न्याय की आस: सुप्रीम कोर्ट ने असम सरकार से विदेशी घोषित पांच महिलाओं के मामले में जवाब मांगा
सुप्रीम कोर्ट ने असम में विदेशी घोषित की गई पांच महिलाओं के मामले में असम सरकार से दो सप्ताह में जवाब मांगा है। महिलाओं ने अपने निर्वासन के आदेश को चुनौती दी है और न्यायालय ने निष्पक्ष नागरिकता प्रक्रिया पर जोर दिया है।

सौजन्य से:- Jagran
विदेशी घोषित पांच महिलाओं की गुहार पर सुप्रीम कोर्ट ने असम सरकार से मांगा दो हफ्ते में जवाब
सुप्रीम कोर्ट ने असम में विदेशी घोषित की गईं पांच महिलाओं की याचिकाओं पर असम सरकार से दो सप्ताह में जवाब मांगा है। इन महिलाओं ने अपने निर्वासन के आदेश ...और पढ़ें
HighLights
- सुप्रीम कोर्ट ने असम सरकार से दो हफ्ते में जवाब मांगा।
- पांच महिलाओं को विदेशी घोषित करने के आदेशों को चुनौती दी गई।
- न्यायालय ने निष्पक्ष नागरिकता प्रक्रिया पर जोर दिया।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। असम में नागरिकता और पहचान की कानूनी लड़ाई लड़ रही पांच महिलाओं के लिए सुप्रीम कोर्ट से राहत और उम्मीद की एक नई किरण दिखाई दी है। देश की सर्वोच्च अदालत ने उन याचिकाओं पर असम सरकार को अपना जवाब दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया है, जिनमें इन महिलाओं को विदेशी घोषित करने के आदेशों को चुनौती दी गई है।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने यह आदेश राज्य सरकार के वकील द्वारा जवाबी हलफनामा दायर करने के लिए समय मांगे जाने के बाद दिया।
निर्वासन पर लगा स्टे और दर्द की कहानी
यह मामला सिर्फ कानूनी कागजात का नहीं, बल्कि उन जिंदगियों का है जो अनिश्चितता के साए में जी रही हैं। इन पांच महिलाओं में से दो इस वक्त डिटेंशन सेंटर (हिरासत केंद्र) में अपनी किस्मत का फैसला होने का इंतजार कर रही हैं। इससे पहले, पांच जून को सुप्रीम कोर्ट ने इन याचिकाओं पर सुनवाई के लिए सहमति जताते हुए इनके निर्वासन पर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था, जिससे इन्हें फौरी राहत मिली थी।
गौहाटी हाईकोर्ट ने इससे पहले विदेशी न्यायाधिकरण के उन फैसलों को बरकरार रखा था, जिसमें इन महिलाओं को बांग्लादेश से आने वाली अवैध प्रवासी बताया गया था। हाईकोर्ट के इसी रुख के खिलाफ महिलाओं ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।
निष्पक्ष और तार्किक प्रक्रिया की मांग
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट के ही 13 जुलाई के एक महत्वपूर्ण फैसले का हवाला दिया। उस फैसले में कोर्ट ने साफ कहा था कि किसी भी व्यक्ति की नागरिकता तय करने की प्रक्रिया पूरी तरह न्यायसंगत होनी चाहिए। "राज्य के पास यह सुनिश्चित करने का वैध अधिकार है कि कोई अवैध रूप से नागरिकता न ले, लेकिन नागरिकता की स्थिति का निर्धारण हमेशा एक निष्पक्ष, वैध और तार्किक प्रक्रिया के माध्यम से होना चाहिए।"
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सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व में न्यायाधिकरणों को ऐसे मामलों पर बिना किसी पुराने पूर्वाग्रह के नए सिरे से विचार करने को कहा था। अब कोर्ट दो सप्ताह बाद इस संवेदनशील मामले पर अगली सुनवाई करेगा, जिस पर इन परिवारों का भविष्य टिका है।
(समाचार एजेंसी पीटीआई के इनपुट के साथ)
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