सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का जमानत आदेश रद्द किया, निजी नैतिकता से नहीं होना चाहिए फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जमानत और आपराधिक मामलों में अदालतें केवल कानून व तथ्य के आधार पर ही निर्णय ले सकती हैं, निजी नैतिक विचारों को नहीं अपनाना चाहिए। इस बात के प्रकाश में, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के यौन शोषण केस में जमानत न देने के फैसले को उलट कर आरोपी को बँधे एक साल से अधिक समय के बाद जमानत दी गई और सात दिनों के भीतर विशेष कोर्ट में पेश होने का निर्देश दिया गया।

सौजन्य से:- Dainik Bhaskar
- Hindi News
- National
- Supreme Court Sets Aside MP High Court Bail Order | Legal News
क्रिमिनल केस में जज अपनी नैतिक सोच न थोपें:सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का जमानत आदेश रद्द किया
- कॉपी लिंक
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जमानत और आपराधिक मामलों में अदालतें अपनी निजी नैतिक सोच के आधार पर फैसला नहीं कर सकतीं। फैसला कानून और मामले के तथ्यों के आधार पर होना चाहिए।
जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस एएस चंद्रकुर की बेंच ने 23 सितंबर को यह बात कही। कोर्ट ने यौन शोषण के एक मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का जमानत खारिज करने वाला फैसला रद्द कर दिया।
हाईकोर्ट ने जमानत देने से इनकार करते हुए कहा था कि आरोपी की रिहाई से सामाजिक व्यवस्था और पीड़िता के परिवार की नैतिकता पर असर पड़ सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरोपी एक साल से ज्यादा समय से जेल में है और केस की सुनवाई पूरी होने में अभी समय लग सकता है। इन बातों को देखते हुए कोर्ट ने आरोपी को जमानत दे दी।
आरोपी पर लगे आरोप
आरोपी के खिलाफ मध्य प्रदेश के रतलाम जिले में FIR दर्ज की गई थी। इसमें BNS की विभिन्न धाराओं के साथ प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेज एक्ट, 2012 (POCSO Act) और शेड्यूल्ड कास्ट्स एंड शेड्यूल्ड ट्राइब्स (प्रिवेंशन ऑफ एट्रोसिटीज) एक्ट, 1989 की धाराएं लगाई गई थीं।
आरोपी पीड़िता के पड़ोस में किराएदार के रूप में रहता था। आरोप है कि शादीशुदा होने के बावजूद उसने पीड़िता की बड़ी बहन को अगवा करने की कोशिश की। इसके बाद मामला दर्ज हुआ।
बाद में पीड़िता ने अपनी मां को बताया कि आरोपी ने करीब एक महीने तक उसका यौन शोषण किया। इसके बाद मौजूदा मामले में FIR दर्ज की गई।
बचाव पक्ष की दलील
आरोपी के वकील ने कहा कि यह मामला आरोपी के पीड़िता की बड़ी बहन के साथ संबंधों का नतीजा है। वकील के मुताबिक, बड़ी बेटी के साथ संबंधों को लेकर आरोपी को परेशान करने के लिए यह मामला दर्ज कराया गया।
एक साल से ज्यादा समय से जेल में
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि आरोपी एक साल से ज्यादा समय से हिरासत में है। ट्रायल पूरा होने में अभी कुछ और समय लग सकता है।
बेंच ने कहा, “इन परिस्थितियों में हम मानते हैं कि आरोपी को जमानत देने का आधार बनता है।” इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का आदेश रद्द कर दिया।
बेंच ने निर्देश दिया कि आरोपी को अधिकतम सात दिनों के भीतर संबंधित क्षेत्राधिकार वाली स्पेशल कोर्ट में पेश किया जाए। इसके बाद तय शर्तों और जमानत की शर्तों के अनुसार उसे रिहा किया जाए।
Powered by Nyaya 247 News
संबंधित ख़बरें
इसी विषय की और ख़बरें →
सुप्रीम कोर्ट सर्वे में उजागर: हर 11 छात्रों में से 1 को आया आत्महत्या का विचार

सुप्रीम कोर्ट ने यूपी पुलिस की जांच पर लगाई तीखी फटकार, CBI को सौंपने की माँग

क़ानून तो कड़े, पर जमीन पर सुरक्षा का अभाव: दिल्ली से दूर‑दराज़ तक समान कहानी

SC ने फायरक्रैकर्स पर समय-सीमा तय करके पूर्ण प्रतिबंध से इंकार किया

सुप्रीम कोर्ट ने तय किया कि अभियुक्त को प्रॉसिक्यूशन के अप्रयुक्त दस्तावेज़ों की प्रतिलिपि हेतु उचित चरण में मांग का अधिकार

सुप्रीम कोर्ट ने दीवाली के पटाखों पर कुल प्रतिबंध नहीं किया, लेकिन उपयोग के समय पर रोक लगाई

सुप्रीम कोर्ट ने जमानत में निजी नैतिकता को बाहर रखा, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का आदेश रद्द

कोरबा के सामूहिक दुष्कर्म में दो आरोपियों को 20 साल की कठोर सजा
ताज़ा ख़बरें
- सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस कैंडिडेट की बंधक याचिका पर 'खारिज' संकेत दिया, फैसला सोमवार को होगा
- मेरठ के ब्लू ड्रम हत्याकांड में मुस्कान‑साहिल को दोषी करार, सजा का फैसला अभी बाकी
- सुप्रीम कोर्ट ने नंदिग्राम बाय-इलेक्शन में मीलन प्रधान के बीचस्थ रिहाई पर दलील को सोमवार तक स्थगित किया
- सुप्रीम कोर्ट ने यूपी पुलिस को 'नॉनसेंस' कहा, जांच में हेरफेर पर चेतावनी
- सुप्रीम कोर्ट ने फायरक्रैकर्स पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं किया, संतुलित समाधान की दिशा में कदम
- हाई कोर्ट ने LPU दंगों पर रिपोर्ट का आग्रह किया, जिम्मेदार कौन?
- सुप्रीम कोर्ट ने वाहन सुरक्षा के मौजूदा नियमों की पुष्टि की, नई आदेश नहीं दिया
- हॉस्पिटल शेयरों पर तीव्र गिरावट: क्यों हुआ यह संकट?

