होम›संविधान›जस्टिस दत्ता ने उठाया सवाल: संविधानिक भरोसा टूट रहा है या नहीं, CEC नियुक्ति के नियमों पर
संविधान

जस्टिस दत्ता ने उठाया सवाल: संविधानिक भरोसा टूट रहा है या नहीं, CEC नियुक्ति के नियमों पर

जस्टिस दत्ता ने कहा कि भारतीय संविधान का मूल सिद्धांत व्यक्तियों पर नहीं बल्कि कानून पर आधारित है, और सत्ता में बैठे भी कानून से बंधे हैं। उन्होंने 2023 की CEC‑निर्वाचन आयुक्त नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर यह सवाल उठाया कि क्या संवैधानिक भरोसा वास्तविकता में कमजोर हो रहा है, इसे उन्होंने क्रिकेट अंपायर के उदाहरण से समझाया। न्यायालय ने इस बात पर ज़ोर दिया कि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता न केवल मौजूद होनी चाहिए बल्कि उसका स्पष्ट प्रकट होना भी आवश्यक है।

24 सितंबर 2026 को 06:04 pm बजे
जस्टिस दत्ता ने उठाया सवाल: संविधानिक भरोसा टूट रहा है या नहीं, CEC नियुक्ति के नियमों पर

सौजन्य से:- Navbharat Times

जस्टिस दत्ता ने कहा कि भारतीय संवैधानिक व्यवस्था का मूल सिद्धांत ‘व्यक्तियों की नहीं, कानूनों की सरकार’ है। सत्ता में बैठे लोग भी कानून से बंधे हैं और कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि चुनाव से जुड़े कानूनों का विशेष संवैधानिक महत्व है, क्योंकि वे संविधान के भाग-15 और अनुच्छेद 324 से 329 में निहित चुनावी व्यवस्था से सीधे जुड़े हैं।

नई दिल्ली: मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अपने अलग मत में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपांकर दत्ता ने ‘संवैधानिक भरोसे’ और संवैधानिक नैतिकता के सिद्धांतों पर महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं। उन्होंने सवाल उठाया कि व्यवहार में संवैधानिक भरोसा टूटा तो नहीं?

कानून से कोई ऊपर नहीं

जस्टिस दत्ता ने कहा कि भारतीय संवैधानिक व्यवस्था का मूल सिद्धांत ‘व्यक्तियों की नहीं, कानूनों की सरकार’ है। सत्ता में बैठे लोग भी कानून से बंधे हैं और कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि चुनाव से जुड़े कानूनों का विशेष संवैधानिक महत्व है, क्योंकि वे संविधान के भाग-15 और अनुच्छेद 324 से 329 में निहित चुनावी व्यवस्था से सीधे जुड़े हैं।

संवैधानिक भरोसे का सवाल

केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने 2023 की नियुक्ति व्यवस्था का बचाव करते हुए प्रधानमंत्री के पद से जुड़े ‘पवित्र संवैधानिक भरोसे’ का हवाला दिया था। सॉलिसिटर ने मनोज नरुला बनाम केंद्र मामले में दिए गए फैसले के कुछ अंशों को रेफर किया। उनके अनुसार, यह विचार किसी और का नहीं बल्कि स्वयं डॉ. बी. आर. आंबेडकर का था कि यदि देश के प्रधानमंत्री पर भरोसा नहीं किया जा सकता, तो फिर किसी और पर भरोसा नहीं किया जा सकता। यह मानकर नहीं चला जा सकता कि प्रधानमंत्री या मंत्री लोकतांत्रिक सिद्धांतों के खिलाफ काम करेंगे।

राजनीतिक दलों का नेतृत्व भी संकीर्ण

जस्टिस दत्ता ने डॉ. बी.आर. आंबेडकर के संविधान सभा में दिए विचारों और बाद के भाषणों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि अंबेडकर ने प्रधानमंत्री, संसद और जनता की समझदारी पर भरोसा किया था, लेकिन बाद के वर्षों में लोकतांत्रिक संस्थाओं के कामकाज को लेकर डॉक्टर अंबेडकर की निराशा सामने आई थी। जस्टिस दत्ता ने मनोज नरूला बनाम केंद्र के फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें प्रधानमंत्री के पद पर संवैधानिक भरोसे के साथ उससे जुड़ी जिम्मेदारी को रेखांकित किया गया था। बहरहाल, आंकड़े इस बात के भी संकेत देते हैं कि राजनीतिक दलों का नेतृत्व भी संकीर्ण दलीय हितों से ऊपर उठने और सार्वजनिक जीवन को स्वच्छ बनाने के लिए प्रतिबद्ध होने में स्वयं को असमर्थ पा रहा है। ऐसी स्थिति में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या संविधान सभा की बहसों के दौरान डॉ. आंबेडकर और इस अदालत द्वारा मनोज नरुला में जिस संवैधानिक विश्वास की बात की गई थी, वह व्यवहार में कहीं विश्वासघात का शिकार तो नहीं हो गया है?

क्रिकेट अंपायर का उदाहरण

2023 के कानून की धारा 7 के तहत CEC और EC की नियुक्ति के लिए चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री शामिल हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इससे कार्यपालिका को नियुक्ति प्रक्रिया में प्रभावी बढ़त मिलती है।जस्टिस दत्ता ने कहा कि प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री संविधान के अनुच्छेद 75(3) के तहत मंत्रिपरिषद की सामूहिक जिम्मेदारी से बंधा होता है। इसलिए इस बात पर सवाल उठता है कि क्या वह चयन के मामले में प्रधानमंत्री के रुख से अलग जा सकता है। उन्होंने नियुक्ति प्रक्रिया को क्रिकेट अंपायर के उदाहरण से समझाया। उनके अनुसार, यदि किसी क्रिकेट मैच में अंपायर का चयन एक टीम के कप्तान द्वारा किया जाए और वही टीम जीत जाए, तो अंपायर के फैसले सही होने के बावजूद उसकी निष्पक्षता को लेकर संदेह पैदा हो सकता है। इसी तरह चुनाव आयोग के लिए केवल स्वतंत्र होना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि उसका स्वतंत्र दिखाई देना भी जरूरी है।

नए रूप में व्यवस्थित करने का सवाल

जस्टिस दत्ता ने कहा कि सात दशक से अधिक समय तक अनुच्छेद 324(2) के तहत चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए कानून नहीं बनाया गया। 2023 का कानून इस संवैधानिक कमी को दूर करने का संसद का पहला प्रयास है। हालांकि, उन्होंने कहा कि अब यह देखना होगा कि नया कानून चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को मजबूत करता है या कार्यपालिका के नियंत्रण को नए सिरे से व्यवस्थित करता है। इस सवाल का अंतिम निर्णय याचिकाओं की मेरिट पर सुनवाई के दौरान होगा। जस्टिस दत्ता ने यह भी कहा कि विभिन्न दौर की सरकारों ने चुनाव आयोग जैसी स्वतंत्र संस्थाओं पर प्रभाव बनाए रखने की कोशिश की। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह टिप्पणी किसी एक राजनीतिक दल तक सीमित नहीं है। नियुक्ति प्रक्रिया स्वयं भी संवैधानिक नैतिकता की कसौटी पर खरी उतरनी चाहिए।

लेखक के बारे मेंराजेश चौधरीराजेश चौधरी 2007 से नवभारत टाइम्स से जुड़े हुए हैं। वह दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट, निचली अदालत और सीबीआई से जुड़े विषयों को कवर करते हैं और स्पीड न्यूज में भी आपको इस बारे में खबर देते रहेंगे। यदि आपके पास कोर्ट से जुड़े मामलों की कोई सूचना है तो आप उनसे इस ईमेल अड्रेस - journalistrajesh@gmail.com - पर संपर्क कर सकते हैं।... और पढ़ें

कन्वर्सेशन शुरू करें

Legalकी ताजा खबरें, ब्रेकिंग न्यूज, अनकही और सच्ची कहानियां, सिर्फ खबरें नहीं उसका विश्लेषण भी। इन सब की जानकारी, सबसे पहले और सबसे सटीक हिंदी में देश के सबसे लोकप्रिय, सबसे भरोसेमंद Hindi Newsडिजिटल प्लेटफ़ॉर्म नवभारत टाइम्स पर

Powered by Nyaya 247 News

संबंधित ख़बरें

इसी विषय की और ख़बरें →
सुप्रीम कोर्ट ने OBC क्रीमी‑लेयर मुद्दे में भविष्य‑प्रभावी आदेश दिया, केंद्र को मिला दो साल का मोहरा
संविधान

सुप्रीम कोर्ट ने OBC क्रीमी‑लेयर मुद्दे में भविष्य‑प्रभावी आदेश दिया, केंद्र को मिला दो साल का मोहरा

VNeID के माध्यम से नागरिकों को भूमि, आवास और अचल‑संपत्ति कानूनों के मसौदे पर सीधे राय देने की सुविधा
संविधान

VNeID के माध्यम से नागरिकों को भूमि, आवास और अचल‑संपत्ति कानूनों के मसौदे पर सीधे राय देने की सुविधा

सुप्रीम कोर्ट में विभाजित राय, ईसीआई नियुक्ति अधिनियम को बड़े बेंच तक भेजा गया
संविधान

सुप्रीम कोर्ट में विभाजित राय, ईसीआई नियुक्ति अधिनियम को बड़े बेंच तक भेजा गया

सरकार ने OBC क्रीमी लेयर नियम के लागू होने के लिए दो‑साल की अवधि की माँग की
संविधान

सरकार ने OBC क्रीमी लेयर नियम के लागू होने के लिए दो‑साल की अवधि की माँग की

डिजिटल युग में लोकतंत्र: न्याय, व्यवस्था और समावेशी भागीदारी की दिशा में नया संशोधन
संविधान

डिजिटल युग में लोकतंत्र: न्याय, व्यवस्था और समावेशी भागीदारी की दिशा में नया संशोधन

राष्ट्रीय सभा स्थायी समिति सांस्कृतिक उद्योग कानून के मसौदे पर चर्चा करेगी
संविधान

राष्ट्रीय सभा स्थायी समिति सांस्कृतिक उद्योग कानून के मसौदे पर चर्चा करेगी

सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की नियुक्तियों पर बंटे फैसले की समीक्षा का आदेश
संविधान

सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की नियुक्तियों पर बंटे फैसले की समीक्षा का आदेश

मुख्य चुनाव आयुक्त चयन समिति को हटाने पर सुप्रीम कोर्ट में दो विचार, बड़ी पीठ को भेजने पर असहमति
संविधान

मुख्य चुनाव आयुक्त चयन समिति को हटाने पर सुप्रीम कोर्ट में दो विचार, बड़ी पीठ को भेजने पर असहमति

ताज़ा ख़बरें