ट्रेन में आग की अफवाह से मृत यात्री के परिवार को मुआवजा
पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया कि ट्रेन में आग की अफवाह से घबराकर कूदने वाले यात्री की मौत 'अप्रत्याशित दुर्घटना' मानी जाएगी और रेलवे को मुआवजा देना होगा। यह मामला एक यात्री की मौत से जुड़ा है जो ट्रेन से कूद गया था जब ट्रेन में आग लगने की अफवाह फैल गई थी।

सौजन्य से:- Jagran
'ट्रेन में आग की अफवाह से मौत 'अप्रत्याशित दुर्घटना', पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट ने रेलवे को दिया मुआवजा देने का आदेश
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया कि ट्रेन में आग की अफवाह से घबराकर कूदने वाले यात्री की मौत 'अप्रत्याशित दुर्घटना' मानी जाएगी। ...और पढ़ें
HighLights
- ट्रेन में आग की अफवाह से मौत 'अप्रत्याशित दुर्घटना' मानी गई
- हाई कोर्ट ने रेलवे को 8 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया
- यात्री की लापरवाही पर मुआवजा नहीं रोका जा सकता
दयानंद शर्मा, चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने रेलवे दुर्घटना मुआवजा मामलों में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि यदि ट्रेन में आग लगने की अफवाह के कारण कोई यात्री घबराहट में अपनी जान बचाने के लिए ट्रेन से उतरता है और दूसरे ट्रैक पर आ रही ट्रेन की चपेट में आकर उसकी मौत हो जाती है, तो इसे रेलवे अधिनियम के तहत 'अनटुवर्ड इंसीडेंट' (अप्रत्याशित दुर्घटना) माना जाएगा। ऐसे मामले में रेलवे केवल यह कहकर मुआवजा देने से इनकार नहीं कर सकता कि यात्री ने स्वयं लापरवाही की या वह ट्रेन से उतरने के बाद यात्री नहीं रहा।
जस्टिस हरकेश मनुजा ने मयंक के माता-पिता मीना व एक अन्य की अपील स्वीकार करते हुए रेलवे दावा न्यायाधिकरण (क्लेम्स ट्रिब्यूनल) चंडीगढ़ का 14 नवंबर 2025 का फैसला रद्द कर दिया और रेलवे को आठ लाख रुपये का वैधानिक मुआवजा छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित देने का आदेश दिया।
मामले के अनुसार मयंक और उसके साथी औरंगाबाद में जागरण में शामिल होने के बाद सचखंड एक्सप्रेस से करनाल लौट रहे थे। उनके पास वैध रेलवे टिकट था। यात्रा के दौरान हरसाना कलां रेलवे स्टेशन के पास ट्रेन में आग लगने की अफवाह फैल गई। इससे डिब्बे में अफरा-तफरी मच गई और कई यात्रियों की तरह मयंक भी अपनी जान बचाने के लिए ट्रेन से कूद गया। इसी दौरान समानांतर ट्रैक पर आ रही दूसरी ट्रेन की चपेट में आने से उसकी मौत हो गई।
रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल ने यह तो माना था कि मयंक वैध टिकट के साथ यात्रा कर रहा था और वह वास्तविक यात्री था, लेकिन यह कहते हुए मुआवजा देने से इनकार कर दिया कि ट्रेन से उतरते ही वह यात्री नहीं रहा और उसका कृत्य स्वयं की लापरवाही तथा आत्मप्रेरित चोट की श्रेणी में आता है।
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हाई कोर्ट ने इस निष्कर्ष को पूरी तरह गलत ठहराया। अदालत ने कहा कि यात्रा का अनुबंध केवल इसलिए समाप्त नहीं हो जाता कि असाधारण परिस्थितियों में कोई यात्री बीच रास्ते में ट्रेन से उतरने को मजबूर हो जाए। जब तक वह अपने गंतव्य तक नहीं पहुंचता, उसका यात्री होने का दर्जा समाप्त नहीं होता।
अदालत ने कहा कि जो यात्री ट्रेन में आग लगने की वास्तविक आशंका के बीच अपनी जान बचाने के लिए छलांग लगाता है, उसके बारे में यह नहीं कहा जा सकता कि उसने स्वयं को चोट पहुंचाने का इरादा रखा था। उसका आचरण आत्म विनाश नहीं, बल्कि आत्मरक्षा की स्वाभाविक प्रतिक्रिया है।
हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई मामलों के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि रेलवे अधिनियम की धारा 124-ए स्ट्रिक्ट लाइबिलिटी के सिद्धांत पर आधारित है। इसमें यात्री की साधारण लापरवाही को मुआवजा न देने का आधार नहीं बनाया जा सकता।
रेलवे पर यह साबित करने का दायित्व होता है कि मामला कानून में निर्धारित अपवादों के अंतर्गत आता है। अदालत ने यह भी पाया कि मृतक के सहयात्री की गवाही से यह सिद्ध होता है कि ट्रेन में आग की अफवाह के कारण भारी दहशत फैल गई थी और कई यात्री ट्रेन से उतर गए थे। रेलवे ऐसा कोई साक्ष्य पेश नहीं कर सका जिससे यह साबित हो कि मृतक का मामला धारा 124-ए के किसी वैधानिक अपवाद में आता है।
इन परिस्थितियों में हाई कोर्ट ने ट्रिब्यूनल का फैसला निरस्त करते हुए मयंक के माता-पिता को आठ लाख रुपये का वैधानिक मुआवजा तथा दावा याचिका दायर करने की तिथि से भुगतान तक छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने का निर्देश दिया। रेलवे को आठ सप्ताह के भीतर पूरी राशि ट्रिब्यूनल में जमा कराने का आदेश भी दिया गया।
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