सुप्रीम कोर्ट में ज्यूरिस्ट को नियुक्त न करने पर जस्टिस भुइयां का खेद
जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 124(3) के तहत प्रतिष्ठित ज्यूरिस्ट को सुप्रीम कोर्ट का जज बनाया जा सकता है, पर 76‑वर्ष से अधिक समय में अभी तक किसी भी कानूनी शिक्षाविद को नियुक्त नहीं किया गया है। उन्होंने तर्क दिया कि अकादमिक विशेषज्ञों की भागीदारी से बेंच में विविधता और गहरी विशेषज्ञता आ सकती है, और यह प्रथा अमेरिका, यूके, कनाडा व केन्या में पहले से अपनाई गई है। इस पर उन्होंने सरकार व कॉलेजियम से आग्रह किया कि इस प्रावधान पर गंभीरता से विचार करें।

सौजन्य से:- Jagran
'किसी कानूनी विशेषज्ञ को सुप्रीम कोर्ट का जज नहीं बनाए जाने पर अफसोस', बोले जस्टिस भुइयां
जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 124(3) के तहत प्रतिष्ठित न्यायविदों को सुप्रीम कोर्ट का जज बनाने ...और पढ़ें
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने रविवार को कहा कि भले ही आर्टिकल 124(3) के तहत जाने-माने कानूनविदों (distinguished jurists) को सुप्रीम कोर्ट का जज बनाने की इजाजत है लेकिन यह अफसोस की बात है कि हमारे संविधान का यह प्रावधान अब तक इस्तेमाल नहीं किया गया है।
उन्होंने कहा, "संविधान को लागू हुए 76 साल से ज्यादा हो चुके हैं लेकिन अब तक सुप्रीम कोर्ट में किसी भी कानून के जानकार (ज्यूरिस्ट) को नियुक्त नहीं किया गया है।" उन्होंने आगे कहा कि या तो पहले केंद्र सरकार या बाद में कॉलेजियम को भारतीय एकेडमिक जगत की गहराई पर भरोसा नहीं था या फिर उन्होंने अब तक आर्टिकल 124(3) पर गंभीरता से विचार नहीं किया है।
'प्रतिभाशाली लोग मौजूद हैं लेकिन नहीं हुई नियुक्ति'
दिल्ली की नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में एलएलएम छात्रों के दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए जस्टिस भुइयां ने कहा, "अब तक किसी भी कानूनी शिक्षाविद (लीगल एकेडमिक) को सुप्रीम कोर्ट का जज नियुक्त नहीं किया गया है, जबकि ऐसे कई प्रतिभाशाली लोग मौजूद हैं जो बेंच का हिस्सा बनने पर महत्वपूर्ण योगदान दे सकते थे।"
कानूनी विशेषज्ञों को जज बनाने के खिलाफ व्यावहारिक अनुभव की कमी वाली बात का जवाब देते हुए उन्होंने कहा, "सुप्रीम कोर्ट न सिर्फ सबसे बड़ी न्यायिक संस्था है, बल्कि यह देश की नैतिक, कानूनी और संवैधानिक चेतना का संरक्षक भी है। यह तकनीकी बारीकियों से ऊपर है।"
जस्टिस भुइयां ने बताया ऐसा करना क्यों है जरूरी?
उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के जज के तौर पर जाने-माने कानून विशेषज्ञों को नियुक्त करने का मकसद विविधता लाना है, क्योंकि वे बेंच के लिए बहुत मूल्यवान साबित हो सकते हैं। उन्होंने आगे कहा, "अपनी विद्वता के दम पर वे शीर्ष स्तर पर निर्णय लेने की प्रक्रिया में अहम योगदान दे सकते हैं। जाने-माने कानूनी शिक्षाविदों और विद्वानों की भागीदारी का सुप्रीम कोर्ट के न्यायिक कामकाज पर निर्णायक असर पड़ेगा।"
'दूसरे देशों में हुई हैं नियुक्तियां'
उन्होंने कहा कि अमेरिका, यूके, कनाडा और केन्या में एकेडमिक्स (शिक्षाविदों) को अक्सर संवैधानिक अदालतों में जज नियुक्त किया जाता है। उन्होंने बताया कि अमेरिका में वे तब तक प्रैक्टिस कर सकते थे जब तक इससे एकेडमिक सेशन में कोई रुकावट न आए लेकिन भारत में बार काउंसिल के नियम 49 के तहत इस प्रैक्टिस का विरोध किया गया।
अमेरिका में फेलिक्स फ्रैंकफर्टर पहले ऐसे कानून के जानकार थे जिन्हें 1939 में थियोडोर रूजवेल्ट ने सुप्रीम कोर्ट का जज चुना था। इसके बाद कानूनी शिक्षा के क्षेत्र से कई लोगों को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का जज नियुक्त किया गया है, जिनमें से कई लोगों को इस भूमिका से पहले पढ़ाने का अनुभव था।
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