दहेज मामलों में झारखंड हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, सजा रद्द नहीं हो सकती
झारखंड हाई कोर्ट ने दहेज मामले में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा है कि घटना के बाद लागू कानून के तहत सजा पूर्वव्यापी प्रभाव से नहीं लगाई जा सकती। यह फैसला एक कथित दहेज मांग मामले में आया है, जिसमें आरोपित को निचली अदालत ने सजा सुनाई थी। अदालत ने अभियोजन को दहेज निषेध अधिनियम की धारा-4 के तहत आरोप सिद्ध करने में विफल रहने पर सजा रद्द करने का आदेश दिया है।

सौजन्य से:- Jagran
दहेज मामले में झारखंड HC का अहम फैसला, घटना के बाद लागू हुए कानून के तहत नहीं हो सकती सजा
रांची हाई कोर्ट ने दहेज मामले में निचली अदालत की सजा रद्द की, क्योंकि घटना के बाद लागू कानून को पूर्वव्यापी प्रभाव से नहीं लगाया जा सकता। अदालत ने कहा ...और पढ़ें
HighLights
- हाई कोर्ट ने निचली अदालत की दहेज सजा रद्द की।
- घटना के बाद लागू कानून पूर्वव्यापी नहीं हो सकता।
- अभियोजन दहेज मांग विवाह पूर्व सिद्ध नहीं कर सका।
राज्य ब्यूरो, रांची। हाई कोर्ट के जस्टिस एके राय की अदालत ने कथित दहेज मांग मामले में कामाख्या नारायण तिवारी को निचली अदालत द्वारा सुनाई गई सजा निरस्त कर दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जिस कानूनी संशोधन के आधार पर दोषी करार दिया गया था, वह घटना के बाद लागू हुआ था। कोर्ट के अनुसार, उसे पूर्वव्यापी प्रभाव से लागू नहीं किया जा सकता।
अदालत ने प्रार्थी की अपील स्वीकार करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष दहेज निषेध अधिनियम की धारा-4 के तहत आरोप सिद्ध करने में विफल रहा। कोर्ट ने कहा कि यह मामला वर्ष 1979 में हुए विवाह और वर्ष 1984 में कथित दहेज मांग से जुड़ा है।
जबकि दहेज निषेध (संशोधन) अधिनियम, 1986 के माध्यम से धारा-4 में विवाह के बाद किसी भी समय की गई दहेज मांग को भी अपराध की परिभाषा में शामिल किया गया था। यह संशोधन 19 नवंबर 1986 से प्रभावी हुआ और इसका पूर्वव्यापी प्रभाव नहीं है।
अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 20(1) का हवाला देते हुए कहा कि किसी भी व्यक्ति को ऐसे कानून के तहत दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जो कथित अपराध की तिथि पर लागू ही नहीं था। अभियोजन का आरोप था कि विवाह के बाद आरोपित और उसके परिजनों ने मोटरसाइकिल की मांग की तथा मांग पूरी नहीं होने पर विवाहिता शशि कुमारी को प्रताड़ित किया गया।
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बाद में उसकी मृत्यु हो गई। हत्या के आरोप में ट्रायल कोर्ट पहले ही आरोपित को बरी कर चुका था, लेकिन दहेज निषेध अधिनियम की धारा-4 के तहत छह माह के कारावास और पांच हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी।
हाई कोर्ट ने गवाहों के बयानों का विश्लेषण करते हुए पाया कि सभी गवाहों ने मोटरसाइकिल की मांग विवाह के बाद किए जाने की बात कही है। किसी भी गवाह ने यह नहीं बताया कि दहेज की मांग विवाह से पहले या विवाह के समय की गई थी।
अदालत ने कहा कि घटना के समय लागू कानून के अनुसार धारा-4 के तहत अपराध तभी बनता था, जब दहेज की मांग विवाह से पहले, विवाह के समय या विवाह के संबंध में की गई हो। चूंकि अभियोजन इस आवश्यक तत्व को साबित नहीं कर सका, इसलिए दोषसिद्धि टिक नहीं सकती।
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