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सुप्रीम कोर्ट में फांसी सिस्टम खत्म करने की याचिका खारिज: मौत के लिए जहरीले इंजेक्शन या गोली मारने जैसे तरीकों की मांग की गई थी

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18 अगस्त 2026 को 07:56 am बजे
सुप्रीम कोर्ट में फांसी सिस्टम खत्म करने की याचिका खारिज:  मौत के लिए जहरीले इंजेक्शन या गोली मारने जैसे तरीकों की मांग की गई थी

सौजन्य से:- Dainik Bhaskar

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सुप्रीम कोर्ट में फांसी सिस्टम खत्म करने की याचिका खारिज:मौत के लिए जहरीले इंजेक्शन या गोली मारने जैसे तरीकों की मांग की गई थी

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सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को मौत की सजा पाए दोषियों को फांसी देने की मौजूदा व्यवस्था खत्म करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी। याचिका में फांसी की जगह जहरीले इंजेक्शन, गोली मारने, बिजली की कुर्सी या गैस चैंबर जैसे वैकल्पिक तरीकों की मांग की गई थी।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा कि उसका फैसला केंद्र को फांसी की मौजूदा व्यवस्था की व्यापक समीक्षा करने से नहीं रोकता। केंद्र किसी विशेषज्ञ संस्था से यह जांच करा सकता है कि कोई वैकल्पिक तरीका दोषी को अनावश्यक पीड़ा से बचाने और उसकी गरिमा बनाए रखने के लिहाज से बेहतर है या नहीं।

याचिका में कहा था- कम दर्द देने वाले तरीके अपनाए जाएं

वरिष्ठ वकील ऋषि मल्होत्रा ने 2017 में यह याचिका दायर की थी। इसमें मौत की सजा पाए दोषियों को फांसी देने की व्यवस्था को कानून से हटाने की मांग की गई थी। याचिका में कानून आयोग की 187वीं रिपोर्ट का हवाला दिया गया था।

याचिका में कहा गया था कि फांसी की जगह कम पीड़ादायक तरीके अपनाए जाएं। बहस के दौरान मल्होत्रा ने यह भी कहा था कि मौत की सजा पाए कैदी को फांसी और जहरीले इंजेक्शन में से कोई एक तरीका चुनने का ऑप्शन मिलना चाहिए।

2023 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा था डेटा

सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2023 में कहा था कि वह मौत की सजा देने के लिए फांसी के तरीके की पीड़ादायकता और प्रभाव को लेकर विशेषज्ञ समिति बनाने पर विचार कर सकता है। कोर्ट ने केंद्र से इस मुद्दे पर बेहतर डेटा भी मांगा था।

हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि वह विधायिका को मौत की सजा के लिए कोई खास तरीका अपनाने का निर्देश नहीं दे सकता।

केंद्र ने फांसी को तेज और आसान तरीका बताया था

केंद्र ने 2018 में फांसी की मौजूदा व्यवस्था का बचाव किया था। गृह मंत्रालय ने अपने हलफनामे में कहा था कि फांसी से मौत तेज और आसान होती है और इससे कैदी का दर्द नहीं बढ़ता। केंद्र ने कहा था कि जहरीले इंजेक्शन और गोली मारने जैसे वैकल्पिक ऑप्शन भी कम पीड़ादायक नहीं हैं।

चर्चित मामले, जिनमें मौत की सजा और फांसी पर बहस हुई

- धनंजय चटर्जी केस (2004): धनंजय चटर्जी को 1990 में 18 साल की हेतल पारेख के रेप-मर्डर के मामले में दोषी ठहराया गया था। ट्रायल कोर्ट ने मौत की सजा सुनाई, जिसे कलकत्ता हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा। 14 अगस्त 2004 को कोलकाता की अलीपुर जेल में उसे फांसी दी गई। मानवाधिकार समूहों और कुछ शिक्षाविदों ने फांसी का विरोध किया था।

- अजमल कसाब केस (2012): 26/11 मुंबई आतंकी हमले के एकमात्र जिंदा पकड़े गए आरोपी अजमल कसाब को हत्या, आतंकवाद और देश के खिलाफ युद्ध जैसे गंभीर अपराधों में दोषी ठहराया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने 2012 में उसकी मौत की सजा बरकरार रखी। 21 नवंबर 2012 को पुणे की यरवदा जेल में उसे फांसी दी गई। इस मामले ने आतंकवाद के मामलों में मौत की सजा और उसे लागू करने को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बहस छेड़ी।

- निर्भया केस (2020): 2012 के दिल्ली गैंगरेप और हत्या मामले में चार दोषियों- मुकेश सिंह, विनय शर्मा, पवन गुप्ता और अक्षय ठाकुर को मौत की सजा दी गई। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी सजा बरकरार रखी और कई बार दया याचिका, क्यूरेटिव याचिका और डेथ वारंट के चलते फांसी टलती रही। आखिरकार 20 मार्च 2020 को चारों को तिहाड़ जेल में फांसी दी गई। इस मामले में मौत की सजा, दया याचिका की प्रक्रिया और दोषियों की ओर से कानूनी विकल्पों के इस्तेमाल को लेकर लंबी बहस हुई।

यह खबर लगातार अपडेट की जा रही है…

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