पंजाब आपसी सहमति से बीबीएमबी विवाद सुलझाने के करीब
केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि पंजाब, हिमाचल के बकाया भुगतान के मामले में केंद्र के प्रस्ताव को मानने के बहुत करीब है, लेकिन पंजाब सरकार ने भुगतान के भुगतान की दर पर आपत्ति जताई है.

सौजन्य से:- ETV Bharat
BBMB हिस्सेदारी विवाद में केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से कहा, पंजाब आपसी समझौते के बहुत करीब है
पंजाब पुनर्गठन अधिनियम, 1966 के बाद कई दशकों तक संपत्तियों के बंटवारे को लेकर राज्यों के बीच विवाद नहीं सुलझ पाया.
By Sumit Saxena
Published : August 12, 2026 at 1:34 PM IST
नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि पंजाब सरकार, 1966 से भाखड़ा ब्यास मैनेजमेंट बोर्ड (BBMB) प्रोजेक्ट्स से जुड़े हिमाचल प्रदेश के बकाया भुगतान के मामले में केंद्र के प्रस्ताव को मानने के बहुत करीब है. यह मामला भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची और वी. मोहना की बेंच के सामने आया.
हिमाचल प्रदेश सरकार की ओर से पेश हुए सीनियर वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि यह मामला इसलिए लिस्ट किया गया है ताकि यह पता चल सके कि क्या पंजाब सरकार केंद्र के प्रस्ताव से सहमत है. केंद्र की ओर से पेश हुए अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी (AG) ने बेंच के सामने कहा, 'मुझे कहना होगा कि आज हम एक ही सुर में बात कर रहे हैं. पंजाब अब काफी करीब आ रहा है.'
अटॉर्नी जनरल ने कहा कि हम कुछ छोटी-मोटी दिक्कतों को दूर करना चाहते हैं. बेंच ने कहा, 'जब तक मामला सही दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब तक छोटी-मोटी बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता.' वकील ने इस बात पर सहमति जताई. अटॉर्नी जनरल ने बेंच से आग्रह किया कि मामले की सुनवाई अगले हफ्ते के लिए लिस्ट की जाए. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई के लिए 20 अगस्त की तारीख तय की है.
इससे पहले केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि बकाया भुगतान के लिए पार्टनर राज्यों के बीच एक नए कैशलेस फ़ॉर्मूले पर आपसी सहमति बन सकती है. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने नोट किया कि हिमाचल और हरियाणा की सरकारें केंद्र के प्रस्ताव पर सैद्धांतिक रूप से सहमत हो गई हैं, लेकिन पंजाब सरकार ने इस पर आपत्ति जताई है.
30 जुलाई को केंद्र ने बेंच को बताया था कि सरकार ने पूरी तरह से कैशलेस सेटलमेंट का सुझाव दिया है, क्योंकि अगर पार्टियां पंजाब पुनर्गठन अधिनियम, 1966 के अनुसार चलती हैं, तो कोई समझौता नहीं हो पाएगा.
पंजाब सरकार की ओर से पेश वकील ने कहा कि उन्हें बकाया राशि के भुगतान की दर पर आपत्ति है. वकील ने कहा कि बिजली की 2.5 रुपये प्रति यूनिट की दर बहुत ज़्यादा है और इसे उचित दर होना चाहिए, वरना राज्य को लगभग 2,000 करोड़ रुपये का नुकसान होगा.
बेंच ने कहा कि अगर पंजाब आपसी सहमति से समझौता करने को तैयार नहीं होता है, तो कोर्ट मामले के गुण-दोष के आधार पर विचार करेगा और आदेश जारी करेगा. हिमाचल प्रदेश सरकार ने कहा था कि राज्य 2011 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय की गई शर्तों के आधार पर बकाया राशि पाने का हकदार है.
पंजाब पुनर्गठन अधिनियम, 1966 के बाद कई दशकों तक संपत्तियों के बंटवारे को लेकर राज्यों के बीच विवाद नहीं सुलझ पाया. इसके बाद 1996 में हिमाचल ने सुप्रीम कोर्ट में एक मूल मुकदमा दायर किया. इसमें तर्क दिया गया कि एक उत्तराधिकारी राज्य होने के नाते बीबीएमबी प्रोजेक्ट्स में उसका 7.19 प्रतिशत हिस्सा बनता है.
जब केंद्र सरकार राज्यों के बीच इस विवाद को अदालत के बाहर नहीं सुलझा पाई, तो सितंबर 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने एक आदेश जारी किया. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार, हिमाचल का हिस्सा 7.19 प्रतिशत तय किया गया, जबकि पंजाब और हरियाणा का हिस्सा क्रमशः 51.80 प्रतिशत और 37.51 प्रतिशत तय किया गया.
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