सुप्रीम कोर्ट के सप्ताहिक प्रमुख आदेश: मेडिकल ग्रेजुएट स्टाइपेंड, प्रोविज़नल लॉ‑एडवोकेट एनरोलमेंट और प्रमोशन नियमों की नई दिशा
पिछले सप्ताह कोर्ट ने नेशनल मेडिकल कमीशन को निर्देश दिया कि विदेशी एवं भारतीय मेडिकल ग्रेजुएटों को समान स्टाइपेंड मिलना चाहिए और कुछ राज्यों में उसका भुगतान जांचा जाए। साथ ही, रद्द किए गए नियमों के तहत प्रमोशन का अधिकार नहीं रहने, डिस्टेंस मोड से प्राप्त LL.B. ग्रेजुएटों को प्रोविज़नल रूप से एडवोकेट के तौर पर नामांकित करने, तथा आर्टिकल 220 के तहत पूर्व हाईकोर्ट जजों को बार काउंसिल में महिला सदस्य बनना संभव है, ये स्पष्ट आदेश जारी किए।

सौजन्य से:- Live Law Hindi
सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप : सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र
Shahadat
20 Sept 2026 8:30 AM IST
सुप्रीम कोर्ट में पिछले सप्ताह (14 सितंबर, 2026 से 18 सितंबर, 2026 तक) तक क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप। पिछले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।
सभी मेडिकल ग्रेजुएट, चाहे वे भारतीय हों या विदेशी, उन्हें एक जैसा स्टाइपेंड मिलना चाहिए: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) से यह पता लगाने को कहा कि क्या राजस्थान, आंध्र प्रदेश, केरल, गुजरात और झारखंड राज्यों में विदेशी मेडिकल ग्रेजुएट को स्टाइपेंड का भुगतान किया गया, या नहीं।
कोर्ट ने मौखिक रूप से यह भी कहा कि वह इस बारे में विस्तृत निर्देश जारी करेगा कि सभी अंडरग्रेजुएट मेडिकल ग्रेजुएट को - चाहे वे भारतीय हों या विदेशी - स्टाइपेंड मिलना चाहिए और यह भुगतान दोनों के लिए समान होना चाहिए। इसके अलावा, कोर्ट ने कहा कि वह देखेगा कि क्या स्टाइपेंड का भुगतान न होने के मामलों को देखने के लिए राज्य सरकारों को विशेष रूप से रिटायर्ड जजों को नियुक्त करने की ज़रूरत है।
Case Title: Abhishek Yadav and others v. Army College of Medical Sciences | W.P.(C) No. 730/2022
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
रद्द किए गए नियमों के तहत प्रमोशन का दावा करने का कोई पक्का अधिकार नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (17 सितंबर) को फिर से कहा कि लागू नियमों के तहत बनने वाली प्रमोशन वाली पोस्ट को ज़रूरी नहीं कि उन्हीं नियमों के तहत भरा जाए, खासकर तब जब वे नियम अब रद्द कर दिए गए हों। कोर्ट ने माना कि ऐसी प्रमोशन वाली पोस्ट को नए नियमों के तहत भरा जा सकता है, जिनमें भर्ती के नए तरीके बताए गए।
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने कहा, "सरकार के पॉलिसी फ़ैसले को देखते हुए कर्मचारी को रद्द किए गए नियमों के अनुसार प्रमोशन पर विचार किए जाने का कोई पक्का अधिकार नहीं मिलता। रीस्ट्रक्चरिंग (पुनर्गठन) के मामले में सरकार पर पुराने नियमों के अनुसार नियुक्तियां करने की कोई बाध्यता नहीं है।"
Cause Title: THE BHARAT SANCHAR NIGAM LIMITED AND ANOTHER VERSUS G.N. MANI RAVINDER AND OTHERS ETC.
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
सुप्रीम कोर्ट ने डिस्टेंस/ओपन मोड से बैचलर डिग्री लेने वाले लॉ ग्रेजुएट एडवोकेट के तौर पर प्रोविज़नल एनरोलमेंट की इजाज़त दी
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में तेलंगाना स्टेट बार काउंसिल को निर्देश दिया कि वे उन आवेदकों के एक ग्रुप को एडवोकेट के तौर पर प्रोविज़नल रूप से एनरोल करें, जिन्होंने रेगुलर मोड से तीन साल की LL.B. डिग्री हासिल की थी, लेकिन जिनका एनरोलमेंट इस आधार पर रोक दिया गया कि उनकी पिछली एजुकेशनल क्वालिफिकेशन (बैचलर डिग्री) ओपन, डिस्टेंस या कॉरेस्पोंडेंस मोड से हासिल की गई।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने यह अंतरिम आदेश उन आवेदनों पर दिया जिनमें प्रोविज़नल एनरोलमेंट की मांग की गई। यह मामला बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया (BCI) के 'लीगल एजुकेशन रूल्स, 2008' के नियम 5 की व्याख्या और उसे लागू करने से जुड़ा है और इस पर अंतिम फैसला आना अभी बाकी है।
Case: STS Gladies v Bar Council of India & Anr.
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
आर्टिकल 220 के तहत पूर्व हाईकोर्ट जजों को बार काउंसिल में महिला सदस्य के तौर पर शामिल करने पर कोई रोक नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ किया कि संविधान का आर्टिकल 220, जो भारत में अदालतों और अधिकारियों के सामने प्रैक्टिस करने से पूर्व हाईकोर्ट चीफ जस्टिसों और जजों को रोकता है, उन्हें संबंधित राज्य बार काउंसिल में महिला सदस्य के तौर पर शामिल करने से नहीं रोकता।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने यह स्पष्टीकरण तब दिया, जब वह राज्य बार काउंसिल में महिला सदस्यों को शामिल करने के बारे में कोर्ट के पहले के निर्देशों में बदलाव की मांग करने वाली अलग-अलग अर्जियों पर सुनवाई कर रहे थे।
Case Details: SWATI SINHA & ORS. v UNION OF INDIA & ORS in YOGAMAYA M.G. Vs UNION OF INDIA|MISCELLANEOUS APPLICATION NO. OF 2026 [DIARY NO(S).51143/2026]
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
बीमा कंपनी के ऑफिस की जगह से मोटर दुर्घटना के दावे के लिए अधिकार क्षेत्र तय नहीं होता: सुप्रीम कोर्ट ने MV Act की धारा 166(2) की व्याख्या की
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हालांकि मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 166(2) दावेदार को उस जगह पर मुआवज़े का दावा दायर करने की अनुमति देती है, जहां वह खुद "कारोबार करता है," लेकिन यही बात बीमा कंपनी पर लागू नहीं होती। सिर्फ़ इसलिए कि बीमा कंपनी किसी जगह पर कारोबार करती है, उसे उस जगह पर केस चलाने के अधिकार क्षेत्र (टेरिटोरियल ज्यूरिस्डिक्शन) के मकसद से प्रतिवादी (डिफेंडेंट) नहीं माना जा सकता।
Case: K Rashik v National Insurance Company Ltd & Anr
Powered by Nyaya 247 News
संबंधित ख़बरें
इसी विषय की और ख़बरें →
झारखंड हाईकोर्ट में तीन नए जज, फिर भी नौ पद अभी खाली

38 वर्ष के संघर्ष में सुमित्रा देवी को मिली सुप्रीम कोर्ट की जीत

हाई कोर्ट ने NHAI को जलभराव पर दी कड़ी चेतावनी, जमीन पर ठोस कदम माँगे

सुप्रीम कोर्ट में याचिका की अफ़वाह से शास्त्रीनगर बाजार में खलबली

कोलेजियम की सिफ़ारिश पर चार हाई कोर्ट में 14 जजों की नई नियुक्तियां

सुप्रीम कोर्ट ने डीपफेक केस पर थामा रोक; AI‑संबंधी जनहित याचिका के लिए सुनवाई तय

पटना हाई कोर्ट ने केंद्रीय बैंक ऑफ़ इंडिया के ‘अविवाहित’ शब्द को हटाकर दया‑नियुक्ति योजना में शादीशुदा बेटे के आवेदन को खारिज करने के आदेश को निरस्त किया

भाईचारा भारत का प्रमुख लक्ष्य: पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज का संदेश
ताज़ा ख़बरें
- दिल्ली हाई कोर्ट ने महिला वकील को जबरन शादी से बचाने के लिए पुलिस सुरक्षा का आदेश दिया
- समानलिंगी जोड़े को 'पति‑पत्नी' टैक्स छूट नहीं मिल सकती, कोर्ट में केंद्र का विरोध
- जायल में 10 अक्टूबर को लोक अदालत: आपसी सहमति से हल होंगे पारिवारिक व अन्य विवाद
- बलांगीर में राष्ट्रीय लोक अदालत में 10,751 मामलों का सौहार्दपूर्ण समाधान
- सुप्रीम कोर्ट ने निजी विश्वविद्यालयों को 6 हफ्ते में ऑडिटेड खाते और फीस-खर्च का ब्योरा जमा करने का आदेश दिया
- सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस ने चेतावनी दी: बिना वरिष्ठ प्रशिक्षण के युवा वकील नहीं सीखेंगे पेशे के 'नरम कौशल'
- सुप्रीम कोर्ट ने युवा वकीलों में परंपरागत प्रशिक्षण और अदालत शिष्टाचार के घटते महत्व पर चेतावनी दी
- हाईकोर्ट ने चेक हस्ताक्षर मामले में कहा, खाली चेक का आरोप बचाव नहीं बनता

