सुप्रीम कोर्ट ने UP गैंगस्टर एक्ट में गिनाईं कमियां, कहा- इसका गलत इस्तेमाल हो सकता है
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा, यह कहा कि इस कानून में निर्दोष लोगों के खिलाफ बदले की भावना या दुर्भावनापूर्ण कार्रवाई रोकने के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपाय नहीं हैं। कोर्ट न…

सौजन्य से:- Navbharat Times
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा, यह कहा कि इस कानून में निर्दोष लोगों के खिलाफ बदले की भावना या दुर्भावनापूर्ण कार्रवाई रोकने के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपाय नहीं हैं। कोर्ट ने कहा कि आपराधिक गिरोहों पर लगाम जरूरी है, लेकिन इसके लिए नागरिकों की स्वतंत्रता से समझौता नहीं किया जा सकता।
'यह एक्ट कोई अपराध तय नहीं करता'
पीठ ने कहा, यह स्पेशल एक्ट कोई अपराध तय नहीं करता, जो किसी भी दंड कानून के लिए जरूरी होता है। बेंच ने कहा, 'सिर्फ 'गैंग' और 'गैंगस्टर' की परिभाषा बताने वाले हिस्से को छोड़ दें, तो गैंग की सदस्यता लेने या गैंग के साथ मिलकर (अकेले या साथ में) काम करने को कोई अपराध नहीं माना गया है।''गैंग चार्ट के आधार पर ट्रायल और सजा का प्रावधान'
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह यूपी एक्ट न सिर्फ गैंग चार्ट में शामिल होने के आधार पर किसी को हिरासत में रखने की इजाजत देता है, बल्कि उसी उसी गैंग चार्ट के आधार पर ट्रायल और सजा का प्रावधान भी करता है। बेंच ने आगे कहा, यह सब तब होता है, जब एक्ट के तहत कोई अपराध भी नहीं बनता। अदालत ने इसकी तुलना अंग्रेजी कहावत से करते हुए कहा, 'किसी कुत्ते को बदनाम कर दो और फिर उसे फांसी पर चढ़ा दो।'पीठ ने कहा कि कानून के तहत महज एक आरोप से गैंग चार्ट तैयार हो सकता है, गिरफ्तारी हो सकती है और आरोपी को लंबे समय तक रिमांड पर रखा जा सकता है। अदालत ने चिंता जताई कि ऐसे में निर्दोष, ईमानदार, सदाचारी या व्हिसलब्लोअर व्यक्ति के खिलाफ भी दुर्भावनापूर्ण कार्रवाई की कोई प्रभावी सुरक्षा नहीं है।
'मकसद सही होने से गलत तरीके सही नहीं हो जाते'
अदालत ने कहा, यूपी का यह कानून न्यायिक अंतरात्मा को संतुष्ट नहीं करता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आपराधिक गिरोहों के खतरे को रोकना जरूरी है, लेकिन मकसद सही होने से गलत तरीके सही नहीं हो जाते हैं, खासकर तब, जब कोई ऐसा दंडात्मक कानून बनाया जा रहा हो जो नागरिकों की आजादी में दखल देता हो।पीठ ने विशेष रूप से दो मुद्दों को रेखांकित किया। पहला, किसी अपराध का जिक्र न होना, जो कि सजा वाले कानून में जरूरी होता है। दूसरा यमों के तहत 'गैंग चार्ट' बनाकर, किसी व्यक्ति की स्थिति (स्टेटस) के आधार पर सजा देना, वह भी प्रशासनिक अधिकारियों और पुलिसकर्मियों की मनमर्जी से। जबकि कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है।
बेंच ने कहा, 'हम सम्मान के साथ यह कहना चाहेंगे कि सबसे समझदार लोगों में भी यह प्रवृत्ति होती है कि वे किसी ऐसे सवाल को, जिसका उन्हें कोई जवाब नहीं मिलता या जिसका जवाब मुश्किल या नापसंद होता है बेवकूफी भरा मान लेते हैं और सवाल उठाने वाले को बेवकूफ समझते हैं।'
राज्य सरकार से पूछे गए सवाल
बेंच ने कहा, 'इसलिए, हमने ऊपर उठाए गए दो सवालों का जवाब खोजने के लिए राज्य की ओर से पेश हुए वकील से ये सवाल पूछे। हमने ऐसा यह जोखिम उठाते हुए किया कि हमें नासमझ कहा जा सकता है, लेकिन हमें बस इस बात से तसल्ली है कि यही सवाल उस समय इलाहाबाद हाईकोर्ट की फुल बेंच के सामने भी उठाए गए थे, और वे सवाल समझदार लोगों और जाने-माने वकीलों ने उठाए थे।'सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्य की ओर से पेश वकील न तो बहस के दौरान कोई जवाब दे पाए और न ही कोर्ट में जमा किए गए लिखित बयानों में ऐसा करने की कोशिश की।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि कानून के प्रावधान आरोपी को बिना मुकदमे के लंबे समय तक हिरासत में रखने की स्थिति पैदा कर सकते हैं, जो निवारक हिरासत जैसी व्यवस्था के समान है। अदालत ने सवाल उठाया कि ऐसी स्थिति में मनमानी कार्रवाई से बचाने के लिए पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था कहां है।
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