सुप्रीम कोर्ट के OBC क्रीमी‑लेयर निर्णय पर केंद्र को दो साल का समय क्यों चाहिए?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि OBC क्रीमी लेयर तय करने में केवल आय नहीं, बल्कि अभिभावकों की सामाजिक स्थिति और पद की प्रकृति भी देखनी होगी, जिससे समानता के सिद्धांत की रक्षा हो। केंद्र इस निर्णय को तुरंत लागू करने से उत्पन्न हो सकने वाली प्रशासनिक और कानूनी जटिलताओं से बचने हेतु दो साल की समयसीमा चाहता है, जबकि वह फैसले को कमजोर करने की कोई मंशा नहीं रखता।

सौजन्य से:- Navbharat Times
सुप्रीम कोर्ट और OBC Creamy Layer का फैसला
- 11 मार्च 2026 को Union of India v. Rohith Nathan मामले में सुप्रीम कोर्ट ने PSU और निजी क्षेत्र में कार्यरत माता-पिता की सैलरी को अकेले OBC क्रीमी लेयर तय करने का निर्णायक आधार मानने वाली व्यवस्था पर फैसला दिया। सुप्रीम कोर्ट की पीठ जस्टिस पी. एस. नरसिम्हा और जस्टिस आर. महादेवन ने स्पष्ट किया कि क्रीमी लेयर का निर्धारण सिर्फ आय के आधार पर नहीं किया जा सकता।
- अदालत ने 1993 के OM और उसके बाद जारी निर्देशों को साथ पढ़ते हुए कहा कि अभिभावक की सामाजिक स्थिति और उनके पद की प्रकृति भी महत्वपूर्ण है। सिर्फ इनकम ब्रैकेट के आधार पर क्रीमी लेयर का स्टेटस तय करना, पोस्ट की कैटेगरी और स्टेटस पैरामीटर का जिक्र किए बिना, कानून में साफ तौर पर टिकने लायक नहीं है।
- कोर्ट ने यह भी कहा कि समान स्थिति वाले OBC उम्मीदवारों के साथ अलग अलग व्यवहार संविधान के Articles 14, 15 और 16 में निहित समानता के सिद्धांत के खिलाफ जा सकता है।
विवाद की जड़ में 1993 का Office Memorandum
OBC क्रीमी लेयर के लिए केंद्र ने 8 सितंबर 1993 के ऑफिस मेमोरेंडम में सामाजिक और अन्य निर्धारित मानदंडों के आधार पर बहिष्करण की व्यवस्था बनाई थी। इस ढांचे में सरकारी पदों के साथ-साथ PSU, बैंक, निजी संस्थानों आदि में पदों की समकक्षता का सवाल महत्वपूर्ण है। मार्च के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जहां PSU या अन्य संस्थानों के पदों की सरकारी पदों से औपचारिक समानक से जुड़ी बातें तय नहीं हुई है, वहां केवल वेतन के आधार पर क्रीमी लेयर का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।केंद्र को प्रशासनिक और कानूनी जटिलताओं का डर
केंद्र का मुख्य तर्क और भय यह है कि मार्च के फैसले को तुरंत पिछली और चल रही भर्तियों पर लागू करने से प्रशासनिक और कानूनी जटिलताएं पैदा हो सकती हैं। सरकार ने नियुक्तियों, वरिष्ठता और कैडर बंटवारे और पहले से चल रही भर्तियों पर संभावित असर का मुद्दा उठाया है। केंद्र के मुताबिक PSU और निजी क्षेत्र के पदों की सरकारी Group A और Group B पदों से समानक तय करने के लिए एक व्यापक प्रक्रिया की जरूरत होगी। और फिलहाल ऐसा करने से प्रशासनिक और कानूनी जटिलताओं के पैदा होने की भय है। इसलिए सरकार कुछ समय चाहती है।पुराने मामलों और मौजूदा अधिकारियों पर असर का डर
केंद्र ने अदालत के सामने आशंका जताई है कि यदि फैसला पिछली नियुक्तियों पर भी लागू हुआ तो ऐसे कर्मचारी और अधिकारी प्रभावित हो सकते हैं जो मूल मुकदमे का हिस्सा नहीं थे। सरकार ने विशेष रूप से उनके सीनियर होने या कैडर दिए जाने और नियुक्तिियों पर संभावित असर की ओर ध्यान दिलाया है। इसके अलावा राज्य स्तरीय भर्तियों और शैक्षणिक संस्थानों में दाखिलों पर पड़ने वाले प्रशासनिक प्रभाव की बात भी केंद्र ने रखी है।केंद्र की मंशा, फैसले को कमजोर करने या रिव्यू की नहीं
मामले में एक बात पर और ध्यान देने की जरूरत है कि सुप्रीम कोर्ट में केंद्र ने अपनी ओर से यह साफ कर दिया कि उसकी मांग को 11 मार्च के फैसले को कमजोर या रिव्यू करने से जुड़ा नहीं समझा जाए, बल्कि शीर्ष अदालत के फैसले के तहत ही उसके सभी बिंदुओं को लागू करने के लिए व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ाने की है। फिलहाल देखना यह है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अंतिम स्थिति क्या बनती है।अब प्रयागराज में जातिगत भेदभाव का मामला गरमाया, हाई कोर्ट गंभीर, नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के छात्र ने लगाए थे आरोप
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