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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सरफेसी एक्ट की धारा 14 में कर्जदार को सुनवाई न देने का समर्थन किया, याचिका खारिज

कोर्ट ने कहा कि धारा 14 के तहत संपत्ति पर कब्जा लेने की प्रक्रिया में जिला मजिस्ट्रेट या मुख्य महानगर मजिस्ट्रेट को कर्जदार को सुनवाई का अवसर देना आवश्यक नहीं है; उन्हें केवल शपथपत्र की सत्यता जांचनी होती है। यह निर्णय आज़मगढ़ निवासी सच्चिदानंद यादव व अन्य की याचिका को खारिज करने के बाद आया, जबकि सुप्रीम कोर्ट के किरायेदार‑संबंधी फैसले को कर्जदार के मामले पर लागू नहीं माना गया।

29 अगस्त 2026 को 04:32 pm बजे
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सरफेसी एक्ट की धारा 14 में कर्जदार को सुनवाई न देने का समर्थन किया, याचिका खारिज

सौजन्य से:- Jagran

'सरफेसी एक्ट में कर्जदार को सुनवाई का अधिकार नहीं'; इलाहाबाद हाईकोर्ट ने खारिज की याचिका

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि सरफेसी एक्ट की धारा 14 के तहत बंधक संपत्ति पर कब्जा लेने ...और पढ़ें

HighLights

- सरफेसी एक्ट धारा 14 में कर्जदार को सुनवाई का अवसर नहीं।

- इलाहाबाद हाई कोर्ट ने याचिका खारिज कर महत्वपूर्ण टिप्पणी की।

- डीएम/सीएमएम को केवल शपथपत्र की सत्यता जांचनी होती है।

विधि संवाददाता, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि सरफेसी एक्ट की धारा 14 के तहत बंधक संपत्ति पर कब्जा लेने की कार्रवाई में जिलाधिकारी या सीएमएम को कर्जदार को सुनवाई का अवसर देना जरूरी नहीं है। न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया और न्यायमूर्ति विवेक सरन की खंडपीठ ने आजमगढ़ निवासी सच्चिदानंद यादव व अन्य की याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की है।

याचियों ने एडीएम द्वारा 28 फरवरी 2026 को आधार हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड के पक्ष में धारा 14 के तहत पारित आदेश को चुनौती दी थी। उनका तर्क था कि उन्हें सुनवाई का मौका दिए बिना आदेश किया गया, जो सुप्रीम कोर्ट के हर्षद गोवर्धन सोनदागर बनाम इंटरनेशनल एसेट्स मामले में दिए गए फैसले के विरुद्ध है।

वित्तीय कंपनी के वकील ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि धारा 14 में कर्जदार को नोटिस या सुनवाई का कोई प्रावधान नहीं है। उन्होंने बैंक आफ बड़ौदा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के फैसले का हवाला दिया। कोर्ट ने धारा 14 के अवलोकन के बाद कहा, इसमें स्पष्ट है कि सुरक्षित लेनदार के आवेदन पर डीएम या सीएमएम को 30 दिन में, अधिकतम 60 दिन में कब्जा दिलाने का आदेश करना है।

आवेदन के साथ अधिकृत अधिकारी का शपथपत्र होना चाहिए, जिसमें कर्ज की राशि, डिफॉल्ट, एनपीए, 60 दिन का नोटिस और आपत्ति पर विचार करने का उल्लेख हो। डीएम को केवल शपथपत्र की सत्यता देखनी है। खंडपीठ ने कहा कि हर्षद गोवर्धन सोनदागर का मामला किरायेदार के संबंध में था, कर्जदार के संबंध में नहीं। याची स्वयं कर्जदार है, किरायेदार नहीं, इसलिए वह फैसला लागू नहीं होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने बालकृष्ण मामले में स्पष्ट किया है कि डीएम को केवल क्लास 1 या 2 के पट्टेदार होने का दावा करने वाले कब्जेदार को ही सुनवाई का अवसर देना है, कर्जदार को नहीं।

सरफेसी एक्ट 2002 की धारा 14 बैंकों और वित्तीय संस्थाओं को कर्ज न चुकाने वाले डिफॉल्टरों की गिरवी रखी गई संपत्ति पर भौतिक कब्जा लेने के लिए जिला मजिस्ट्रेट या मुख्य महानगर मजिस्ट्रेट से प्रशासनिक सहायता प्राप्त करने का अधिकार देती है।

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