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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: बंद कमरे में जातिसूचक गाली देने पर SC/ST कानून लागू नहीं, जानिए ‘Public View’ की कानूनी शर्त

मामले में शीर्ष अदालत ने कहा कि इन धाराओं के तहत अपराध के लिए कथित जातिसूचक अपमान या गाली ऐसी जगह जो सार्वजनिक निगाहों में हो (any place within public view), में होना जरूरी है। स्कूल के एक बंद कमरे में हुई कथित घटना के म…

23 अगस्त 2026 को 12:54 am बजे
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: बंद कमरे में जातिसूचक गाली देने पर SC/ST कानून लागू नहीं, जानिए ‘Public View’ की कानूनी शर्त

सौजन्य से:- Navbharat Times

मामले में शीर्ष अदालत ने कहा कि इन धाराओं के तहत अपराध के लिए कथित जातिसूचक अपमान या गाली ऐसी जगह जो सार्वजनिक निगाहों में हो (any place within public view), में होना जरूरी है। स्कूल के एक बंद कमरे में हुई कथित घटना के मामले में रिकॉर्ड से यह साबित नहीं हुआ कि कोई अन्य व्यक्ति उस कथित गाली को देख या सुन रहा था। हालांकि, अन्य सामान्य आपराधिक धाराओं से संबंधित कार्यवाही जारी रहेगी।

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स्कूली छात्रों से शुरु हुआ, क्या था यह जाति सूचक विवाद ?

मामला उत्तर प्रदेश के एक स्कूल से जुड़ा था। आरोपी स्कूल का मैनेजर था। दो छात्रों के बीच विवाद के बाद छात्रों के पिता स्कूल मैनेजर के पास पहुंचे। आरोप था कि विवाद के दौरान उनके साथ मारपीट की गई और जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया गया। इस आधार पर SC/ST Act की धाराओं के साथ अन्य आपराधिक धाराओं में FIR दर्ज हुई और बाद में चार्जशीट दाखिल की गई और स्पेशल जज ने मामले का संज्ञान लियासुप्रीम कोर्ट में मामला कैसे पहुंचा?

स्पेशल जज द्वारा संज्ञान लिए जाने के बाद आरोपी ने समन आदेश को इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती दी। हाई कोर्ट ने आरोपी को राहत देने से इनकार कर दिया और कहा था कि केवल प्रतिक्रिया होने की सफाई ऐसे आरोप की कार्यवाही रद्द करने के लिए पर्याप्त नहीं है और रिकॉर्ड पर प्रथम दृष्टया मामला बनता है। इसके बाद आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।सुप्रीम सुनवाई , तथ्यों पर ध्यान और अंतिम फैसला

- सुप्रीम कोर्ट में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील इस मामले की सुनवाई जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने की

- सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य रूप से धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) का सवाल था। धारा 3(1)(r) में SC/ST समुदाय के सदस्य को जानबूझकर अपमानित या डराने और उसे अपमानित करने के इरादे की बात है, जबकि धारा 3(1)(s) में जाति के नाम से गाली देने को अपराध बनाया गया है।

- अदालत ने कहा कि दोनों प्रावधानों में घटना का 'any place within public view' ऐसी जगह जो सार्वजनिक निगाहों में हो , होना महत्वपूर्ण तत्व है। फिर कोर्ट ने यह बताया कि कि Public view को केवल Public place के अर्थ में नहीं समझा जा सकता। किसी निजी स्थान पर हुई घटना भी कुछ परिस्थितियों में सार्वजनिक नजरों में हो सकती है, यदि वहां आम लोगों की मौजूदगी हो या वे घटना को देख/सुन सकते हों। लेकिन यदि घटना पूरी तरह बंद स्थान में हुई और आम जनता वहां मौजूद नहीं थी, तो महज उस स्थान का स्कूल, कार्यालय या अन्य सार्वजनिक परिसर का हिस्सा होना पर्याप्त नहीं है।

- मामले में चूंकि शिक्षकों ने घटना को लेकर विवाद और मारपीट का उल्लेख किया था, लेकिन किसी ने यह नहीं कहा कि वे कथित जातिसूचक गालियां सुनने के समय वहां मौजूद थे या उन्होंने उन्हें सुना था। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सिर्फ स्कूल परिसर में शिक्षकों की मौजूदगी से यह साबित नहीं होता कि कथित टिप्पणी Public view में की गई थी।

- फिर पीठ ने करुप्पुदयार बनाम राज्य और हितेश वर्मा बनाम उत्तराखंड राज्य जैसे फैसलों में स्थापित सिद्धांत को दोहराया। जनवरी 2025 के करुप्पुदयार फैसले में भी सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यदि कथित जातिसूचक अपमान किसी चैंबर के चारों तरफ बंद स्थान में हुआ और सार्वजनिक लोग उस समय वहां मौजूद नहीं थे, तो सार्वजनिक नजरों का बीच की शर्त पूरी नहीं होती।

- आखिर में सुप्रीम कोर्ट ने तथ्यों में पाया कि FIR और संबंधित बयानों में न तो कथित जातिसूचक टिप्पणी को आरोपी से स्पष्ट रूप से जोड़ा गया था और न ही यह दिखाया गया था कि टिप्पणी सार्वजनिक लोगों की मौजूदगी या सुनने की स्थिति में की गई। इसलिए SC/ST Act के तहत प्रथम दृष्टया आवश्यक तत्व सामने नहीं आते थे। कोर्ट ने हाई कोर्ट का आदेश हटाते हुए SC/ST Act के तहत कार्यवाही रद्द कर दी।

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