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सुप्रीम कोर्ट ने यूपी पुलिस की ‘अज्ञात’ FIR पर की तीखी फटकार, आरोपी को मौके पर पकड़े जाने के बाद भी नाम नहीं लिखा गया

बुलंदशहर में छेड़छाड़ के केस में पुलिस ने आरोपी को तुरंत हिरासत में ले लिया, फिर भी FIR में उसे ‘अज्ञात व्यक्ति’ बताया। इस अनियमितता को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए सुधार का आदेश दिया और जांच को CBI को सौंपने की सम्भावना जताई।

30 सितंबर 2026 को 04:05 pm बजे
सुप्रीम कोर्ट ने यूपी पुलिस की ‘अज्ञात’ FIR पर की तीखी फटकार, आरोपी को मौके पर पकड़े जाने के बाद भी नाम नहीं लिखा गया

सौजन्य से:- navbharattimes.indiatimes.com

उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में छेड़छाड़ के एक मामले में आरोपी को मौके पर पकड़े जाने के बावजूद FIR में 'अज्ञात' दर्शाने पर सुप्रीम कोर्ट ने यूपी पुलिस की सख्त क्लास लगाई है।

नई दिल्ली: यूपी के बुलंदशहर में छेड़छाड़ के एक मामले की जांच को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस पर कड़ी नाराजगी जताई। सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस को फटकार लगाते हुए कहा, “निर्धारित लाइन पर चलना एक बात है, लेकिन पूरी तरह झुक जाना दूसरी बात है। कोर्ट ने यह टिप्पणी छेड़छाड़ के मामले की सुनवाई के दौरान उस समय की, जब पुलिस ने आरोपी को मौके पर गिरफ्तार करने के बावजूद उसके खिलाफ ‘अज्ञात व्यक्ति’ के नाम से मामला दर्ज किया था।

सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस की कार्यशैली पर उठाए सवाल

अदालत ने इस मामले में पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए यहां तक कहा कि यदि इसी तरह जांच होती रही तो उत्तर प्रदेश पुलिस को भंग कर सभी जांच CBI को सौंपने पर विचार करना पड़ सकता है। जस्टिस संजय कुमार और संजीव सचदेवा की पीठ बुधवार को छेड़छाड़ के आरोपी को मिली अग्रिम जमानत रद्द करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिकाकर्ता ने खुद अदालत में पेश होकर पुलिस की रिपोर्ट को पक्षपातपूर्ण बताया।

मौके पर पकड़े गए व्यक्ति को FIR में ‘अज्ञात’ बताया?

याचिकाकर्ता के मुताबिक, घटना के दौरान आरोपी को मौके पर ही पकड़ लिया गया था और स्थानीय पुलिस के हवाले किया गया था। इसके बावजूद पुलिस ने शुरुआत में ‘अज्ञात मोटरसाइकिल सवार’ के खिलाफ FIR दर्ज की। अदालत ने यूपी पुलिस के वकील से सवाल किया कि अगर व्यक्ति को मौके पर ही पकड़ लिया गया था तो FIR में अज्ञात क्यों लिखा गया?”

याचिकाकर्ता ने लगाया आरोप

कोर्ट ने कहा कि ऐसी कार्रवाई से लोगों का पुलिस पर भरोसा कैसे कायम रहेगा? याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि अदालत से पुलिस रिपोर्ट मांगे जाने के बाद FIR में आरोपी का नाम जोड़ दिया गया, जबकि इस दौरान कोई उचित जांच नहीं की गई। उन्होंने यह भी दावा किया कि पुलिस की शुरुआती रिपोर्ट आरोपी के पक्ष में थी और बाद में उसे क्लीन चिट भी दे दी गई।

बाइक की नंबर प्लेट को लेकर भी सवाल

याचिकाकर्ता ने जांच के दौरान मोटरसाइकिल से जुड़ी विसंगति का भी आरोप लगाया। उनके मुताबिक, जब बाइक जब्त की गई थी तब उस पर नंबर प्लेट नहीं थी, लेकिन जांच के दौरान उसे अचानक एक रजिस्ट्रेशन नंबर दे दिया गया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि शिकायत सुबह दी गई थी, लेकिन पुलिस रिकॉर्ड में उसका समय रात 9 बजे दर्ज किया गया।

‘कवर-अप’ पर कोर्ट की तल्ख टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर नाराजगी जताते हुए कहा, “लाइन पर चलना एक बात है, लेकिन झुक जाना दूसरी बात है। और इस तरह का कवर-अप? जितना कम कहा जाए उतना बेहतर है। कोर्ट ने कहा कि जांच में ऐसी कमियां कई मामलों में देखने को मिलती हैं।

पीठ ने किया सवाल

पीठ ने सवाल किया कि यदि पुलिस इसी तरह मामलों में कार्रवाई करेगी तो जनता उस पर भरोसा कैसे करेगी। पीठ ने टिप्पणी की कि यह बेहतर होगा कि हम CBI को हस्तक्षेप करने और यूपी पुलिस की सभी जांच अपने हाथ में लेने को कहें। फिर यूपी पुलिस को भंग ही कर देते हैं। यह सब किसी न किसी स्तर पर बंद होनी चाहिए।

पुलिस का हलफनामा ‘बेहद निराशाजनक’

सुप्रीम कोर्ट ने यूपी पुलिस की ओर से दाखिल हलफनामे को “पूरी तरह निराशाजनक” बताया। कोर्ट ने पुलिस को नया हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है, जिसमें यह स्पष्ट करना होगा कि मौके पर आरोपी की गिरफ्तारी के बावजूद FIR में मोटरसाइकिल सवार को अज्ञात क्यों बताया गया। अदालत ने संबंधित थाना प्रभारी (SHO) को अगली सुनवाई में व्यक्तिगत रूप से अदालत में मौजूद रहने का निर्देश दिया है।

कोर्ट ने पुलिस से पूछा सवाल

कोर्ट ने यह भी पूछा कि FIR में आरोपी का नाम शुरू में जानबूझकर क्यों नहीं दर्ज किया गया और बाद में उसमें नाम किस आधार पर जोड़ा गया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी ऐसे व्यक्ति का नाम FIR में दर्ज न करना, जिसे मौके पर पकड़ा गया हो, और बाद में मामले के विवरण में बदलाव करना पुलिस जांच की विश्वसनीयता और कानून-प्रवर्तन संस्थाओं में जनता के भरोसे को गंभीर रूप से प्रभावित करता है।

लेखक के बारे मेंराजेश चौधरीराजेश चौधरी, नवभारत टाइम्स में लीगल एडिटर हैं। वह 22 साल से भी ज्यादा वर्षों से लीगल रिपोर्टिंग कर रहे हैं। शुरुआत में वह दिल्ली की निचली अदालत और सीबीआई कवर करते थे और बाद में वह दिल्ली हाई कोर्ट और फिर लगातार डेढ़ दशक से सुप्रीम कोर्ट कवर कर रहे हैं। इस दौरान राजेश ने देश के तमाम हाई प्रोफाइल केस नीतीश कटारा मर्डर केस, जेसिक लाल केस, बोफोर्स केस, उपहार केस, पार्लियामेंट अटैक केस, प्रिय दर्शनी मट्टू केस से लेकर तमाम संवैधानिक मसले कवर किए जिनमें अनुच्छेद-370, तीन तलाक, निजता का अधिकार, होमो सेक्सुअलिटी को अपराध से बाहर करने का मामला और राम मंदिर मसले अहम है। राजेश ने इस 22 साल के करियर के दौरान दो साल 2006 से लेकर 2007 के सितंबर तक सहारा समय टीवी चैनल में भी बतौर लीगल संवावददाता काम किया। इसके बाद दोबारा वह नवभारत टाइम्स आए और उसके बाद लगातार कानूनी अफेयर्स को कवर करते रहे। नेशनल ब्यूरो में रहते हुए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट और कानून मंत्रालय को कवर करने के साथ साथ कानून के विषय पर लगातार एडिट पेज पर लिख रहे हैं। साथ ही लगातार ऑनलाइन माध्यम के लिए भी सक्रिय रिपोर्टिंग करते रहे हैं और ..कोर्ट रूम..नाम के एक साप्ताहिक विडियो इंटरव्यू भी लगातार देते हैं जिनमें सप्ताह भर के मुख्य कानूनी मसले पर उनका साक्षात्कार प्रसारित होता है। इसके अलावा वह लगातार लीगल मसले पर लीगल फोरम नामक कॉलम भी लिखते रहे हैं। उन्होंने दरभंगा के ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय से केमिस्ट्री में एमएससी किया है। साथ ही उन्होंने जर्नलिज्म में पीजी डिप्लोमा किया और एलएलबी भी कर रखा है।... और पढ़ें

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