सुप्रीम कोर्ट ने OBC क्रीमी‑लेयर मुद्दे में भविष्य‑प्रभावी आदेश दिया, केंद्र को मिला दो साल का मोहरा
कोर्ट ने केंद्र सरकार की याचिका स्वीकार कर 11 मार्च 2026 के फैसले को भविष्य की तिथि से लागू करने की अनुमति दी, जिससे मौजूदा और चल रही भर्ती प्रक्रियाओं पर असर न पड़े। केंद्र ने दो साल की रोक के लिये अनुरोध किया है, ताकि प्रशासनिक अराजकता से बचा जा सके और नियुक्त कर्मचारियों के अधिकार सुरक्षित रहें।

सौजन्य से:- ETV Bharat
OBC क्रीमी लेयर से जुड़े फैसले को भविष्य से लागू करने पर राजी हुआ सुप्रीम कोर्ट, केंद्र को मिल सकती है बड़ी राहत
केंद्र सरकार ने पिछली और चल रही भर्तियों में प्रशासनिक अराजकता से बचने के लिए 2 साल की मोहलत मांगी है. पढ़ें, पूरी खबर.
By Sumit Saxena
Published : September 24, 2026 at 8:35 PM IST
नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को केंद्र सरकार की उस याचिका पर विचार करने के लिए सहमति दे दी है, जिसमें कोर्ट के 11 मार्च के फैसले को भविष्य की तारीख से लागू करने की मांग की गई है. कोर्ट ने अपने उस फैसले में कहा था कि सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों या निजी क्षेत्र में काम करने वाले माता-पिता के वेतन या आय को अपने आप में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के 'क्रीमी-लेयर' से बाहर रखने का एकमात्र पैमाना नहीं माना जा सकता.
अदालत में केंद्र सरकार का पक्ष अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने रखा. उन्होंने भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ के सामने अपनी दलीलें पेश कीं. भाटी ने तर्क दिया कि इस फैसले को भविष्य के लिए लागू किया जाना चाहिए. उन्होंने कोर्ट द्वारा तय किए गए इस कानून को पूरी तरह लागू करने और पिछली व चल रही भर्ती प्रक्रियाओं में किसी भी तरह की बाधा को रोकने के लिए दो साल का समय मांगा.
सर्वोच्च अदालत ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल की दलीलों पर ध्यान दिया कि अलग-अलग हाई कोर्ट्स ने इस फैसले से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई शुरू कर दी है. भाटी ने कहा कि केंद्र सरकार ने विभिन्न हाई कोर्ट्स से मामलों को ट्रांसफर कर के सर्वोच्च अदालत या किसी एक हाई कोर्ट में भेजने की मांग करते हुए याचिका दायर की है.
केंद्र सरकार ने कहा कि वह इस अदालत द्वारा तय किए गए कानून को लागू करने पर केवल 2 साल की सीमित रोक का अनुरोध कर रही है, ताकि प्रशासनिक आवश्यकताओं के अनुसार प्रतिस्पर्धी अधिकारों को व्यवस्थित किया जा सके.
केंद्र सरकार के एक नोट में कहा गया, "इस फैसले को पिछली और चल रही भर्तियों पर लागू करने से उन लोगों के प्रतिस्पर्धी अधिकारों को भारी नुकसान पहुंचेगा जो इस मुकदमे में पक्षकार भी नहीं थे. इससे नियुक्त हो चुके लोगों या उम्मीदवारों की वरिष्ठता और कैडर आवंटन को दोबारा खोलना पड़ेगा, जिससे पूरी तरह से प्रशासनिक अराजकता पैदा हो जाएगी."
नोट में आगे कहा गया कि भविष्य से कानून लागू करने का सिद्धांत संविधान के अनुच्छेद 32, 141 और 142 के तहत सर्वोच्च अदालत की शक्ति में निहित है. नोट में कहा गया है कि भविष्य से कानून लागू करने का सिद्धांत बीते सालों में एक लचीले न्यायिक उपकरण के रूप में विकसित हुआ है.
यह उस सामान्य नियम के अपवाद के तौर पर सामने आया है जिसके तहत अदालत केवल उस कानून की घोषणा करती है जो हमेशा से अस्तित्व में था- वह कानून "बनाती" नहीं है. ताकि एक घोषणा सामान्य रूप से पिछली तारीख से प्रभावी हो सके, यानी उस प्रावधान की शुरुआत से जिसकी व्याख्या की गई है.
नोट में आगे कहा गया, "हालांकि, ऐसे बहुत से मामले हैं जिनमें अदालत पाती है कि प्रतिस्पर्धी अधिकारों को व्यवस्थित करने, प्रशासनिक अराजकता से बचने या अदालती कार्यवाहियों को दोबारा खोले जाने से रोकने के लिए सामान्य नियम में अपवाद जरूरी है, और वह अपने सामने मौजूद मामले के हिसाब से उपयुक्त निर्देश पारित करती है."
नोट में आगे कहा गया कि ऐसा कोई तय तरीका या नियम नहीं है जिसके तहत यह अदालत इस न्यायिक उपकरण का इस्तेमाल करती है. नोट में कहा गया, "इस अदालत के पास संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपने फैसले को भविष्य की तारीख से प्रभावी घोषित करने की शक्ति है. यदि इस फैसले को भविष्य की तारीख से लागू नहीं किया गया, तो उन कर्मचारियों या नियुक्त हो चुके लोगों पर कई गंभीर, अन्यायपूर्ण और अनचाहे परिणाम भुगतने पड़ेंगे जो इस मुकदमे में पक्षकार भी नहीं थे, और इससे पूरी तरह से प्रशासनिक अराजकता पैदा हो जाएगी."
"इसलिए यह प्रार्थना की जाती है कि 11 मार्च, 2026 के फैसले को भविष्य की तारीख से प्रभावी किया जाए ताकि चल रही और पिछली भर्ती प्रक्रियाएं प्रभावित न हों," नोट में जोड़ा गया.
बता दें कि 11 मार्च को, सर्वोच्च अदालत ने 'भारत संघ बनाम रोहित नाथन' नामक मामले में फैसला सुनाया था कि सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों या निजी क्षेत्र में काम करने वाले माता-पिता के वेतन या आय को अपने आप में OBC 'क्रिमी-लेयर' से बाहर रखने का एकमात्र पैमाना नहीं माना जा सकता. 1993 के कार्यालय ज्ञापन के अनुसार माता-पिता के पद की स्थिति और श्रेणी के साथ-साथ, निर्धारित आय या संपत्ति परीक्षण पर विचार किया जाना था.
केंद्र सरकार ने इस फैसले को कमजोर करने की मांग नहीं की है, बल्कि इसके क्रियान्वयन को दो साल के लिए टालने का अनुरोध किया है ताकि वह प्रतिस्पर्धी अधिकारों को व्यवस्थित कर सके, प्रशासनिक आवश्यकताओं को पूरा कर सके और एक "प्रभावी समानता अभ्यास" कर सके.
बता दें कि 1 सितंबर को, इस फैसले को लिखने वाले जस्टिस पी. एस. नरसिम्हा की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट की एक अन्य बेंच ने भी केंद्र सरकार की एक और याचिका पर विचार करने के लिए सहमति दी थी. उस याचिका में केंद्र ने सिविल सेवा परीक्षा 2025 के उम्मीदवारों पर OBC क्रिमी-लेयर मानदंडों से जुड़े 11 मार्च के फैसले के लागू होने को लेकर स्पष्टीकरण मांगा था.
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