होममुकदमेसुप्रीम कोर्ट का माकूल निर्देश, भारत में हर साल 1.77 लाख लोग टूटते हुए पुलों के बीच मरते हैं
मुकदमे

सुप्रीम कोर्ट का माकूल निर्देश, भारत में हर साल 1.77 लाख लोग टूटते हुए पुलों के बीच मरते हैं

देश में हर साल सड़क हादसे में करीब 1.77 लाख लोगों की मौत होती है, जिसके पीछे बड़ी वजह है ट्रॉमा केयर व्यवस्था की कमी। सुप्रीम कोर्ट ने सड़क दुर्घटना में जान बचाने के लिए महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं, लेकिन अब तक किसी राज्य ने इन्हें पूरी तरह से लागू नहीं किया है।

26 जून 2026 को 08:24 am बजे
सुप्रीम कोर्ट का माकूल निर्देश, भारत में हर साल 1.77 लाख लोग टूटते हुए पुलों के बीच मरते हैं

सौजन्य से:- Jansatta

देश में हर साल सड़क हादसे में करीब 1.77 लाख लोगों की मौत होती है,जो एक चौंकाने वाली कहानी बयां करता है। इसके पीछे बड़ी वजह यह है कि हादसों में घायलों की जान बचाने के लिए पूरी ट्रॉमा केयर व्यवस्था की मांग सुप्रीम कोर्ट ने की थी, लेकिन अब तक किसी राज्य में यह पूरी तरह तैयार नहीं है। पिछले 9 महीनों में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने सुप्रीम कोर्ट को जो आंकड़े प्रस्तुत किए हैं। उनसे यह स्थिति सामने आई है।

शीर्ष अदालत ने सड़क दुर्घटनाओं में जान बचाने के लिए राज्यों को नौ महत्वपूर्ण कदम उठाने के लिए कहा था। इनमें से पांच सबसे जरूरी उपाय हैं- एक समान आपातकालीन फोन नंबर, जीपीएस से लैस एंबुलेंस, गुड समैरिटन कानून, ट्रॉमा रजिस्ट्री और बचाव कार्य के लिए तय प्रोटोकॉल। ये पांच उपाय दुर्घटना के बाद के ‘गोल्डन ऑवर’ यानी पहले 60 मिनट के दौरान लोगों की जान बचाने में बहुत अहम मानी जानी जाती हैं।

26 मई को सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में यह निर्देश दिया था। यह आदेश सड़क सुरक्षा के लिए काम करने वाली दिल्ली स्थित संस्था SaveLIFE Foundation की याचिका पर दिया गया था। संस्था ने सभी राज्यों में एक समान ट्रॉमा केयर सिस्टम लागू करने की मांग की थी।

अदालत में प्रस्तुत किए गए करीब 1200 पन्नों के दस्तावेजों से पता चलता है कि देश में सड़क हादसों में होने वाली हर तीन में से दो मौते जिन आठ राज्यों में होती हैं। वह राज्य हैं- उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु,महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, राजस्थान, बिहार और आंध्र प्रदेश शामिल हैं। उनमें से 7 राज्यों ने अभी तक अपने सभी इमरजेंसी नंबरों को एकीकृत कर 112 से नहीं जोड़ा है। वहीं, कर्नाटक ने इस संबंध में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं कराई है।

साल 2019 में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 112 नंबर को राष्ट्रव्यापी आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणाली (Nationwide Emergency Response System) के रूप में शुरू किया था। जिससे पुलिस, अग्निशमन, मेडिकल, एंबुलेंस, राजमार्ग, महिला आदि सभी इमरजेंसी नंबर शामिल थे। विभिन्न आपात स्थितियों के लिए इतने सारे नंबर होनी की वजह से राष्ट्रव्यापी आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणाली की कल्पना इसलिए की गई थी, ताकि यह भ्रम दूर हो सके कि किस नंबर पर कॉल करना है।

सड़क पर मदद करने से लोगों को रोकने वाला एक और महत्वपूर्ण पहलू पुलिस या अस्पताल द्वारा पूछताछ और उत्पीड़न का डर है, लेकिन 2024 में हुई 1.77 लाख मौतों में से दो-तिहाई मौतें आठ राज्यों में हुईं। जिनमें से केवल दो राज्यों -महाराष्ट्र और कर्नाटक में ही जरूरतमंदों के लिए शिकायत निवारण प्रणाली (Grievance Redressal System) है। चार राज्यों में यह प्रणाली नहीं है, और दो राज्यों ने सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत जानकारी में जरूरी जानकारी नहीं दी है।

30 मार्च, 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश पारित किया था। जिसमें गुड समैरिटन (Good Samaritan) यानी सड़क हादसों में घायलों की मदद करने वाले लोगों या राह-वीरों के अधिकारों को मान्यता दी थी। इसके बाद, सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने वर्ष 2020 में मोटर वाहन (संशोधन) अधिनियम, 2019 की धारा 134A के तहत गुड समैरिटन नियम अधिसूचित किए, ताकि दुर्घटना पीड़ितों की मदद करने वालों को कानूनी सुरक्षा मिल सके।

इस योजना के तहत, जो भी व्यक्ति सड़क दुर्घटना में घायल व्यक्ति को गोल्डन ऑवर (हादसे के बाद के 60 मिनट) के भीतर चिकित्सा सहायता दिलाने में मदद करता है, उसे 25,000 रुपये का पुरस्कार देने का प्रावधान है।

हालांकि, शीर्ष अदालत के आदेश के 10 साल बाद भी राज्य सड़क पर जान गंवाने वाले लोगों की बचाने के लिए आवश्यक आपातकालीन सहायता सुविधाओं के निर्माण में ढिलाई बरत रहे हैं। यह महत्वपूर्ण है क्योंकि 2021 की नीति आयोग-एम्स आपातकालीन एवं चोट देखभाल रिपोर्ट के अनुसार, देश में दुर्घटनाओं से होने वाली सभी मौतों में से कम से कम 30% आपातकालीन देखभाल में देरी के कारण होती हैं।

दस्तावेजों से यह भी पता चलता है कि जिन राज्यों में मृत्यु दर ज्यादा है, वे ट्रॉमा रजिस्ट्री बनाने में भी पिछड़े हुए हैं, और कई राज्य अभी भी मैन्युअल डेटाबेस के आधार पर काम कर रहे हैं। ट्रॉमा रजिस्ट्री एक क्लीनिकल डेटाबेस है जो किसी मरीज की चोट लगने के स्थान से लेकर एम्बुलेंस, अस्पताल में इलाज और डिस्चार्ज तक की पूरी प्रक्रिया को रिकॉर्ड करता है।

चिकित्सा देखभाल का ऑडिट करने, परिणामों की निगरानी करने और नीतिगत निर्णय लेने के लिए यह एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है, लेकिन इन आठ राज्यों में से पांच राज्यों में ट्रॉमा रजिस्ट्री नहीं है। तमिलनाडु, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश राज्यों ने कहा है कि उनके पास ट्रॉमा रजिस्ट्री प्रणाली है। तमिलनाडु की ट्रॉमा केयर रजिस्ट्री में अस्पताल पहुंचने से पहले की एम्बुलेंस की जानकारी, अस्पताल में भर्ती होने के दौरान के मामलों की जानकारी और मरीज के पुनर्जीवन के परिणामों की जानकारी वास्तविक समय के आधार पर दर्ज की जाती है।

इन आठ राज्यों में से सात राज्यों ने दुर्घटनास्थल से पीड़ितों को बचाने के लिए प्रोटोकॉल स्थापित करने के मानदंडों को पूरा किया है। हालांकि, कर्नाटक में सड़क दुर्घटना पीड़ितों को दुर्घटनास्थल से अस्पताल तक चिकित्सा और गैर-चिकित्सा बचाव और रिफर के लिए कोई बचाव प्रोटोकॉल नहीं है।

कुल मिलाकर, सभी 34 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में से केवल आठ में ही जरूरतमंदों के लिए शिकायत निवारण प्रणाली (Grievance System) है, जबकि 17 में सड़क दुर्घटना पीड़ितों के लिए बचाव प्रोटोकॉल है। 22 राज्यों में ट्रॉमा रजिस्ट्री नहीं है और 13 राज्यों में या तो जीपीएस नहीं है या कुछ ही एम्बुलेंस में जीपीएस है, वो भी केवल सरकारी एम्बुलेंस में।

अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमानी द्वारा 2 सितंबर, 2025 को जारी एक पत्र के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों से यह जानकारी प्रस्तुत करने को कहा कि क्या सभी पंजीकृत एम्बुलेंस, जिनमें निजी एम्बुलेंस भी शामिल हैं, जीपीएस से लैश हैं। हालांकि, उच्च मृत्यु दर वाले आठ राज्यों ने “हां” में उत्तर दिया, लेकिन प्रदान किए गए आंकड़ों में निजी एम्बुलेंस शामिल नहीं हैं, जिससे यह जानकारी अधूरी रह जाती है।

इन एम्बुलेंस को ट्रैक करने वाले डैशबोर्ड को सार्वजनिक किए जाने के सवाल पर छह राज्यों ने कहा कि उनके पास डैशबोर्ड तो है, लेकिन इसे सार्वजनिक नहीं किया गया है। ऐसे में सड़क दुर्घटना पीड़ित के परिवार के लिए यह सत्यापित करना मुश्किल हो जाता है कि निकटतम एम्बुलेंस वास्तव में भेजी गई थी या नहीं। उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु ने कहा कि उन्होंने एम्बुलेंस ट्रैकिंग डैशबोर्ड को जनता के लिए उपलब्ध करा दिया है।

इसके अलावा, आठ राज्यों में से सात राज्यों ने एम्बुलेंस की आवाजाही को 112 आपातकालीन प्रतिक्रिया सहायता प्रणाली (NERS) से जोड़कर रियल-टाइम निगरानी की व्यवस्था नहीं की है। इसकी वजह से यह सही तरीके से पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि एम्बुलेंस को दुर्घटना पीड़ित को अस्पताल पहुंचाने में कितना समय लगा।

राज्यों ने क्या कहा?

उत्तर प्रदेश की सड़कें सबसे असुरक्षित हैं और सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों के मामले में भी सबसे आगे हैं। 2024 में कुल मौतों में से 24,118 मौतें (13.61%) उत्तर प्रदेश में दर्ज की गईं। औसतन हर दूसरी दुर्घटना में एक मौत हुई।

राज्य सरकार ने कहा कि उसने ज्यादार इमरजेंसी नंबरों को 112 के साथ जोड़ दिया गया है। केवल 102 आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं को जोड़ना बाकी है। यह कार्य 2018 से 2025 के बीच किया गया। इसके अलावा, इसमें जरूरतमंद लोगों के लिए कोई अलग शिकायत निवारण प्रणाली (Grievance Redressal System) भी नहीं है।

यूपी सरकार ने 19 फरवरी को दिए अपने हालिया जवाब में कहा कि स्वास्थ्य केंद्रों में सभी स्वास्थ्य सेवाओं के संबंध में शिकायत/सुझाव पेटी के रूप में एक सामान्य शिकायत निवारण प्रणाली मौजूद है। शिकायत का निवारण अनिवार्य रूप से 24 घंटे के भीतर किया जाता है। शिकायत निवारण के लिए नोडल प्राधिकारी संबंधित केंद्र के प्रभारी/अधीक्षक होते हैं।

राज्य में सड़क दुर्घटना पीड़ितों के चिकित्सा बचाव के लिए मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) मौजूद है। हालांकि, अभी तक राज्यव्यापी केंद्रीकृत ट्रॉमा केयर रजिस्ट्री स्थापित नहीं की गई है। उत्तर प्रदेश ने सुप्रीम कोर्ट को लिखे पत्र में कहा कि प्रमुख सरकारी मेडिकल कॉलेजों, ट्रॉमा केंद्रों और जिला अस्पतालों में अस्पताल सूचना प्रणाली/मैनुअल रिकॉर्ड के माध्यम से ट्रॉमा से संबंधित मरीजों का डेटा एकत्र किया जा रहा है। राज्य अभी भी मानकीकृत आघात डेटा ढांचा (Standardised Trauma Data Framework) और केंद्रीकृत रिपोर्टिंग तंत्र विकसित करने की व्यवहार्यता की जांच कर रहा है।

तमिलनाडु सड़क दुर्घटनाओं की कुल संख्या में पहले स्थान पर और मौतों की संख्या में दूसरे स्थान पर है। इसने विभिन्न आपातकालीन नंबरों को केवल आंशिक रूप से ही एकीकृत किया है।

25 सितंबर, 2025 के अपने पत्र में राज्य ने घायल पीड़ितों के बचाव के लिए अपने व्यापक प्रोटोकॉल पर प्रकाश डाला, जिसमें घटनास्थल पर सुरक्षा उपायों जैसे कि परावर्तक जैकेट (Reflective Jackets) का उपयोग, चेतावनी त्रिकोण शंकु (Warning Triangle Cones), ब्लिंकर, एम्बुलेंस की खतरे की बत्तियां चालू करना, घटनास्थल पर गंभीर/कनाडाई ट्राइएज एक्यूटी स्केल (CTAS) पर आधारित ट्राइएज प्रोटोकॉल, चिकित्सा सुविधाओं के लिए पूर्व-आगमन अधिसूचना प्रणाली, और मोबाइल एप्लिकेशन के माध्यम से आपातकालीन चिकित्सा सहायक द्वारा प्राप्त अस्पताल को पूर्व-आगमन सूचना देना शामिल है।

महाराष्ट्र ने कहा कि उसकी आपातकालीन चिकित्सा सेवा (MEMS 108) या केवल एम्बुलेंस में जीपीएस सिस्टम लगा है।

मध्य प्रदेश ने कहा कि गुड समैरिटन (राहगीरों द्वारा मदद करने वालों) के लिए शिकायत निवारण प्रणाली बनाने की प्रक्रिया चल रही है। राज्य ने हाल ही में एक व्यापक ट्रॉमा केयर नीति तैयार की है, जिसमें दुर्घटना पीड़ितों के बचाव के लिए पुलिस, स्वास्थ्य विभाग, रोड पेट्रोल और सड़क निर्माण एजेंसी जैसी विभिन्न संस्थाओं की जिम्मेदारियां तय की गई हैं।

कर्नाटक ने कहा कि उसके पास ट्रॉमा केयर रजिस्ट्री नहीं है। वह केंद्र की नीति के आधार पर ऐसा करेगा। राज्य ने कहा कि केवल 108 आरोग्य कवच योजना के तहत संचालित एम्बुलेंस की ही निगरानी केंद्रीय डैशबोर्ड के माध्यम से की जाती है।

राजस्थान ने कहा कि ट्रॉमा केयर रजिस्ट्री के लिए मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) पर काम चल रहा है।

गुड समैरिटन शिकायत प्रणाली के संबंध में बिहार ने कहा कि उसके पास भी इसी तरह की प्रणाली है जो चिकित्सा सहायता से संबंधित शिकायतों का समाधान करती है। ट्रॉमा केयर रजिस्ट्री के बारे में बिहार ने कहा कि ट्रॉमा केयर का पंजीकरण अलग से नहीं किया जाता है। हालांकि, दुर्घटना एवं आपातकालीन विभाग में ट्रॉमा एक डेटा तत्व है।

आंध्र प्रदेश ने बताया कि उसने साल 2005 में ही 108 एम्बुलेंस सेवा को NERS के रूप में शुरू कर दिया था। यह 112 आपातलकालीन नंबर शुरू होने से काफी पहले की बात है।

राहुल गांधी ने शिवराज के बेटे कार्तिकेय को लेकर कोर्ट में क्यों जताया खेद? जानिए पूरा मामला

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में एक आवेदन दायर किया। इस आवेदन में राहुल गांधी ने केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान के बेटे कार्तिकेय सिंह के बारे में कथित रूप से अपमानजनक बयान देने के लिए खेद व्यक्त किया। पढ़ें पूरी खबर।

Powered by Nyaya 247 News

संबंधित ख़बरें

इसी विषय की और ख़बरें →
हाईकोर्ट की बड़ी रोक- प्रधानों को प्रशासक बनाने का सरकार का आदेश असंवैधानिक!
मुकदमे

हाईकोर्ट की बड़ी रोक- प्रधानों को प्रशासक बनाने का सरकार का आदेश असंवैधानिक!

अपने नाम पत्र पर 70 साल पुराना भूमि विवाद सुलझाने का मामला
मुकदमे

अपने नाम पत्र पर 70 साल पुराना भूमि विवाद सुलझाने का मामला

सुप्रीम कोर्ट ने सुलझाया 70 साल पुराना जमीन का विवाद, चौथी पीढ़ी में मिला न्याय
मुकदमे

सुप्रीम कोर्ट ने सुलझाया 70 साल पुराना जमीन का विवाद, चौथी पीढ़ी में मिला न्याय

सुप्रीम कोर्ट ने सुलझाया 70 साल पुराना जमीन विवाद, जज न बने तब भी नहीं मिला था न्याय
मुकदमे

सुप्रीम कोर्ट ने सुलझाया 70 साल पुराना जमीन विवाद, जज न बने तब भी नहीं मिला था न्याय

हाईकोर्ट ने सरकार से पूछा, दरगाह को ध्वस्त करने की क्या जरूरत?
मुकदमे

हाईकोर्ट ने सरकार से पूछा, दरगाह को ध्वस्त करने की क्या जरूरत?

बॉम्बे हाई कॉर्ट ने महाराष्ट्र में वाधवन बंदरगाह परियोजना के लिए मैंग्रोव पेडों को काटने की मंजूरी दे दी
मुकदमे

बॉम्बे हाई कॉर्ट ने महाराष्ट्र में वाधवन बंदरगाह परियोजना के लिए मैंग्रोव पेडों को काटने की मंजूरी दे दी

बॉम्बे हाई कोर्ट ने वाधवन बंदरगाह परियोजना के लिए मैंग्रोव की कटाई की मंजूरी दी
मुकदमे

बॉम्बे हाई कोर्ट ने वाधवन बंदरगाह परियोजना के लिए मैंग्रोव की कटाई की मंजूरी दी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, जिले से बाहर निकालने के आदेश के खिलाफ़ देरी को माफ़ करने का हक़ है
मुकदमे

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, जिले से बाहर निकालने के आदेश के खिलाफ़ देरी को माफ़ करने का हक़ है

ताज़ा ख़बरें