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हाईकोर्ट ने चेक हस्ताक्षर मामले में कहा, खाली चेक का आरोप बचाव नहीं बनता

उत्तरणाखंड हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि चेक पर हस्ताक्षर स्वीकार होने पर परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 की धारा 118(ए) और 139 के तहत कानूनी धारणाएँ बनी रहती हैं, भले ही बाद में अन्य विवरण किसी और ने भरें। याचिकाकर्ता के एक साल कारावास और 2.20 लाख रुपये के जुर्माने के आदेश को उच्च न्यायालय ने बरकरार रखा, क्योंकि उसने चेक के दुरुपयोग का ठोस प्रमाण नहीं दिया।

20 सितंबर 2026 को 11:05 am बजे
हाईकोर्ट ने चेक हस्ताक्षर मामले में कहा, खाली चेक का आरोप बचाव नहीं बनता

सौजन्य से:- ETV Bharat

चेक हस्ताक्षर मामले में हाईकोर्ट में सुनवाई, जानिए क्या कुछ हुआ

कोर्ट ने कहा कि केवल इनकार कर देना या खाली चेक के दुरुपयोग का सामान्य आरोप लगा देना पर्याप्त बचाव नहीं है.

By ETV Bharat Uttarakhand Team

Published : September 20, 2026 at 3:20 PM IST

नैनीताल: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश देकर कहा कि चेक पर हस्ताक्षर किए जाने की बात स्वीकार होने पर परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 (एन आई एक्ट ) की धारा 118(ए) और 139 के तहत कानूनी धारणा लागू हो जाती है, चाहे चेक के बाकी विवरण किसी अन्य व्यक्ति द्वारा भरे जाने या हस्ताक्षर और अन्य लिखावट में अंतर होने से यह धारणा अपने आप समाप्त नहीं होती.

मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति आलोक महरा की एकल पीठ में हुई। याचिका में एन आई एक्ट की धारा 138 के तहत दोषसिद्धि और सत्र अदालत द्वारा अपील को खारिज किए जाने को चुनौती दी गई. निचली अदालत ने याचिकाकर्ता को एक साल के साधारण कारावास और 2.20 लाख रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई थी. जिसे उच्च न्यायलय में चुनौती दी गयी.

मामला दो लाख रुपये के चेक से जुड़ा था, जो याचिकाकर्ता ने विपक्षी संख्या-2 के पक्ष में जारी था. बैंक ने याचिकाकर्ता की खाते में 'पर्याप्त धनराशि नहीं होने पर लौटा दिया. उसके बाद उसे कानूनी नोटिस भेजे जाने के बावजूद चेक की राशि का भुगतान नहीं किया गया.

याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि उसने एक खाली चेक पर केवल हस्ताक्षर करके विपक्षी कुलदीप बिष्ट को दिया. बाद में उस चेक का दुरुपयोग किया गया. उसका कहना था कि चेक के बाकी विवरण विपक्षी ने खुद भरे थे. चेक पर लिखावट उसके हस्ताक्षर से अलग थे.

कोर्ट ने पाया कि चेक पर याचिकाकर्ता के हस्ताक्षर होने की बात विवादित नहीं थी. अदालत ने कहा कि केवल यह दावा किया कि चेक के बाकी विवरण किसी अन्य व्यक्ति ने भरे थे, याचिकाकर्ता को कानूनी दायित्व से मुक्त नहीं किया जा सकता.

सुप्रीम कोर्ट के बीर सिंह बनाम मुकेश कुमार फैसले का हवाला देते हुए कहा कि जो व्यक्ति चेक पर हस्ताक्षर करके उसे स्वेच्छा से भुगतानकर्ता को सौंपता है, वह इस आधार पर अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता कि चेक के अन्य विवरण किसी और ने भरे थे.

अदालत ने कहा कि केवल यह तथ्य कि चेक के विवरण बाद में भुगतानकर्ता या किसी अन्य व्यक्ति ने भरे, चेक को अमान्य नहीं बनाता और न ही चेक जारी करने वाले को दायित्व से मुक्त करता है.

एनआई एक्ट की धारा 139 के तहत यह धारणा बनी रहती है कि चेक किसी कर्ज या अन्य कानूनी रूप से वसूल योग्य देनदारी के पूर्ण या आंशिक भुगतान के लिए प्राप्त हुआ था, जब तक आरोपी संभावित बचाव के आधार पर इस धारणा को खारिज करने में सफल न हो.

कोर्ट ने कहा कि केवल इनकार कर देना या खाली चेक के दुरुपयोग का सामान्य आरोप लगा देना पर्याप्त बचाव नहीं है. याचिकाकर्ता ऐसा कोई ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य पेश नहीं कर सका, जिससे यह साबित हो कि चेक कुलदीप बिष्ट को प्रतिवादी संख्या-2 के प्रति किसी देनदारी से पूरी तरह असंबंधित उद्देश्य के लिए दिया गया या बाद में उसे अवैध तरीके से हासिल कर उसका दुरुपयोग किया गया.

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जब चेक पर हस्ताक्षर स्वीकार हों तो हस्ताक्षर और चेक के अन्य विवरणों की लिखावट में अंतर मात्र से धारा 118(ए) और 139 के तहत बनने वाली कानूनी धारणा समाप्त नहीं होती है.

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