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सुप्रीम कोर्ट ने यूपी गैंग्सटर्स एक्ट को बताया मृत कानून, कहा- दुरुपयोग की आशंका - supreme court calls up gangsters act stillborn citing misuse risk

सुप्रीम कोर्ट ने यूपी गैंग्सटर्स एक्ट को बताया मृत कानून, कहा- दुरुपयोग की आशंका सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश गैंग्सटर्स एक्ट को "स्टिलबार्न" बताते हुए कहा कि इसमें दुरुपयोग की काफी संभावनाएं हैं क्योंकि यह किसी व्यक्ति…

21 अगस्त 2026 को 06:55 pm बजे
सुप्रीम कोर्ट ने यूपी गैंग्सटर्स एक्ट को बताया मृत कानून, कहा- दुरुपयोग की आशंका - supreme court calls up gangsters act stillborn citing misuse risk

सौजन्य से:- Jagran

सुप्रीम कोर्ट ने यूपी गैंग्सटर्स एक्ट को बताया मृत कानून, कहा- दुरुपयोग की आशंका

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश गैंग्सटर्स एक्ट को "स्टिलबार्न" बताते हुए कहा कि इसमें दुरुपयोग की काफी संभावनाएं हैं क्योंकि यह किसी व्यक्ति को केवल "गैंग्सटर" करार दिए जाने पर दंडित करता है।

HighLights

- सुप्रीम कोर्ट ने यूपी गैंग्सटर्स एक्ट को "स्टिलबार्न" कहा।

- कानून के दुरुपयोग की आशंका पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई।

- दो वकीलों के खिलाफ दर्ज मामला रद्द किया गया।

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि उत्तर प्रदेश गैंग्सटर्स एवं असामाजिक गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1986 "स्टिलबार्न" है क्योंकि किसी व्यक्ति को केवल "गैंग्सटर" करार दिए जाने के आधार पर दंडित नहीं किया जा सकता। साथ ही कहा कि इस कानून में दुरुपयोग की काफी संभावनाएं हैं।

"स्टिलबार्न" एक कानूनी शब्द है जिसका उपयोग किसी कानून को उसकी शुरुआत से ही अमान्य, शून्य या कानूनी रूप से मृत बताने के लिए किया जाता है क्योंकि उक्त कानून एक अपराध को परिभाषित करने में विफल रहता है।

जस्टिस जेबी पार्डीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने दो वकीलों के विरुद्ध उत्तर प्रदेश गैंग्सटर्स और असामाजिक गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1986 के तहत एक आपराधिक मामले को रद करते हुए यह फैसला सुनाया।

पीठ ने कहा कि जिस कानून को हिंसा और संगठित आपराधिक गतिविधि को रोकने के लिए बनाया गया था, उसका इस्तेमाल बिना संदेह वाले नागरिकों के विरुद्ध किया जा सकता है।

उत्तर प्रदेश गैंग्सटर्स और असामाजिक गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम एक विशेष राज्य कानून है जिसे संगठित अपराध सिंडिकेट, आपराधिक गिरोहों और आदतन असामाजिक तत्वों को निशाना बनाने, नियंत्रित करने और दंडित करने के लिए बनाया गया है।

शीर्ष अदालत ने कहा कि यह कानून हिंसा को रोकने के बहाने नागरिकों के विरुद्ध हिंसा को बढ़ावा देने में सक्षम है।

पीठ ने कहा, "गिरोह को परिभाषित करने के बाद, जिसमें उप-खंड (1) से (25) के तहत सूचीबद्ध अपराध शामिल हैं और गैंग्सटर को गिरोह के सदस्य या अगुआ या आयोजक के रूप में परिभाषित करने के बाद; कानून में उल्लेखित अपराध के बिना भी गैंग्सटर के लिए सजा निर्धारित की जाती है, जो दंडात्मक कार्रवाई को स्टिलबार्न बना देती है।"

शीर्ष अदालत ने अंग्रेजी लेखक जार्ज आरवेल का हवाला देते हुए कहा, 'जो लोग हिंसा का त्याग करते हैं, वे ऐसा केवल इसलिए कर पाते हैं क्योंकि दूसरे उनकी ओर से हिंसा कर रहे होते हैं।'

कोई भी कानून मनमानी व बिना सोचे-समझे कार्रवाई का आधार नहीं बन सकता

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आपराधिक गिरोहों के खतरे पर अंकुश लगाना है, लेकिन इनका अंत उन साधनों खासकर ऐसे दंडात्मक कानून बनाने को उचित नहीं ठहराता, जो नागरिकों की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप करता है।

अधिनियम के प्रविधानों के कारण आरोपित को बिना मुकदमे के लंबे समय तक हिरासत में रखा जा सकता है, जो निवारक हिरासत से जुड़े कानून के समान है।

हालांकि अनुच्छेद-21 के तहत भी निवारक हिरासत को स्वीकार्य माना गया है, लेकिन इसमें सुरक्षा के उपाय हैं। यहां तक कि मामूली प्रक्रियात्मक उल्लंघन से भी हिरासत में लिए गए व्यक्ति की रिहाई हो सकती है।

पीठ ने कहा, "चाहे कोई सामाजिक बुराई कितनी भी गंभीर और खतरनाक क्यों न हो, उसे रोकने के लिए बनाया गया कोई भी दंडात्मक कानून, अपराध के आरोपित व्यक्ति के विरुद्ध मनमानी और बिना सोचे-समझे की गई कार्रवाई का आधार नहीं बन सकता।"

(समाचार एजेंसी पीटीआई के इनपुट के साथ)

यह भी पढ़ें- दयानिधि मारन मामले में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, दूसरसंचार सचिव पर हाई कोर्ट का आदेश किया रद

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