मां कमाती है, पिता की बच्चों के भरण-पोषण की जिम्मेदारी आधी नहीं की जा सकती: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों के भरण-पोषण को लेकर ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि मां के कमाने के आधार पर पिता की जिम्मेदारी आधी नहीं की जा सकती। नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों के अंतरिम भरण-पोषण को लेकर महत्वप…

सौजन्य से:- Navbharat Times
सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों के भरण-पोषण को लेकर ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि मां के कमाने के आधार पर पिता की जिम्मेदारी आधी नहीं की जा सकती।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों के अंतरिम भरण-पोषण को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि बच्चों की देखभाल और परवरिश की जिम्मेदारी को केवल मैथेमेटिक्स के आधार पर माता-पिता के बीच बांटा नहीं जा सकता। सिर्फ इसलिए कि मां कमाती है, पिता की बच्चों के भरण-पोषण की जिम्मेदारी आधी नहीं की जा सकती।
भरण पोषण की जिम्मेदारी नहीं की जा सकती आधी
अदालत ने कहा कि बच्चों की रोजमर्रा की देखभाल और परवरिश में मां का योगदान भी वास्तविक योगदान है, जिसे केवल पैसों में नहीं मापा जा सकता। यानी मां कमाती है तो इस आधार पर पिता की बच्चों के भरण-पोषण की जिम्मेदारी आधी नहीं की जा सकती।
SC ने रद्द किया इलाहाबाद हाई कोर्ट का आदेश
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें दो नाबालिग बेटियों के लिए फैमिली कोर्ट द्वारा तय 60 हजार रुपये मासिक अंतरिम भरण-पोषण को घटाकर 30 हजार रुपये कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने फैमिली कोर्ट का आदेश बहाल करते हुए दोनों बेटियों के लिए 30-30 हजार रुपये प्रतिमाह यानी कुल 60 हजार रुपये का अंतरिम भरण-पोषण बरकरार रखा।
क्या है पूरा मामला
मामला एक डॉक्टर दंपती से जुड़ा है, जिनकी शादी 2006 में हुई थी। दोनों पति-पत्नी पेशे से डॉक्टर हैं और उनकी दो नाबालिग बेटियां हैं। वैवाहिक विवाद के बाद पत्नी को अपना वैवाहिक घर छोड़ना पड़ा। इसके बाद उन्होंने सीआरपीसी की धारा 125 (अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 144) के तहत भरण-पोषण की मांग की। पत्नी ने अपने और दोनों बेटियों के लिए 2.50 लाख रुपये प्रतिमाह गुजारा भत्ता की मांग की थी।
पिता की जिम्मेदारी तय
फैमिली कोर्ट ने पत्नी की प्रोफेशन की स्थिति और करीब 1.5 लाख रुपये मासिक आय को देखते हुए उन्हें अंतरिम भरण-पोषण देने से इनकार कर दिया, लेकिन दोनों बेटियों के लिए 30-30 हजार रुपये प्रतिमाह मंजूर किए यानी पति की जिम्मेदारी तय की गई कि वह दोनों बेटियों को 30-30 हजार रुपये भरण पोषण का खर्चा दे।
इलाहाबाद हाईकोर्ट में दी चुनौती
पति ने इस आदेश को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने माना कि बेटियों के भरण-पोषण की जिम्मेदारी दोनों माता-पिता की है और मां खुद कमाती हैं। इसी आधार पर उसने प्रत्येक बेटी का अंतरिम भरण-पोषण 30 हजार से घटाकर 15 हजार रुपये प्रतिमाह कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट के तर्क टिकने वाले नहीं है। शीर्ष अदालत ने कहा कि हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के इस आकलन को गलत नहीं बताया था कि दोनों बेटियों के लिए 60 हजार रुपये प्रतिमाह उचित राशि है। इसके बावजूद केवल मां की आय को आधार बनाकर राशि आधी कर दी गई। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पत्नी की आय अपने आप में पिता की जिम्मेदारी को आधा करने का आधार नहीं हो सकती।
मां नौकरी के साथ निभा रही सारी जिम्मेदारी
बच्चों के भरण-पोषण की जिम्मेदारी दोनों माता-पिता की है, लेकिन इसे केवल अंकगणित के आधार पर विभाजित नहीं किया जा सकता। बेटियां मां के साथ रहती हैं और मां नौकरी करने के साथ-साथ उनकी रोजमर्रा की जरूरतों, देखभाल और परवरिश की जिम्मेदारी भी निभा रही हैं। कोर्ट ने कहा कि इस तरह की देखभाल को पैसे में नहीं आंका जा सकता, लेकिन यह वास्तविक योगदान है और कई बार यह अधिक महत्वपूर्ण योगदान होता है।
पति योग्य डॉक्टर है: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पति स्वयं योग्य डॉक्टर हैं और उनके अपने खुलासे के मुताबिक उनकी आय दो लाख रुपये प्रतिमाह है। करीब नौ और आठ वर्ष की स्कूल जाने वाली दो बेटियों के लिए 60 हजार रुपये प्रतिमाह की राशि उनकी स्थिति को देखते हुए अधिक नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट ने दोनों पक्षों की आय, खर्च और बेटियों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए सही आकलन किया था। इसलिए 60 हजार रुपये की संयुक्त अंतरिम राशि न्यायसंगत और उचित है।
सुप्रीम कोर्ट ने बहाल किया फैमिली कोर्ट का फैसला
अदालत ने स्पष्ट किया कि उसका फैसला केवल अंतरिम भरण-पोषण तक सीमित है। धारा 125 सीआरपीसी के तहत मुख्य याचिका फैमिली कोर्ट में लंबित रहेगी और उसका फैसला सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश से प्रभावित हुए बिना गुण-दोष के आधार पर किया जाएगा। इस आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश रद्द कर फैमिली कोर्ट का आदेश बहाल कर दिया।
लेखक के बारे मेंराजेश चौधरीराजेश चौधरी, नवभारत टाइम्स में लीगल एडिटर हैं। वह 22 साल से भी ज्यादा वर्षों से लीगल रिपोर्टिंग कर रहे हैं। शुरुआत में वह दिल्ली की निचली अदालत और सीबीआई कवर करते थे और बाद में वह दिल्ली हाई कोर्ट और फिर लगातार डेढ़ दशक से सुप्रीम कोर्ट कवर कर रहे हैं। इस दौरान राजेश ने देश के तमाम हाई प्रोफाइल केस नीतीश कटारा मर्डर केस, जेसिक लाल केस, बोफोर्स केस, उपहार केस, पार्लियामेंट अटैक केस, प्रिय दर्शनी मट्टू केस से लेकर तमाम संवैधानिक मसले कवर किए जिनमें अनुच्छेद-370, तीन तलाक, निजता का अधिकार, होमो सेक्सुअलिटी को अपराध से बाहर करने का मामला और राम मंदिर मसले अहम है। राजेश ने इस 22 साल के करियर के दौरान दो साल 2006 से लेकर 2007 के सितंबर तक सहारा समय टीवी चैनल में भी बतौर लीगल संवावददाता काम किया। इसके बाद दोबारा वह नवभारत टाइम्स आए और उसके बाद लगातार कानूनी अफेयर्स को कवर करते रहे। नेशनल ब्यूरो में रहते हुए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट और कानून मंत्रालय को कवर करने के साथ साथ कानून के विषय पर लगातार एडिट पेज पर लिख रहे हैं। साथ ही लगातार ऑनलाइन माध्यम के लिए भी सक्रिय रिपोर्टिंग करते रहे हैं और ..कोर्ट रूम..नाम के एक साप्ताहिक विडियो इंटरव्यू भी लगातार देते हैं जिनमें सप्ताह भर के मुख्य कानूनी मसले पर उनका साक्षात्कार प्रसारित होता है। इसके अलावा वह लगातार लीगल मसले पर लीगल फोरम नामक कॉलम भी लिखते रहे हैं। उन्होंने दरभंगा के ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय से केमिस्ट्री में एमएससी किया है। साथ ही उन्होंने जर्नलिज्म में पीजी डिप्लोमा किया और एलएलबी भी कर रखा है।... और पढ़ें
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