्दों को पूरी तरह से हटा दे.
- स्वतः संज्ञान लेकर सुरक्षा देना: जजों को पीड़ित या कमजोर गवाहों की सुरक्षा के लिए किसी लिखित आवेदन का इंतजार नहीं करना चाहिए. ये पीठासीन अधिकारी की कानूनी जिम्मेदारी है कि वो पीड़ित को सुरक्षा, प्री-ट्रायल काउंसलिंग दें और असंवेदनशील बर्ताव को रोकें.
यह भी पढ़ें: सुप्रीम कोर्ट का फैसला, राजा भैया का पारिवारिक केस साकेत कोर्ट में ही चलेगा
Advertisement
जजों को रखना होगा इन बातों का ध्यान
- इस नए मैनुअल के तहत जजों को ध्यान रखना होगा कि फैसला किसी रूढ़िवादिता, धारणा या पीड़ित के चरित्र के लिए नैतिक विचारों पर आधारित नहीं होने चाहिए. अदालतों को सिर्फ गवाही, मेडिकल रिपोर्ट, फोरेंसिक सबूत और परिस्थितियों पर भरोसा करना चाहिए.
- 'लज्जा भंग' जैसे शब्द भले ही कानूनी ढांचे का हिस्सा है, लेकिन इसका इस्तेमाल बहुत सावधानी से किया जाना चाहिए क्योंकि ये पुरुष प्रधान मानसिकता को दिखाता है. शरीर पर चोट के निशान न होना, देर से रिपोर्ट करना या विरोध न कर पाना 'सहमति' का सबूत नहीं है. सदमे की वजह से हर पीड़ित का बर्ताव अलग हो सकता है.
- पॉक्सो एक्ट के तहत 18 साल से कम उम्र का हर व्यक्ति बच्चा है. बच्चों से जुड़े मामलों में अदालती भाषा में सनसनीखेज या नैतिक टिप्पणियों से पूरी तरह बचना होगा.
- इस ट्रेनिंग को और मजबूत बनाने के लिए, कमेटी की इस रिपोर्ट में सुप्रीम कोर्ट के उन 27 ऐतिहासिक फैसलों का विवरण भी शामिल किया गया है जो जेंडर जस्टिस, शारीरिक स्वायत्तता और पीड़ितों की गरिमा की रक्षा के लिए मील का पत्थर माने जाते हैं.
---- समाप्त ----
Latest News in Hindi »
Advertisement
Powered by Nyaya 247 News
संबंधित ख़बरें
इसी विषय की और ख़बरें →
पाकिस्तानी लड़की समन अब्बास हत्याकांड: इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी ने अदालत के फैसले का स्वागत किया

फर्जी वीजा रैकेट मामले में जमानत मिलती है, अदालत ने कहा- सिर्फ जांच लंबित है

श्रीकृष्ण जन्मभूमि विवाद में अदालत के फैसले का इंतजार, हिंदू पक्ष के वादों को मान्यता देने पर मुहर नहीं लग रही!

सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट के फैसले पर जताई आपत्ति

फ्रांस में इच्छामृत्यु के लिए हरी झंडी, नए कानून में गरिमा की शर्तें

दुष्कर्म पीड़िता का अदालत में नया बयान, नानक सेठ पर लगाए आरोप

सुप्रीम कोर्ट ने 1979 की हत्या के मामले में 3 लोगों को बरी किया

प्रकाशन कानून में संशोधन: डिजिटल प्रकाशन और अंतर्राष्ट्रीय एकीकरण का मार्ग प्रशस्त
ताज़ा ख़बरें
- सुप्रीम कोर्ट का क्या है ऐतिहासिक फैसला जिससे कराया अवगत
- फ्रांस में इच्छामृत्यु कानून की मंजूरी, बुजुर्गों को मिलेगा मृत्यु का विकल्प
- सुप्रीम कोर्ट ने 'बलात्कार' फैसले पर पटना हाई कोर्ट के तर्क पर सवाल उठाए
- 49 साल पुराने हत्याकांड में न्याय: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, 5 आरोपियों को बरी करते हुए ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट के फैसले को पलटा
- सुप्रीम कोर्ट में हंगामा: न्यायिक हिरासत में पांच दिन छात्रों का होगा कारावास
- सलवार खोलना दुष्कर्म का प्रयास नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने पटना उच्च न्यायालय के फैसले पर विस्तृत आदेश की मांग को देखा
- बहरत तिवारी एनकाउंटर केस: वकील को सुप्रीम कोर्ट से हाई कोर्ट भेजने की सलाह
- राष्ट्रीय सभा ने संसाधनों के उपयोग पर पारदर्शिता और संपत्ति अधिकारों के संरक्षण पर जोर दिया

