हाईकोर्ट ने वर्ष 1984 के दहेज मांग मामले में सजा रद्द की
झारखंड हाईकोर्ट ने वर्ष 1984 में हुए कथित दहेज मांग मामले में कामाख्या नारायण तिवारी को निचली अदालत द्वारा सुनाई गई सजा रद्द कर दी है। अदालत ने स्पष्ट पाया कि जिस कानूनी संशोधन के आधार पर दोषी करार दिया गया था, वह घटना के बाद लागू हुआ था और उसे पूर्वव्यापी प्रभाव से लागू नहीं किया जा सकता।

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By Harindra Tiwary हिन्दुस्तान, रांची
दहेज मामले में निचली अदालत की सुनाई गई सजा रद्द, वर्ष 1984 में दहेज मांगने का केस किया गया था दर्ज
रांची। विशेष संवाददाता झारखंड हाईकोर्ट ने वर्ष 1984 के कथित दहेज मांग मामले में कामाख्या नारायण तिवारी को निचली अदालत द्वारा सुनाई गई सजा रद्द कर दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जिस कानूनी संशोधन के आधार पर दोषी करार दिया गया था, वह घटना के बाद लागू हुआ था और उसे पूर्वव्यापी (रेट्रोस्पेक्टिव) प्रभाव से लागू नहीं किया जा सकता।
जस्टिस अरुण कुमार राय की अदालत ने प्रार्थी की अपील स्वीकार करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष दहेज निषेध अधिनियम की धारा 4 के तहत आरोप सिद्ध करने में विफल रहा। कोर्ट ने कहा कि यह मामला वर्ष 1979 में हुए विवाह और वर्ष 1984 में कथित दहेज मांग से जुड़ा है, जबकि दहेज निषेध (संशोधन) अधिनियम, 1986 के माध्यम से धारा 4 में विवाह के बाद किसी भी समय की गई दहेज मांग को भी अपराध की परिभाषा में शामिल किया गया था। यह संशोधन 19 नवंबर 1986 से प्रभावी हुआ और इसका पूर्वव्यापी प्रभाव नहीं है।
अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 20(1) का हवाला देते हुए कहा कि किसी भी व्यक्ति को ऐसे कानून के तहत दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जो कथित अपराध की तिथि पर लागू ही नहीं था।
अभियोजन का आरोप था कि विवाह के बाद आरोपी और उसके परिजनों ने मोटरसाइकिल की मांग की तथा मांग पूरी नहीं होने पर विवाहिता शशि कुमारी को प्रताड़ित किया गया। बाद में उसकी मृत्यु हो गई। हत्या के आरोप में ट्रायल कोर्ट पहले ही आरोपी को बरी कर चुका था, लेकिन दहेज निषेध अधिनियम की धारा 4 के तहत छह माह के कारावास और पांच हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी।
हाईकोर्ट ने गवाहों के बयानों का विश्लेषण करते हुए पाया कि सभी गवाहों ने मोटरसाइकिल की मांग विवाह के बाद किए जाने की बात कही है। किसी भी गवाह ने यह नहीं बताया कि दहेज की मांग विवाह से पहले या विवाह के समय की गई थी। अदालत ने कहा कि घटना के समय लागू कानून के अनुसार धारा 4 के तहत अपराध तभी बनता था, जब दहेज की मांग विवाह से पहले, विवाह के समय या विवाह के संबंध में की गई हो। चूंकि अभियोजन इस आवश्यक तत्व को साबित नहीं कर सका, इसलिए दोषसिद्धि टिक नहीं सकती।
✦झारखंड हाईकोर्ट ने किस वर्ष के दहेज मांग मामले में सजा रद्द की?
झारखंड हाईकोर्ट ने वर्ष 1984 के दहेज मांग मामले में सजा रद्द की।
✦दहेज निषेध अधिनियम की धारा 4 के तहत आरोप सिद्ध कैसे किए गए?
अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष दहेज निषेध अधिनियम की धारा 4 के तहत आरोप सिद्ध करने में विफल रहा।
✦किस संशोधन के आधार पर दोषी करार दिया गया था?
दोषी करार के लिए दहेज निषेध (संशोधन) अधिनियम, 1986 के आधार पर आरोप लगाया गया।
✦अदालत ने दहेज मांग के मामले में गवाहों के बयानों को कैसे विश्लेषित किया?
हाईकोर्ट ने गवाहों के बयानों का विश्लेषण करते हुए पाया कि सभी गवाहों ने मोटरसाइकिल की मांग विवाह के बाद किए जाने की बात कही है।
शॉर्ट बायोः हरींद्र तिवारी पिछले 28 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं और वर्तमान में हिन्दुस्तान रांची में विशेष संवाददाता हैं। सिटी रिपोर्टिंग टीम को लीड कर रहे हैं।
परिचय एवं अनुभव: हरींद्र तिवारी झारखंड के मीडिया जगत का एक प्रतिष्ठित नाम हैं, जिन्हें पत्रकारिता में 26 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वर्तमान में वह हिन्दुस्तान रांची की सिटी रिपोर्टिंग टीम को लीड कर रहे हैं। (हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप) वर्ष 2015 से इस भूमिका में रहते हुए उन्होंने अपनी खास पहचान बनायी है।
करियर का सफर : हरींद्र ने अपने करियर की शुरुआत वर्ष 1998 में प्रभात खबर से की, जहां उन्होंने प्रिंट पत्रकारिता की बुनियादी समझ विकसित की। 2002 में हिन्दुस्तान ज्वाइन किया। हाईकोर्ट, पीएसयू और जिला प्रशासन जैसे महत्वपूर्ण बीट पर काम कर चुके हैं। वर्ष 2014 में वह चीफ रिपोर्टर बने और अभी सिटी रिपोर्टिंग टीम का नेतृत्व कर रहे हैं।
शैक्षणिक पृष्ठभूमि: बीए ऑनर्स (अर्थशास्त्र) और जर्नलिज्म में ग्रेजुएट और एलएलबी होने के कारण हरींद्र को लीगल, पीएसयू और प्रशासनिक पत्रकारिता का अनूठा संयोजन मिला। इसी वजह से वह कोर्ट रिपोर्टिंग में बीट पर कमांड होने के साथ पीएसयू और प्रशासनिक विषयों पर खास वेरिफाइड एक्सप्लेनर स्ट्रोरी लिख रहे हैं। शिक्षा के अधिकार कानून लागू करने के पूर्व हाईकोर्ट ने उन्हें कोलकाता में प्रशिक्षण के लिए भेजा था। सुप्रीम कोर्ट की ओर से कटक में मीडिया के लिए आयोजित विशेष कार्यशाला में भी झारखंड से इन्हें भेजा गया था।
लीगल समझ और तथ्यों पर फोकस : कोर्ट रिपोर्टिंग के साथ इससे जुड़े अन्य संस्था- झालसा, बार कौंसिल से जुड़े मामलों की उन्हें गहरी समझ है। पीएसयू की कार्यशैली, खबरें और उनके मंत्रालय तक में इनके संपर्क हैं। इन्होंने हाईकोर्ट, एचईसी जैसे पीएसयू की कई खबरें ब्रेक की हैं। हरींद्र का मानना है कि पत्रकारिता की नींव तथ्यपरकता और विश्वसनीयता है। इनका लक्ष्य पाठकों को सटीक, प्रमाणिक और सशक्त जानकारी देना है।
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