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मद्रास हाई कोर्ट का सुनहरा फैसला: 50 साल 9 महीने की उम्र तक सरोगेसी का विकल्प चुनने की अनुमति.

मद्रास हाई कोर्ट ने सरोगेसी पर फैसला सुनाया है, जिसमें कहा गया है कि 50 वर्ष से अधिक लेकिन 51 वर्ष से कम उम्र की महिला सरोगेसी के लिए पात्र हो सकती है। कोर्ट ने कहा कि कानून की व्याख्या तकनीकी नहीं, उद्देश्य आधारित होनी चाहिए।

28 जून 2026 को 02:25 pm बजे
मद्रास हाई कोर्ट का सुनहरा फैसला: 50 साल 9 महीने की उम्र तक सरोगेसी का विकल्प चुनने की अनुमति.

सौजन्य से:- Jagran

51 की होने से पहले तक सरोगेसी से मां बनने का विकल्प, मद्रास हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

मद्रास हाई कोर्ट ने सरोगेसी पर एक अहम फैसला सुनाया है, जिसमें कहा गया है कि 50 वर्ष से अधिक लेकिन 51 वर्ष से कम उम्र की महिला सरोगेसी के लिए अयोग्य नह ...और पढ़ें

HighLights

- 50 वर्ष से अधिक महिलाएं 51 वर्ष तक सरोगेसी हेतु पात्र।

- मद्रास हाई कोर्ट ने निचली अदालत का फैसला पलटा।

- कानून की व्याख्या तकनीकी नहीं, उद्देश्य आधारित होनी चाहिए।

माला दीक्षित, नई दिल्ली। सरोगेसी को लेकर एक अहम और दूरगामी असर वाला फैसला देते हुए मद्रास हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि 50 वर्ष की उम्र पार कर चुकी महिला भी, जब तक वह 51 वर्ष की नहीं हो जाती, सरोगेसी का विकल्प चुनने के लिए अयोग्य नहीं मानी जाएगी।

साथ ही कोर्ट ने सरोगेसी के जरिये जन्म लेने वाले बच्चों के अभिरक्षा व जन्म प्रमाणपत्र के आवेदन निपटाने के संबंध में मजिस्ट्रेट के लिए भी दिशा-निर्देश जारी करते हुए चेतावनी दी है कि ऐसे मामलों में अत्यधिक तकनीकी दृष्टिकोण नहीं अपनाया जा सकता।

हाई कोर्ट ने इस मामले में निचली अदालत के उस आदेश को गलत ठहराते हुए रद कर दिया जिसमें निचली अदालत ने सरोगेसी का विकल्प अपनाने वाली महिला की आयु 50 वर्ष नौ महीने होने के आधार पर उसे अपात्र ठहरा दिया था जबकि सक्षम अथॉरिटी पहले ही उसकी पात्रता का प्रमाणपत्र जारी कर चुकी थी।

हाई कोर्ट का यह फैसला उन दंपती के लिए राहत लेकर आया है जो उम्र की सीमा को लेकर असमंजस में रहते हैं। अब यह साफ हो गया है कि कानून की व्याख्या कठोर तकनीकी आधार पर नहीं बल्कि उसके उद्देश्य के अनुसार की जानी चाहिए। यह फैसला ना सिर्फ एक दंपती के लिए राहत है, बल्कि यह पूरे देश में सरोगेसी कानून की व्याख्या के लिए महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।

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यह महत्वपूर्ण फैसला मद्रास हाई कोर्ट के न्यायाधीश शमीम अहमद ने गत 25 जून को नंदिनी देवी की याचिका पर दिया। मामला तमिलनाडु के नमक्कल जिले के एक दंपती से जुड़ा है, जो सरोगेसी के जरिये संतान प्राप्त करना चाहते थे। दंपती की शादी 2005 में हुई और 2008 में उन्हें पुत्र हुआ जिसकी नवंबर, 2024 में दिल का दौरा पड़ने से मृत्यु हो गई।

चूंकि चिकित्सीय कारण से महिला का गर्भाशय निकाला जा चुका था तो महिला प्राकृतिक रूप से गर्भधारण करने में सक्षम नहीं थी, इसलिए दंपती ने कानून के तहत सरोगेसी का रास्ता चुना। दंपती को संबंधित प्राधिकरण से पात्रता प्रमाण पत्र भी मिल चुका था और एक रिश्तेदार महिला ने सरोगेट मां बनने की सहमति दे दी थी।

लेकिन निचली अदालत ने दो मुख्य आधारों पर याचिका खारिज कर दी। पहला कि सरोगेसी के जरिये बनने की इच्छा रखने वाली महिला की उम्र 50 साल 9 महीने से अधिक थी, जिसे अदालत ने सीमा से बाहर माना। दूसरे सरोगेट मां के पति की गवाही नहीं ली गई थी।

मद्रास हाई कोर्ट ने दोनों आधार खारिज करते हुए सरोगेसी का विकल्प चुनने वाली मां के लिए कानून में दी गई आयु की व्याख्या की है। हाई कोर्ट ने कहा कि कानून में तय आयु 23 से 50 वर्ष है, इसका मतलब यह नहीं है कि 50 साल पूरा होते ही महिला अयोग्य हो जाती है। कहा जबतक महिला 51 वर्ष की नहीं होती, वह 50 वर्ष की श्रेणी में ही मानी जाएगी।

इसके अलावा हाई कोर्ट ने इस मुद्दे पर विचार करने की मजिस्ट्रेट की सीमा भी बताई है। हाई कोर्ट ने कहा है कि जब संबंधित प्राधिकरण पहले ही पात्रता प्रमाण पत्र दे चुका है, तो मजिस्ट्रेट को उसकी वैधता पर सवाल उठाने का अधिकार नहीं है। हाई कोर्ट ने कहा कि सरोगेट मां के पति की गवाही लेना कानूनन आवश्यक नहीं है, क्योंकि उसकी सहमति पहले ही दस्तावेजों में शामिल होती है।

हाई कोर्ट ने फैसले में सरोगेसी (रेगुलेशन) एक्ट 2021 के उद्देश्यों पर जोर देते हुए और विभिन्न पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि सरोगेसी एक्ट लाभकारी कानून है। इसे भारत में सरोगेसी को रेगुलेट करने और उससे भी जरूरी युवा जोड़ों में बांझपन की बढ़ती समस्या को हल करने के उद्देश्य से बनाया गया है।

इस एक्ट का मकसद बच्चों से वंचित जोड़ों के लिए माता-पिता बनने का कानूनी, नैतिक और चिकित्सकीय रूप से सुरक्षित रास्ता बनाना है, जिसमें न्यायपालिका की भूमिका बहुत अहम है। सिर्फ तकनीकी कमियों की वजह से माता-पिता बनने के रास्ते में रुकावट नहीं आनी चाहिए।

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