कोर्ट ने तय किया: बेटों को मां-बाप के साथ रहने का आदेश नहीं दे सकते हैं
कलकत्ता हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अदालत किसी भी बेटे को अपने माता-पिता के घर जाने या उनसे मिलने के लिए कोई आदेश नहीं दे सकती, हालांकि उनसे नैतिक दायित्व निभाते हुए उनकी देखभाल और स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने का निर्देश दे सकती है।

सौजन्य से:- Jagran
'बेटे को माता-पिता के साथ रहने का आदेश नहीं दे सकती अदालत', कोलकाता हाई कोर्ट की टिप्पणी
कलकत्ता हाई कोर्ट ने माता-पिता और बेटे के 13 साल पुराने विवाद में फैसला सुनाया कि अदालत बेटे को माता-पिता के साथ रहने का आदेश नहीं दे सकती। ...और पढ़ें
HighLights
- अदालत बेटे को माता-पिता के साथ रहने का आदेश नहीं दे सकती।
- बेटे को माता-पिता के इलाज और स्वास्थ्य बीमा का ध्यान रखना होगा।
- सोनारपुर के प्रोफेसर दंपती और बेटे के बीच 13 साल का विवाद।
राज्य ब्यूरो, कोलकाता। माता-पिता और इकलौते बेटे के बीच 13 वर्षों से चले आ रहे पारिवारिक विवाद पर सुनवाई करते हुए कलकत्ता हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अदालत किसी बेटे को अपने माता-पिता के घर जाकर रहने, उनसे मिलने या नियमित बातचीत करने का आदेश नहीं दे सकती। हालांकि अदालत ने बेटे को उसकी नैतिक जिम्मेदारी का अहसास कराते हुए कहा कि उसे वृद्ध माता-पिता के इलाज और स्वास्थ्य बीमा जैसी जरूरतों का ध्यान रखना चाहिए।
यह मामला सोनारपुर के सेवानिवृत्त प्रोफेसर दंपती आशीष कुमार राय व गीता राय तथा उनके बेटे कुशल राय के बीच का है। माता-पिता का आरोप है कि उनका बेटा न तो घर आता है, न फोन करता है और न ही उनका हालचाल लेता है। उन्होंने अदालत से बेटे को घर आने, संपर्क बनाए रखने और हर महीने पांच हजार रुपये चिकित्सा सहायता देने का निर्देश देने का अनुरोध किया था।
वहीं बेटे ने अदालत में कहा कि वह माता-पिता का स्वास्थ्य बीमा जारी रखे हुए हैं और अदालत के निर्देशानुसार आर्थिक सहायता भी दे रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने माता-पिता की संपत्ति पर अपना उत्तराधिकार छोड़ दिया है और उनके विरुद्ध पहले की गई शिकायतों के कारण उन्हें अपनी सुरक्षा की चिंता रहती है।
मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने चार सदस्यीय समिति गठित की, जिसमें क्लिनिकल साइकोलाजिस्ट, साइकेट्रिक सोशल वर्कर और फैमिली काउंसलर शामिल थे।
समिति ने अदालत को बताया कि दोनों पक्ष अपने-अपने रुख पर अड़े हैं और टूटे रिश्ते को जोड़ने के सभी प्रयास विफल रहे। समिति की रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि माता-पिता, दोनों आर्थिक रूप से सक्षम हैं। वे नियमित पेंशन प्राप्त करते हैं, उनके पास दो मंजिला मकान, कार और फिक्स्ड डिपाजिट भी हैं।
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न्यायमूर्ति कृष्ण राव ने इन सबपर गौर करके कहा कि इस मामले में आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि रिश्तों में आई दूरी ही असली समस्या है। यह कानून से अधिक एक टूटे हुए पारिवारिक रिश्ते का मामला है। अदालत ने काफी प्रयास किए, लेकिन संबंधों को फिर से सामान्य नहीं कर सकी।
वरिष्ठ नागरिक कानून के तहत बेटे की जिम्मेदारी माता-पिता की देखभाल करना है, लेकिन अदालत उसे घर जाकर रहने या मिलने के लिए बाध्य नहीं कर सकती, हालांकि उन्होंने बेटे से नैतिक दायित्व निभाते हुए माता-पिता के इलाज और स्वास्थ्य सुरक्षा की व्यवस्था जारी रखने को कहा।
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