UP शिक्षक भर्ती विवाद: 10 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट से अंतिम फैसला जल्द ही!
उत्तर प्रदेश में 69 हजार सहायक शिक्षकों की भर्ती को लेकर जारी अदालती विवाद को सुप्रीम कोर्ट स्थायी रूप से निपटाने के मूड में है. अदालत ने इस मामले को 3 दिनों में निपटाने का आदेश दिया है, जिसमें पक्षकार अपनी उपस्थिति और किसी भी तरह से सुनवाई ना टालने की गारंटी देंगे.

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दशकों से लंबित उत्तर प्रदेश में 69 हजार सहायक शिक्षकों की भर्ती को लेकर जारी अदालती विवाद को सुप्रीम कोर्ट स्थायी रूप से निपटाने के मूड में है. इस विवाद पर कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए आदेश दिया है कि इस मामले को अब और लंबा नहीं खींचा जा सकता. सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट निर्देश है कि इस बारे में दाखिल याचिकाओं पर 8 से दस सितंबर तक लगातार सुनवाई होगीं लिहाजा तीन दिन सभी पक्षकार अपनी उपस्थिति और किसी भी तरह से सुनवाई ना टालने की गारंटी दें.
जस्टिस एसवीएन भट्टी और जस्टिस एन वी अंजरिया की पीठ ने साफ शब्दों में कहा है कि अभ्यर्थियों का भविष्य पिछले कई सालों से अधर में लटका है और वे दुविधा की स्थिति में हैं, इसलिए इन तीन निर्धारित दिनों में पूरी बहस सुनकर मामले का अंतिम निपटारा किया जाएगा.कोर्ट ने साफ कर दिया है कि सुनवाई के लिए तय इन तीन दिनों में किसी भी पक्ष की तरफ से समय मांगने या टालने का कोई बहाना स्वीकार नहीं किया जाएगा.
67867 शिक्षकों में से किसी की भी सेवा खत्म नहीं होगी
अदालत ने पहले से नियुक्त नोडल अधिवक्ता को हटाकर, उत्तर प्रदेश राज्य सरकार का पक्ष रख रहे वकीलअंकित गोयल को नया नोडल अधिवक्ता नियुक्त किया है.यूपी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर स्पष्ट किया है कि वर्तमान में कार्यरत 67867 शिक्षकों में से किसी की भी सेवा खत्म नहीं होगी.
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सरकार ने कोर्ट को 8270 अभ्यर्थियों को सूची दी है. सरकार का प्रस्ताव है कि यदि इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेशानुसार नई कट-ऑफ और आरक्षण नियमों के तहत नए उम्मीदवार पात्र पाए जाते हैं, तो पुराने शिक्षकों को हटाने के बजाय इन नए लोगों को रिक्त पड़े पदों पर समायोजित किया जाए.इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने आरक्षण नियमों में गड़बड़ी पाते हुए मूल चयन सूची को रद्द कर दिया था और सरकार को 3 महीने के भीतर नई संशोधित मेरिट लिस्ट बनाने का निर्देश दिया था.
किस पर मंडरा रहा खतरा?
हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद पहले से नौकरी कर रहे सामान्य वर्ग के शिक्षकों पर बाहर होने का खतरा मंडराने लगा. इसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के इस आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी. थी. इस मामले की पेचीदगी और मानवीय पहलू को देखते हुए पूर्व की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 142 के तहत मिले पूर्ण न्याय करने के विशेषाधिकार के तहत दोनों पक्षों की आपसी सहमति से समाधान निकालने का भी सुझाव दिया था, ताकि बीच का रास्ता निकाला जा सके.
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