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सुप्रीम कोर्ट ने सुलझाया 70 साल पुराना जमीन का विवाद, चौथी पीढ़ी में मिला न्याय

सुप्रीम कोर्ट ने हरिद्वार के नरसीपुर कलां गांव से जुड़े एक 70 साल पुराने जमीन के विवाद को सुलझा दिया है, जिसमें एक परिवार की चार पीढ़ियां उलझी हुई थीं। कोर्ट ने कहा है कि अपील करने वाले ही जमीन के असली मालिक थे।

26 जून 2026 को 06:25 am बजे
सुप्रीम कोर्ट ने सुलझाया 70 साल पुराना जमीन का विवाद, चौथी पीढ़ी में मिला न्याय

सौजन्य से:- Navbharat Times

नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने 70 साल पुराना एक मामला आखिरकार सुलझा दिया है। पिछले सभी प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल के दौरान चलते रहने वाले जमीन के अनोखे विवाद को आखिरकार सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने सुलझा दिया। दिलचस्प बात यह है कि जब 1957 के सेल डीड से जुड़ा यह मामला शुरू हुआ था, तब इन दोनों जजों का जन्म भी नहीं हुआ था।

15.5 बीघा जमीन से जुड़ा मामला 1957 का

यह 70 साल पुराना विवाद हरिद्वार के नरसीपुर कलां गांव में 15.5 बीघा जमीन को लेकर था, जिसे अपीलकर्ता सराफत अली के पूर्वजों ने 4 जून, 1957 के सेल डीड के जरिए खरीदा था। सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट के एक जैसे फैसलों को रद्द कर दिया और सेल डीड को सही माना।

शुरुआत में म्यूटेशन यानी नाम चढ़ाने की कार्यवाही के तौर पर शुरू हुआ यह मामला धीरे-धीरे यूपी जमींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार अधिनियम, 1950 और चकबंदी के दायरे में आ गया। हालांकि, कई मंचों से गुजरने के बाद भी इसका नतीजा कुछ नहीं निकला, क्योंकि निचली अदालतों और अधिकारियों ने एकमत से माना कि अपीलकर्ता उस सेल डीड के निष्पादन को साबित करने में नाकाम रहे, जिसके कारण उन्हें इस अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा।

जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा, सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट आकर चौथी पीढ़ी में मिला न्याय

जिस समय यह डील हुई थी, उस समय सराफत अली के पूर्वज नाबालिग थे, जिसका मतलब था कि इसे उनके पिता ने खरीदा था। केस के लंबे सफर के दौरान सराफत अली का भी निधन हो गया और उनके कानूनी उत्तराधिकारी ने सुप्रीम कोर्ट तक यह केस लड़ा। इस तरह, एक परिवार की चार पीढ़ियां इस कानूनी लड़ाई में उलझी रहीं।

जमीन का यह मुकदमा कैसे शुरू हुआ जो 70 साल चला

खरीददार के नाम पर जमीन के म्यूटेशन के समय, बेचने वाले ने शुरू में आपत्ति जताई थी, लेकिन बाद में उसने अपनी आपत्ति वापस ले ली ताकि राजस्व अधिकारी अपील करने वालों के पक्ष में जमीन का म्यूटेशन कर सकें। जब गांव में जमीन के चकबंदी की प्रक्रिया शुरू हुई, तो अपील करने वालों ने पाया कि खरीदी गई जमीन के मालिक के तौर पर उनका नाम गायब था और वह अभी भी बेचने वाले के नाम पर ही दर्ज थी। चकबंदी अधिकारी ने म्यूटेशन रिकॉर्ड के आधार पर अपील करने वालों के नाम जमीन के मालिक के तौर पर दर्ज कर दिए।

चकबंदी में कैसे उलझ गया ये मामला?

बाद में इस मामले को चुनौती दी गई। चकबंदी अधिकारी ने मामले की फिर से जांच का आदेश दिया। हालांकि, जमीन बेचने वालों ने फिर अपना रुख बदला और दोनों पक्षों के बीच हुए समझौते के आधार पर अपनी आपत्तियां वापस ले लीं। लेकिन चूंकि समझौते पर सभी पक्षों ने साइन नहीं किए थे, इसलिए कुछ साल बाद कुछ अन्य लोगों ने राजस्व रिकॉर्ड में अपील करने वालों को जमीन का मालिक दर्ज किए जाने को चुनौती दी।

निचली अदालत से शुरू होकर मुकदमा सुप्रीम कोर्ट पहुंचा

राजस्व विभाग में अपील करने वालों के लिए उतार-चढ़ाव का दौर तब तक जारी रहा जब तक उन्होंने ट्रायल कोर्ट में केस दायर नहीं किया। कोर्ट ने फैसला सुनाया कि सेल डीड अमान्य थी क्योंकि इसे जमीन की सीलिंग से जुड़े कानून से बचने के लिए किया गया था। 2017 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपील करने वालों की अपील खारिज कर दी।

अपील करने वाले ही जमीन के असली मालिकः जज

हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर, जस्टिस मिश्रा और जस्टिस अंजारिया की सुप्रीम कोर्ट बेंच ने कहा, 'रजिस्टर्ड सेल डीड, उससे जुड़ी कानूनी मान्यता, धोखाधड़ी या जालसाजी का कोई ठोस आरोप न होना, और गवाह के बयान में कोई अहम विरोधाभास न ढूंढ पाना - इन सभी बातों को मिलाकर देखें तो चकबंदी अधिकारियों के निष्कर्ष और हाई कोर्ट द्वारा उनकी पुष्टि, कानून की नजर में टिक नहीं पाते हैं।' कोर्ट ने माना कि अपील करने वाले ही जमीन के असली मालिक थे।

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