सुप्रीम कोर्ट ने आईएएस पूजा सिंघल के मनी लॉन्ड्रिंग केस पर दायर दख़ल को खारिज कर मुकदमा जारी रखने का फैसला किया
अदालत ने निचली अदालत के आदेश को रद्द करने से इनकार कर दिया, जिससे झारखंड की पूर्व सचिव पूजा सिंघल पर धन शोधन का मुकदमा जारी रहेगा। उनकी वकील ने दंड प्रक्रिया संहिता धारा 197 के तहत सरकारी मंजूरी की कमी बताई, जबकि अभियोजन पक्ष ने बरामद राशि की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठाया। न्यायालय ने इस मंजूरी के मुद्दे को खुला छोड़ते हुए आगे के साक्ष्यों के साथ निर्णय लेने का संकेत दिया।

सौजन्य से:- ETV Bharat
झारखंड की IAS अधिकारी पूजा सिंघल को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका, मनी लॉन्ड्रिंग केस में ट्रायल जारी रहेगा
प्रवर्तन निदेशालय ने झारखंड खनन विभाग की पूर्व सचिव पूजा सिंघल को 11 मई 2022 को गिरफ्तार किया था.
By Sumit Saxena
Published : September 25, 2026 at 8:08 PM IST
नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को झारखंड की आईएएस अधिकारी पूजा सिंघल के खिलाफ निचली अदालत द्वारा मामले पर संज्ञान लेने के आदेश को रद्द करने से इनकार कर दिया. इसका मतलब यह है कि उनके खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग (धन शोधन) मामले में मुकदमा जारी रहेगा. यह मामला चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच के सामने आया.
प्रवर्तन निदेशालय (ED) की तरफ से पेश हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू ने दलील दी कि इस अपराध पर अदालत द्वारा संज्ञान बहुत पहले ही लिया जा चुका है. पूजा सिंघल का पक्ष रख रही वरिष्ठ वकील मीनाक्षी अरोड़ा ने कहा कि इस मामले में दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 197 के तहत एक प्रशासनिक अधिकारी पर मुकदमा चलाने के लिए जरूरी सरकारी मंजूरी नहीं दी गई थी. अरोड़ा ने यह भी कहा कि जिस 19 करोड़ रुपये का हर जगह ढिंढोरा पीटा जा रहा है, उसका उनकी मुवक्किल से कोई लेना-देना नहीं है.
दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 197 कहती है, "जब कोई व्यक्ति, जो जज या मजिस्ट्रेट या कोई ऐसा लोक सेवक है या रहा हो, जिसे सरकार की मंजूरी के बिना उसके पद से नहीं हटाया जा सकता, उस पर अपने आधिकारिक कर्तव्य को निभाने के दौरान किए गए किसी अपराध का आरोप लगाया जाता है, तो कोई भी अदालत सरकार की पिछली (यानी पहले से ली गई) मंजूरी के बिना ऐसे अपराध पर संज्ञान नहीं लेगी."
सुनवाई के दौरान वकील मीनाक्षी अरोड़ा ने दलील दी, "जिस तथाकथित 19 करोड़ रुपये को सीए के पास से बरामद किया गया था, उस सीए ने अलग-अलग बयान दिए हैं. अब तक कुल सात बयान दिये हैं. वह अपने पिछले बयान से मुकर गया है और एक बयान में उसने यह भी स्वीकार किया है कि यह पैसा उसका (यानी पूजा सिंघल का) बिल्कुल नहीं है."
पीठ ने जवाब दिया, "यही कारण है कि (मुकदमा चलाने की) मंजूरी का सवाल सीए के बयान की विश्वसनीयता पर निर्भर हो जाता है... क्योंकि यहां कुछ ऐसे बयानों पर विचार किया जा रहा है जो सीधे तौर पर उन्हें दोषी ठहराते हैं. यह मामला आधिकारिक कर्तव्य के दायरे से बाहर चला जाता है."
यह दलील भी दी गई कि जब सरकार से मंजूरी न मिलने पर आपत्ति जताई गई, तो प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने तर्क दिया कि नए कानून, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत "ऑटोमैटिक डीम्ड सैंक्शन" (यानी अपने आप मान ली गई मंजूरी) का प्रावधान है.
वरिष्ठ वकील ने तर्क दिया कि सिंघल भ्रष्टाचार के मामले में आरोपी नहीं थीं, और जहां तक मनी लॉन्ड्रिंग के मामले का सवाल है, वह अपनी आधिकारिक क्षमता में काम कर रही थीं.
जस्टिस बागची ने कहा कि सिंघल के पास से 19 करोड़ से अधिक की राशि बरामद की गई थी. पीठ ने संकेत दिया कि वह फिलहाल कोई राहत देने के मूड में नहीं है. पीठ ने कहा कि मुकदमा चलाने की मंजूरी देना कानून और तथ्यों से जुड़ा एक मिला-जुला सवाल है, और यह पता लगाया जाना जरूरी है कि जब यह कथित अपराध हुआ, तब क्या वह अधिकारी अपने सरकारी काम को ही अंजाम दे रही थीं.
पीठ ने कहा, "हम मुकदमा चलाने की मंजूरी के इस मुद्दे को खुला रखना चाहते हैं, ताकि कार्यवाही के सही चरण में अन्य सबूतों के साथ मिलकर इस पर फैसला किया जा सके."
प्रवर्तन निदेशालय ने झारखंड खनन विभाग की पूर्व सचिव पूजा सिंघल को 11 मई 2022 को गिरफ्तार किया था. यह कार्रवाई केंद्र सरकार की प्रमुख ग्रामीण रोजगार योजना 'मनरेगा' (MGNREGA) के क्रियान्वयन में हुए करीब 18 करोड़ रुपये के कथित घोटाले से जुड़े ठिकानों पर छापेमारी के बाद की गई थी. दो साल से अधिक समय तक जेल में रहने के बाद, 2000 बैच की इस आईएएस अधिकारी को जब जमानत मिल गई, तब जाकर उनका निलंबन वापस लिया गया था.
उन्होंने झारखंड हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की थी, जिसमें उन्होंने रांची की एक पीएमएलए (PMLA) कोर्ट द्वारा 19 जुलाई 2022 को उनके खिलाफ (2018 के ईसीआईआर केस 3 के सिलसिले में) कार्रवाई शुरू करने के आदेश को रद्द करने की मांग की थी. उनकी तरफ से यह दलील दी गई थी कि प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) की धारा 3 और 4 के तहत अपराधों पर संज्ञान लेते समय, सीआरपीसी (CrPC), 1973 की धारा 197 के तहत आवश्यक सरकारी मंजूरी के अनिवार्य नियम का पालन नहीं किया गया.
हाई कोर्ट ने सिंघल की इस दलील को खारिज कर दिया था. कोर्ट ने फैसला सुनाया था कि व्यक्तिगत रूप से किए गए "अवैध कामों" से जुड़े मामलों में मुकदमा चलाने के लिए सीआरपीसी की धारा 197 के तहत पहले से सरकारी मंजूरी लेना जरूरी नहीं है. जिसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा.
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