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वोटर लिस्ट से गायब हुआ नाम तो रद्द हो गया राशन कार्ड! सुप्रीम कोर्ट ने दिखाया रास्ता

सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट से नाम कटने और फिर राशन कार्ड रद्द होने के मामले में याचिका पर सीधे सुनवाई करने से इनकार करके हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने को कहा है।

16 जुलाई 2026 को 02:13 am बजे
वोटर लिस्ट से गायब हुआ नाम तो रद्द हो गया राशन कार्ड! सुप्रीम कोर्ट ने दिखाया रास्ता

सौजन्य से:- Hindustan

वोटर लिस्ट से गायब हुआ नाम तो रद्द हो गया राशन कार्ड! सुप्रीम कोर्ट ने दिखाया रास्ता

बंगाल में वोटर लिस्ट से नाम कटने पर राशन कार्ड रद्द करने के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। CJI की बेंच ने सुनवाई से इनकार कर याचिकाकर्ता को हाईकोर्ट जाने का निर्देश दिया। पढ़ें पूरी खबर।

पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट से नाम कटने के बाद क्या लोगों का राशन भी बंद हो जाएगा? इस मामले पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक बेहद अहम टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने कहा कि जिन लोगों का नाम पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से हटा दिया गया है, वे अभी भी राशन जैसे कुछ लाभ पाने के हकदार हो सकते हैं। अदालत ने राशन कार्ड रद्द न करने की गुहार लगाने वाले एक शख्स को संबंधित हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने का निर्देश दिया है।

पश्चिम बंगाल में 'स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन' (SIR) के बाद वोटर लिस्ट से नाम काटे जाने और फिर इसके आधार पर राशन कार्ड रद्द होने के मामले में सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई हुई। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को उस रिट याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया है, जिसमें बंगाल सरकार के राशन कार्ड रद्द करने के फैसले को चुनौती दी गई थी। चीफ जस्टिस की अगुवाई वाली बेंच ने याचिकाकर्ता से इस मामले को लेकर सीधे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने को कहा है।

क्या है पूरा मामला?

नादिया जिले के रहने वाले मोहिबुल्ला मंडल ने सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका दायर की थी। दरअसल, 'संदिग्ध नागरिकता' के आधार पर SIR के तहत जिन लोगों के नाम वोटर लिस्ट से काटे गए हैं, बंगाल सरकार उनके राशन कार्ड भी रद्द कर रही है। याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील शादान फरासत ने चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ को बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने पिछले आदेश में साफ किया था कि SIR का दायरा सिर्फ मतदाता सूची में संशोधन तक ही सीमित है। नागरिकता का अंतिम निर्धारण करने का अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है, लेकिन इसके बावजूद राज्य में लोगों के राशन कार्ड रद्द किए जा रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से क्यों किया इनकार?

पीठ ने याचिका पर सीधे सुनवाई करने से इनकार करते हुए कहा कि मंडल ने वोटर लिस्ट से नाम हटाए जाने के खिलाफ संबंधित ट्रिब्यूनल में पहले ही अपनी अपील दायर कर रखी है। सुप्रीम कोर्ट ने उस ट्रिब्यूनल को निर्देश दिया है कि वह मंडल की अपील पर दो महीने के अंदर अपना फैसला सुनाए।

पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि अगर ट्रिब्यूनल का फैसला याचिकाकर्ता के पक्ष में आता है, तो उनका नाम अपने आप मतदाता सूची में शामिल हो जाएगा और राशन समेत अन्य सभी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ उन्हें दोबारा मिलने लगेगा। इसके साथ ही कोर्ट ने कहा कि वह अपने पिछले आदेश (जहां SIR को सिर्फ वोटर लिस्ट तक सीमित रखा गया था) उससे पूरी तरह वाकिफ है, लेकिन वोटर लिस्ट से नाम कटने को राशन कार्ड रद्द करने से जोड़ने के इस मौजूदा विवाद को पहले हाईकोर्ट में ही चुनौती दी जानी चाहिए।

'भोजन और जीवन के अधिकार' पर खतरा

याचिकाकर्ता मोहिबुल्ला मंडल ने अपनी याचिका में बताया कि उन्हें बंगाल सरकार द्वारा जनवरी 2016 में नेशनल फूड सिक्योरिटी अथॉरिटी (NFSA) के तहत 'प्रायोरिटी हाउसहोल्ड' की श्रेणी में डिजिटल राशन कार्ड जारी किया गया था। याचिकाकर्ता का कहना है कि गांव की राशन दुकान (PDS आउटलेट) से उन्हें मिलने वाला रियायती अनाज अब बंद कर दिया गया है। इससे उनके 'भोजन के अधिकार' और 'जीवन के अधिकार' को गंभीर खतरा पैदा हो गया है।

हालांकि, इन दलीलों के बावजूद शीर्ष अदालत ने उन्हें कानूनी प्रक्रिया के तहत हाईकोर्ट जाने का ही रास्ता दिखाया। सुनवाई के दौरान सीजेआई ने मौखिक तौर पर टिप्पणी करते हुए कहा, "आप सही कह रहे हैं। भले ही आपका नाम वोटर लिस्ट से हटा दिया गया हो, फिर भी आप कुछ लाभों के हकदार हैं। लेकिन, ये लाभ हाईकोर्ट द्वारा बहुत अच्छी तरह से दिए जा सकते हैं..."

'हाईकोर्ट जाएंगे तो जरूर मिलेगा लाभ'

याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील शादान फरासत ने कोर्ट में दलील दी कि यह सवाल आगे चलकर कई मामलों में उठेगा, इसलिए सुप्रीम कोर्ट को किसी एक मामले में स्थिति पूरी तरह साफ कर देनी चाहिए। इस पर सीजेआई ने कहा, "अगर जरूरत पड़ी तो हम 100 मामलों में भी स्थिति स्पष्ट करेंगे। लेकिन हमें पूरा यकीन है कि हाईकोर्ट हमें ऐसा करने का मौका ही नहीं देंगे। वे इस बात को बहुत अच्छी तरह से समझेंगे कि आप कुछ लाभों के हकदार हैं। आप संबंधित हाईकोर्ट जाइए, वे आपको यह राहत देंगे।"

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Amit Kumarडिजिटल पत्रकारिता की बदलती लहरों के बीच समाचारों की तह तक जाने की ललक अमित कुमार को इस क्षेत्र में खींच लाई। समकालीन राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर पैनी नजर रखने के साथ-साथ अमित को जटिल विषयों के गूढ़ विश्लेषण में गहरी रुचि है। उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के रहने वाले अमित को मीडिया जगत में एक दशक का अनुभव है। वे पिछले 4 वर्षों से लाइव हिन्दुस्तान में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।

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अमित ने देश के प्रतिष्ठित भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा और गुरु जम्भेश्वर विश्वविद्यालय से जनसंचार में मास्टर डिग्री हासिल की है। उन्होंने यूनिसेफ और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से हेल्थ जर्नलिज्म का सर्टिफिकेशन भी प्राप्त किया है। एआई-असिस्टेड कंटेंट ऑप्टिमाइजेशन और एडिटोरियल प्लानिंग में उनकी विशेषज्ञता उन्हें आज के आधुनिक न्यूज रूम के लिए एक अनिवार्य स्तंभ बनाती है। पेशेवर जीवन से इतर, अमित एक जुनूनी घुमक्कड़ हैं जिन्हें हार्डकोर ट्रेकिंग और फोटोग्राफी का शौक है, साथ ही वे ऐतिहासिक और वास्तविक जीवन पर आधारित सिनेमा देखने के भी शौकीन हैं।

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