हाई कोर्ट ने कर्मचारी की 1996 से क्लर्क पद पर पदोन्नति की याचिका खारिज की
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने एक कर्मचारी की 1996 से क्लर्क पद पर पदोन्नति की मांग वाली याचिका खारिज कर दी, क्योंकि याचिकाकर्ता ने करीब छह साल की देरी से इसे दायर किया। कोर्ट ने कहा कि देरी और लापरवाही स्वीकार्य नहीं है।

सौजन्य से:- Jagran
देरी से अदालत पहुंचने पर झटका, हाईकोर्ट ने कर्मचारी की 1996 से क्लर्क पद पर पदोन्नति की याचिका की खारिज
हाई कोर्ट ने एक कर्मचारी की 1996 से क्लर्क पद पर पदोन्नति की मांग वाली याचिका खारिज कर दी, क्योंकि याचिकाकर्ता ने करीब छह साल की देरी से इसे दायर किया ...और पढ़ें
HighLights
- हाई कोर्ट ने देरी से दायर पदोन्नति याचिका खारिज की।
- कर्मचारी विजय कुमार ने 1996 से पदोन्नति मांगी थी।
- कोर्ट ने कहा, देरी और लापरवाही स्वीकार्य नहीं।
राज्य ब्यूरो, चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने क्लर्क पद पर वर्ष 1996 से पदोन्नति और सभी परिणामी लाभ देने की मांग को लेकर करीब छह साल की देरी से दायर याचिका खारिज कर दी।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता को पदोन्नति वर्ष 2006 में ही मिल गई थी और उसने उस आदेश को चुनौती नहीं दी। इसके बाद 2013 में उसकी पदोन्नति वर्ष 1996 से करने की मांग भी खारिज कर दी गई, लेकिन उसने इसके खिलाफ कोई कानूनी उपाय नहीं अपनाया।
कोर्ट ने कहा कि असाधारण संवैधानिक अधिकार क्षेत्र का उपयोग करते समय देरी और लापरवाही को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जस्टिस सुदीप्ति शर्मा ने हाई कोर्ट के एक कर्मचारी विजय कुमार की ओर से दायर याचिका का निपटारा करते हुए यह आदेश सुनाया।
याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि तीन फरवरी 1996 को टाइपिंग टेस्ट पास करने की तारीख से उसे क्लर्क पद पर वरिष्ठता दी जाए और सभी परिणामी लाभ प्रदान किए जाएं। साथ ही 14 मार्च 2013 के उस आदेश को रद करने की मांग की गई थी, जिसके जरिये उसका प्रतिनिधित्व खारिज किया गया था।
विजय कुमार की नियुक्ति वर्ष 1981 में अवकाश रिक्ति के विरुद्ध तदर्थ आधार पर चपरासी के रूप में हुई थी। वर्ष 1989 में उसे रेस्टोरर पद पर पदोन्नत किया गया। इसके बाद एक मामले की फाइल गुम होने के संबंध में उसके खिलाफ एफआइआर दर्ज हुई और 18 अप्रैल 1995 को उसे निलंबित कर दिया गया।
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विभागीय जांच के दौरान, दिसंबर 1995 में हाई कोर्ट ने क्लर्क पद की आगामी रिक्तियों के लिए टाइपिंग टेस्ट में शामिल होने के इच्छुक योग्य सुपरवाइजरों और रेस्टोररों से आवेदन मांगे। विजय कुमार ने तीन फरवरी 1996 को टाइपिंग टेस्ट पास किया, लेकिन उसे स्पष्ट किया गया था कि जांच पूरी होने तक उसे पदोन्नति का अधिकार नहीं होगा।
जांच में आरोप साबित नहीं हुए और निलंबन अवधि को नियमित किया गया। 2006 में पदोन्नति समिति ने उसे क्लर्क बनाने की सिफारिश की, जिसे कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश ने मंजूरी दी।
हाई कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता ने 18 अगस्त 2006 की पदोन्नति के बाद वर्ष 1996 से पदोन्नति की मांग नहीं उठाई। उसने पहली बार आठ नवंबर 2012 को प्रतिनिधित्व दिया, जिसे 2013 में खारिज कर दिया गया। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता की ओर से हुई लंबी देरी के कारण उसे राहत देने का कोई आधार नहीं बनता।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि देरी और लापरवाही रिट अदालत के विवेकाधीन अधिकार क्षेत्र में राहत देने से इनकार करने का आधार हो सकती है। कोर्ट ने याचिका में कोई मेरिट नहीं पाते हुए इसे खारिज कर दिया।
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