सुप्रीम कोर्ट ने किया बड़ा फैसला, बिना चोट के भी बच्ची की शिकायत पर हो सकता है मुकदमा
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यौन उत्पीड़न की शिकायतों में बच्ची की बात विश्वसनीय मानी जाएगी, जानकारी मिलने के तुरंत अधिकारियों को सूचित करना अनिवार्य और चोट के निशान न होना बच्ची की शिकायत को दबाने का बहाना नहीं है

सौजन्य से:- Jagran
'मासूम बच्ची की यौन उत्पीड़न की शिकायत पर चुप्पी साधना होगा अपराध', सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने पोक्सो एक्ट पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है कि यौन उत्पीड़न की शिकार बच्ची की बात विश्वसनीय मानी जाएगी। ...और पढ़ें
HighLights
- बच्ची की यौन उत्पीड़न की शिकायत विश्वसनीय मानी जाएगी।
- जानकारी मिलने पर तुरंत अधिकारियों को सूचित करना अनिवार्य।
- शारीरिक चोट के निशान न होना बहाना नहीं।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। बच्चों की सुरक्षा और उनके अधिकारों को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत ने एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि अगर कोई मासूम बच्ची अपने साथ हुए यौन उत्पीड़न की बात किसी को बताती है, तो उसे पूरी तरह विश्वसनीय माना जाएगा।
ऐसी स्थिति में जानकारी पाने वाला व्यक्ति पोक्सो एक्ट के तहत तुरंत पुलिस समेत संबंधित अधिकारियों को इसकी सूचना देने के लिए बाध्य होगा। बच्चों के दर्द को अनदेखा करना अब कानूनन अपराध होगा।
जानकारी सिर्फ प्रत्यक्ष देखना नहीं, पीड़ित का बताना भी है
जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने पोक्सो एक्ट के तहत 'अपराध की जानकारी होने' के दायरे को व्यापक रूप से परिभाषित किया है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 'जानकारी होना' केवल प्रत्यक्ष रूप से घटना को देखने तक सीमित नहीं है, बल्कि पीड़ित बच्ची से सीधे मिली जानकारी भी इसी दायरे में आती है। अगर बच्ची किसी से कहती है कि उसके साथ गलत हुआ है या होने की आशंका है, तो यह मान लिया जाएगा कि सुनने वाले को अपराध की जानकारी थी।
यह मामला अरुणाचल प्रदेश के एक स्कूल से जुड़ा है, जहां एक आठ साल की बच्ची ने अपने साथ सीनियर छात्र द्वारा किए गए यौन उत्पीड़न की शिकायत अपनी शिक्षिका, बड़ी बहन और सहपाठियों से की थी। लेकिन स्कूल प्रशासन ने इस पर पर्दा डालने की कोशिश की।
गुवाहाटी हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट ने यह कहते हुए आरोपित शिक्षिका और प्रधानाध्यापिका को बरी कर दिया था कि बच्ची के शरीर पर चोट के कोई बाहरी निशान नहीं थे, इसलिए उन्हें अपराध का यकीन नहीं हुआ।
चोट के निशान न होना चुप रहने का बहाना नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट के इस तर्क को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि यौन उत्पीड़न के मामलों में हमेशा शारीरिक चोट के निशान हों, यह जरूरी नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने गुवाहाटी हाईकोर्ट के आदेश को पलटते हुए कहा कि उस शिक्षिका के खिलाफ पोक्सो एक्ट की धारा 21 और आइपीसी की धारा 176 के तहत आरोप तय करने के पर्याप्त सबूत हैं, जिसने बच्ची से सीधे शिकायत मिलने के बावजूद अधिकारियों को सूचित नहीं किया।
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जांच के नाम पर शिकायत को खारिज न करें
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि कई बार बच्चे अपनी उम्र के कारण घटना की गंभीरता को ठीक से समझा नहीं पाते। ऐसे में धुंधली तस्वीर साफ करने के लिए उनसे संक्षिप्त पूछताछ की जा सकती है, लेकिन इसका उद्देश्य उनकी शिकायत को दबाना या खारिज करना नहीं, बल्कि सच्चाई को समझना होना चाहिए।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस मामले में पीड़ित की बड़ी बहन, सहेली और स्कूल की हेड गर्ल भी शामिल थीं, लेकिन चूंकि वे नाबालिग हैं, इसलिए उन पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।
साथ ही, संस्था के हर उस व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता जो प्रत्यक्ष रूप से शिकायत का हिस्सा नहीं था। यह फैसला देश के हर नागरिक, विशेषकर शिक्षकों और अभिभावकों को बच्चों की सुरक्षा के प्रति अधिक संवेदनशील और जवाबदेह बनाता है।
(समाचार एजेंसी पीटीआई के इनपुट के साथ)
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