राजस्थान: 20 साल से पांचना बांध पर विवाद, कोर्ट के फ़ैसले के बावजूद नहीं निकला समाधान
पूर्वी राजस्थान में संवाद की कमी के कारण एक बांध के पानी पर विवाद जारी, कमांड एरिया में नहरों में पानी छोड़े जाने की मांग रही, 39 गांवों के ग्रामीणों ने अपनी मांगों को लेकर संगठित हैं।

सौजन्य से:- BBC
राजस्थान: 20 साल से एक बांध के पानी पर क्या है विवाद, कोर्ट से भी आ चुका है फ़ैसला
- Author, मोहर सिंह मीणा
- पदनाम, करौली से बीबीसी हिंदी के लिए
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 10 मिनट
पूर्वी राजस्थान के करौली ज़िले में पांचना बांध का पानी लगभग बीस सालों से 74 गांवों के बीच विवाद का कारण बना हुआ है.
सिंचाई और पेयजल की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए बनाए गए इस बांध का पानी अब क्षेत्र में सामाजिक तनाव, राजनीतिक खींचतान और संभावित टकराव का मुद्दा बन गया है.
एक ओर कमांड एरिया के 35 गांवों के किसान हैं, जो पिछले दो दशकों से नहरों में पानी छोड़े जाने की मांग कर रहे हैं.
दूसरी ओर बांध क्षेत्र से जुड़े 39 गांवों के लोग हैं, जो साल 2007 से नहरों में पानी छोड़े जाने का विरोध कर रहे हैं. सरकार से लिफ़्ट परियोजना के तहत इन गांवों को पानी पहुंचाने की मांग कर रहे हैं.
राजस्थान हाई कोर्ट दो बार नहरों में पानी छोड़ने के आदेश दे चुका है. लेकिन, अब तक इन आदेशों का पालन नहीं किया जा सका है.
इसी बीच दोनों पक्षों ने अपने-अपने आंदोलनों को तेज़ कर दिया लेकिन सरकार की समझाइश के बाद धरना ख़त्म कर दिया गया.
प्रदेश सरकार में कृषि मंत्री डॉक्टर किरोड़ी लाल मीणा और गृह राज्य मंत्री जवाहर सिंह बेढम ने मौक़े पर पहुंच कर दोनों तरफ़ से आंदोलनकारियों को आश्वासन दिया और धरना समाप्त करवा दिया.
अब जयपुर में दोनों पक्षों के प्रतिनिधियों की वार्ता पर निर्भर करेगा कि बीस साल से जारी इस विवाद पर विराम लगेगा या यह फिर तेज़ी पकड़ेगा.
क्यों बना था पांचना बांध?
करौली शहर से करीब 12 किलोमीटर दूर गुड़ला गांव के पास पांचना बांध पांच नदियों भद्रावती, अटा, माची, बरखेड़ा और भैंसावत के पानी को संग्रहित करता है. यह पानी आगे गंभीरी नदी के ज़रिए भरतपुर होते हुए उत्तर प्रदेश की ओर बहता है.
साल 1972 में पूर्वी राजस्थान में आई भीषण बाढ़ के बाद इस क्षेत्र में जल प्रबंधन की आवश्यकता महसूस की गई. इसके बाद पांचना बांध परियोजना को मंज़ूरी मिली, बांध का निर्माण कार्य 1978-79 में शुरू होकर 2004-05 में पूरा हुआ.
सिंचाई विभाग के अनुसार, इस परियोजना का कुल कमांड एरिया लगभग 9,985 हेक्टेयर है, जिसमें करौली और सवाई माधोपुर ज़िलों के इलाक़े शामिल हैं. सिंचाई विभाग के रिकॉर्ड के मुताबिक़ साल 1990 से 2005 तक नहरों के ज़रिए किसानों को सिंचाई का पानी उपलब्ध कराया जाता रहा.
लेकिन, साल 2006-07 में हालात बदल गए. बांध के आसपास बसे गांवों के लोगों ने नहरों में पानी छोड़े जाने का विरोध शुरू कर दिया. उनका कहाना था कि इससे उनके इलाके में जल संकट पैदा हो सकता है. यहीं से शुरू हुआ विवाद आज तक जारी है.
पानी का विवाद कैसे बना सामाजिक संघर्ष?
पांचना बांध का विवाद केवल जल बंटवारे का मुद्दा नहीं रह गया है. समय के साथ यह सामाजिक और जातीय तनाव का रूप भी ले चुका है.
कमांड एरिया के 35 गांवों में मीणा समुदाय की आबादी अधिक है, जबकि बांध और उसके आसपास के 39 गांवों में गुर्जर समुदाय का प्रभाव है. ऐसे में पानी को लेकर शुरू हुआ विवाद अब दो समुदायों के बीच टकराव के रूप में भी देखा जाने लगा है.
सवाई माधोपुर ज़िले के खंडीप गांव में पिछले करीब तीन सप्ताह से हज़ारों ग्रामीण धरने पर बैठे रहे. उनकी मांग थी कि इस बार हाई कोर्ट के आदेश के अनुसार नहरों में पानी छोड़ा जाए.
धरने में शामिल बबीता मीणा ने कहा, "लगभग बीस साल से हमारे हिस्से का पानी हमें नहीं मिला है. खेती पूरी तरह बारिश पर निर्भर हो गई है और भूजल लगातार नीचे जा रहा है."
आंदोलन में शामिल अर्जुन महर का कहना है कि पानी न मिलने से कमांड एरिया के किसानों को हर साल करीब 200 करोड़ रुपये का आर्थिक नुक़सान हो रहा है.
वह कहते हैं, "खेती की ज़मीन बंजर होती जा रही है. कई गांवों में पीने के पानी तक की समस्या बढ़ गई है."
दूसरी तरफ की चिंता
दूसरी ओर पांचना बांध के आसपास के 39 गांवों के ग्रामीण भी पिछले बीस वर्षों से अपनी मांगों को लेकर संगठित हैं. बांध के पास बड़ी संख्या में लोग धरना देकर नहरों में पानी छोड़े जाने का विरोध कर रहे हैं.
इनकी मुख्य मांग है कि सरकार लिफ़्ट परियोजना के माध्यम से पाइपलाइन और पंपिंग सिस्टम से उनके खेतों तक पानी पहुंचाने की व्यवस्था करे.
धरने में शामिल 34 वर्षीय अर्जुन धाबाई कहते हैं, "हम बचपन से इस विवाद को देखते आ रहे हैं. यदि पानी नहरों में छोड़ा गया तो हमारे इलाके में जल संकट पैदा हो सकता है. हम सरकार से लिफ़्ट परियोजना के ज़रिये पानी चाहते हैं."
गुर्जर समुदाय के भानुप्रताप गुर्जर का कहना है, "बांध बनने में हमारी ज़मीनें गई हैं. इसलिए पानी पर पहला अधिकार हमारा है. पहले सरकार हमारी सिंचाई की व्यवस्था करे, उसके बाद अन्य क्षेत्रों को पानी दिया जाए."
इसी मांग के कारण वह नहरों में एक बूंद पानी छोड़े जाने के भी ख़िलाफ़ हैं.
आश्वासन के बाद धरना हटाया
विवाद को सुलझाने के लिए प्रशासन लगातार प्रयास कर रहा है. भरतपुर संभागीय आयुक्त नलिनी कठौतिया की अध्यक्षता में कई दौर की वार्ताएं हो चुकी हैं.
23 जून को करौली ज़िला मुख्यालय पर हुई बैठक में राजस्थान पुलिस के अतिरिक्त महानिदेशक बीजू जॉर्ज जोसेफ, वरिष्ठ आईएएस अधिकारी कृष्ण कुणाल, रेंज आईजी कैलाश चंद बिश्नोई, करौली और सवाई माधोपुर के ज़िला कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक मौजूद रहे.
दोनों पक्षों के प्रतिनिधियों के साथ यह तीसरी बड़ी वार्ता थी, लेकिन कोई सहमति नहीं बन सकी.
करौली कलेक्टर अक्षय गोदारा ने बीबीसी से कहा, "संभागीय आयुक्त के स्तर पर दोनों पक्षों के बीच कई दौर की वार्ताएं हुई हैं. आज भी एक बैठक प्रस्तावित है. हम आपसी सहमति से समाधान निकालने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन अभी दो प्रमुख बिंदुओं पर गतिरोध बना हुआ है."
24 जून को दिन में खंडीप गांव में जारी आंदोलन स्थल पर सरकार में कृषि मंत्री डॉक्टर किरोड़ी लाल मीणा अपने समर्थक विधायकों के साथ पहुंचे. यहां उन्होंने आंदोलनकारियों को छह दिन में नहरों में पानी छोड़े जाने का आश्वासन दिया.
उन्होंने कहा कि वह सिंचाई मंत्री से लिखित में लेकर आएंगे और छह दिन में नहरों में पानी नहीं आया तो मंत्री रहते हुए वह धरना देंगे. इसके बाद तीन सप्ताह से जारी धरना समाप्त हुआ.
दूसरी ओर पांचना बांध पर जारी आंदोलन में 24 जून की रात ज़िला प्रशासन को साथ लेकर गृह राज्य मंत्री जवाहर सिंह बेढ़म पहुंचे. उन्होंने आंदोलनकारियों की मांगों पर सरकार से वार्ता कर समाधान करने का आश्वासन दिया. इसके बाद दूसरी ओर भी धरना खत्म किया गया है.
हालांकि, दोनों ओर से प्रतिनिधि मंडल मंत्रियों के साथ जयपुर में वार्ता कर अपनी मांग रखेंगे और समाधान का प्रयास किया जाएगा.
राजनीति भी बनी वजह?
स्थानीय लोगों और आंदोलनकारियों का मानना है कि पांचना बांध विवाद के लंबे समय तक बने रहने के पीछे राजनीतिक कारण भी हैं.
विवाद की शुरुआत के बाद राजस्थान में भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों की सरकारें सत्ता में रही हैं. साल 2007 के बाद वसुंधरा राजे के नेतृत्व में भाजपा सरकार रही. इसके बाद अशोक गहलोत के नेतृत्व में कांग्रेस सरकारें आईं और वर्तमान में फिर भाजपा सत्ता में है.
गुर्जर नेता अशोक धाबाई कहते हैं, "हर बार समितियां बनीं, सर्वे हुए और आश्वासन दिए गए, लेकिन ऐसा कोई मॉडल लागू नहीं हुआ जिससे दोनों पक्षों की चिंताओं का समाधान हो सके."
गृह राज्य मंत्री जवाहर सिंह बेढ़म भी बीबीसी से बातचीत में इस बात को स्वीकार करते हैं कि पांचना के पानी को लेकर कुछ लोग राजनीति कर रहे हैं. हालांकि, उन्होंने साफ़ तौर पर किसी का नाम नहीं लिया.
पूर्वी राजस्थान में गुर्जर और मीणा समुदाय की आबादी कई सीटों को प्रभावित करती है. ऐसे में कोई भी राजनीतिक दल दोनों ही समुदायों को निराश नहीं करना चाहता.
दूसरी ओर गुर्जर आरक्षण आंदोलन से जुड़े नेता और भाजपा नेता विजय सिंह बैंसला भी हाल ही में पांचना बांध पर आयोजित महापंचायत में शामिल हुए थे. उन्होंने स्पष्ट कहा था कि जब तक उनकी मांगें पूरी नहीं होतीं, तब तक नहरों में पानी नहीं छोड़ा जाना चाहिए.
प्रदेश के गृह राज्य मंत्री और करौली प्रभारी मंत्री जवाहर सिंह बेढ़म का कहना है कि पूर्व में कुछ प्रयास हुए होंगे, लेकिन वे परिणाम तक नहीं पहुंच सके.
उन्होंने बीबीसी से कहा, "भजनलाल शर्मा सरकार ने लिफ़्ट परियोजना के लिए 50 करोड़ रुपये स्वीकृत किए हैं और इसकी डीपीआर भी तैयार हो चुकी है. हम दोनों पक्षों की मांगों को ध्यान रखते हुए समाधान करने के लिए प्रयास कर रहे हैं."
हाईकोर्ट के आदेश और बढ़ता दबाव
इस मामले में याचिका दायर करने वाले ग्रामोत्थान संस्थान के अध्यक्ष रघुवीर मीणा का कहना है कि राजस्थान हाईकोर्ट दो बार नहरों में पानी छोड़ने का आदेश दे चुका है.
वह कहते हैं, "हम सिर्फ़ इतना चाहते हैं कि कोर्ट के आदेश का पालन हो और कमांड एरिया के किसानों को उनका अधिकार मिले."
उधर, प्रशासन को आशंका है कि अगर जल्द समाधान नहीं निकला तो दोनों पक्षों के बीच तनाव और बढ़ सकता है. इसी कारण पुलिस और प्रशासन लगातार हालात पर नज़र रखे हुए हैं.
हालांकि, इस मामले में दूसरा पक्ष कोर्ट नहीं गया है. गुर्जर नेता अशोक धाबाई का कहना है कि "वे लोग कोर्ट गए हैं लेकिन हमने कोर्ट का रुख नहीं किया है. हम किसी का पानी नहीं रोक रहे हैं. हम सिर्फ़ अपने गांवों के लिए लिफ़्ट परियोजना के ज़रिए पानी की मांग कर रहे हैं."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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